ये हल्का हल्का है नशा, अभी-अभी तो पीनी शुरू की।
पता चल जाएगा महकशी क्या? ज़रा शाम होने दो।
खुमारियों में ही न गुजर जाए ताउम्र,
नशा का उतार करते-करते सुबह-ओ-सहर तो कहना।
तन्हाइयों में अक्सर मेरा मैं खो जाता है, न जाने किधर-किधर।
लो देख लो भूल गया लिखते-लिखते अभी-अभी।
मत पूछो मिजाज कैसा है?
बस कुछ फर्क तो है तबियत में मगर हरारत में जी वैसा का वैसा है।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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