होकर मजबूर अब हमें चलना होगा ।
कयामत न जाने कब आ जाए ,
उससे पहले हमें अब ,हालातों में ढालना होगा ।
होगी जीत भरोसा तो है , मरते दम तक ,
ठहर का शायद अब ,आगाज रोकना होगा ।
ग़म तो है और दर्द भी ,ज़ख्म भर तो जायेंगे मगर , टीस को जगाये रखना होगा ।
कहीं भूल न जायें ,ये दिल सितम जमाने के
इसे हर सितम की यादों से , रूबरू करवाना होगा ।
क्यों रोता है "मलंग" किसी की बेवफाई से
तुझे अपनी वफ़ा को , अपनी कलंदरी से लगाए रखना होगा ।
✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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