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कहूं क्या इस दर्द ए हाल में ..

 कहूं क्या इस दर्द ए हाल में ,  अब अल्फाजों ने , जुबां से  रुखसत ले ली । आ करीब कुछ और हमारे ,  वक्त न जाने कब , हमें  खामोश कर दे ।। ठहर कुछ देर और ऐ जिंदगी ! कुछ देर और  उन्हें , मैं  गले से लगा तो लूं ।। जी भर के जी लूं , कुछ और अपने जी संग ।  इन शबनमी आंखों से मैं ,  कुछ देर और उन्हें , जी भर के देख तो लूं ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

गुजर गए वो वक्त अब .....

 गुजर गए वो वक्त अब ,  अच्छा या बुरा जैसा भी रहा होगा । फिक्र तो अब आगे की है कि , वक्त अब आगे का कैसा होगा ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यादों के झरोखोंसे आज...।

यादों के झरोखों से आज, तेरी याद चली आई है । ऐ मेरे बचपन तू , अब तो लौट आ । कई बहार आई और गुजर गई , इस रंगीन जमाने में । बे रंग सी जिंदगी है अब हमारी , सदियों की तन्हाई है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी कातिल आंखें है..।

तेरी कातिल आंखें है , यह लोग कहते है । इक बार इधर तो देखो ,ये हुस्न ए बाहर । हम इन आंखों से, कत्ल होना चाहते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वो मेरे आंसू थे ...

वो मेरे आंसू थे ,  जो छलक गए अंखियों के झरोखों से ।  आह...!  आई किसी की याद आज , सच कई दिनों से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

जो कहते थे हम से कल मिलते है ...।

जो कहते थे हम से के , कल मिलते है । जमाना गुजर गया मगर...! उनका कल , आज तक आया नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

छुपाकर दर्द अपना...

छुपा कर दर्द अपना ,  मुश्किल से जी पा रहा हूं मैं । कहीं वो परेशान न हो जाए ,  जान कर मर्ज मेरा..! इसलिए , मुस्कुराए जा रहा हूं मैं ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज हर इजाम तेरा , ओ बेदर्द !

आज हर इलजाम तेरा , ओ बेदर्द !  हम अपने नाम किए जाते है । जा तूझे माफ किया , इलजाम तेरी बेवफाई का हम , अपने सर किए जाते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी घबराया तो , कभी शरमाया हूं मैं

कभी घबराया तो , कभी शरमाया हूं मैं । कभी चिलमन को हटाया तो , कभी खुद को उसमें  छुपाया हूं मैं । दिल में हुआ था कुछ कुछ , देख कर उन्हें  मेरे । शायद रहा हो वो "इश्क" जिसे जमाने से अब तक ,छुपाया हूं मैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुझे नींद नहीं आएगी ।

मुझे नींद नहीं आएगी अब ,  न जाने क्यों ? इक आग , बुझी बुझी सी अब । सुलगती सी , नजर आ रही है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी कभी दर्द भी हंस लेता है मेरा ।

 कभी कभी दर्द भी हंस लेता है मेरा , तेरी बेरूखी पर । के अंजाम ये वफ़ा का , क्या खूब हासिल हुआ हमें । इतने भी  गुस्ताख तो नही थे हम के ,सजा मुआफी के काबिल भी न हो । अफ़सोस होता है मुझे ,तेरी उन बेरूखी नजरों पर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी याद आ रही है ....!

 तेरी याद आ रही है ....! ये ही सच है जो कह नही सकता मैं , जमाने से । डर ना होता तेरी रुसवाई का तो ,  कब का ले आता तुझे मैं , अपने कूचे में । (पहले चलने वाली से तो पूछ लो 😂😂) जरूरत ही क्या , उन सवालातों को पूछ कर । जवाब जिनका हम जानते हैं । इनकार ही था तब और अब , आगे भी । बस नशीबों में आहें ही तो है , मेरी हमदम बनकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज मैं तुम्हें अपनी आंखों में ।

आज मैं तुम्हें अपनी आंखों में , बंद कर सो जाऊंगा । जो कभी ,  हकीकत में मुकम्बल ना हो सके । तू आयेगी क्या मेरे पास ,  मेरा सुहाना ख्वाब बनकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हूं करीब उनके मैं.....

 हूं करीब उनके मैं  मगर , मिल नही सकता । मजबूरी है बहुत , मैं उन्हें कह नही सकता । खामोश हूं बेहतर है , वरना कहूं क्या उनसे । वो तड़प उठेंगे मिलने को  , मैं उन्हें तड़पता भी तो , देख नही सकता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यादों में हम खोए खोए गुनगुनाए जाएंगे ।

 यादों में हम खोए खोए  , गुनगुनाए जाएंगे । जिद्दी है तेरी यादें तो क्या , हम भी कम तो नहीं । तुम्हें ख्यालों में बसा कर , जिए जायेंगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

देखा है दूर से तुम्हें , काश ...!

देखा है दूर से तुम्हें , काश ...!  पहले की तरह , पास आए होते ।☹️ आंखें बंद कर मैं....! तुम्हें अपने दिल में ,बंद कर लेता । करता गुफ्तगू दिल से तेरे , अपने दिल में रवानी भर लेता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

कबूल कर लो अब , सलाम हमारा ।

कबूल कर लो अब , सलाम हमारा । घिर आई है शब ए नूर , इक खूब सूरत पैगाम लिए । अब हम तुम , शब ए खैर हुए हैं जाते । नई सुबह की मुबारक , शुरुवात के लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अपने बाद चाह जिसे जी भर ओ तुम हो ।

अपने बाद चाह जिसे जी भर , ओ तुम हो । अब तेरे बाद....! चाहूं किसी और को ,यह मेरे दिल को गवारा नहीं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

वो दर्द ओ जख्म की दास्तां .

 वो दर्द ओ जख्म की दास्तां,  वो कयामत की रात । यूं तो हम भूल चुके थे कब के ,  मगर..... आज फिर चली आई है , उन से वो आखरी मुलाकात की याद । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बड़ी बर्बादियां लेकर...

 बड़ी बर्बादिया लेकर , दुनिया में प्यार आया । कभी उनके तो कभी , मेरे चेहरे पर निखार आया । चाहत थी हमें फूलों की मगर , हिस्से में अपने खार आया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हूं तो मैं ,यहीं पर ही मगर ।

हूं तो मैं ,यहीं पर ही  मगर । दिल ना जाने कहां , गुम हुआ जाता है । आओ तो इधर जरा पास हमारे , ढूंढू तो लूं मैं , इसे तेरे दिल में । है शायद , तुझ में ही दिल मेरा । रह रह कर बस मुझे ,  तेरा ही ख्याल आ जाता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उनकी जरूरत ही अक्सर , मेरा पता पूछती है ।

उनकी जरूरत ही अक्सर ,  मेरा पता पूछती है  । बस मतलब तक ही मुलाकात ,  और कुछ देर तक का ठहर है उनका  । फिर क्या ? कई दिनों तक की ,  खामोशी वो इख्तेयार कर लेती है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरे मुकद्दर में नही संग तेरे जाना ।

मेरे मुकद्दर में नही संग तेरे जाना । काश के दरम्यान हमारे , कोई जमाने की रुकावटें न होती ।। हां मज़ाक ही सही मगर ,  कह तो दिया तूने कम से कम । के चले आओ , हमारे संग । ना मालूम तूने कि हम , तब से अब तक , अपने दिल को जलाए बैठे है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दर्द बहुत है , दर्द ए दिल की दवा क्या है ?

दर्द बहुत है...! दर्द ए दिल की , दवा क्या है ? मुमकिन हो कि , मिल जाए दवा कहीं । ऐ खुदा बता....! उस मुकाम का पता , क्या है ? बहुत तलाश किया  , मगर सकून । मिला तो , कहीं भी नही । है भी क्या , कहीं जमाने में ? है तो , उसका पता क्या है ? धुंधलाती नजर अब , थक चुकी । लौट आई वापस अब , अंखियों के झरोखों में । हो कब न जाने बंद, ये पलकें अब । रहूं कब तलक , इस इंतजार में । वो वक्त मेरे नसीब का , है भी क्या ? जो मिलें चैन मुझे ,सदा की खातिर । है जो वो वक्त तो ,उस वक्त का पता क्या है ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

धुंधला धुंधला सा याद है..

धुंधला धुंधला सा याद है कुछ ,  कि जैसे कोई । हुआ करता था दोस्त ,  मेरा भी इस शहर । आज जमाने गुजर गए ,  उन्हें देखे हुए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

भूले हो शायद , हमें तुम ।

 *भूले हो शायद , हमें तुम । याद होते हम तुम्हें तो , यूं न फिर । दिल में मेरे , खामोशी होती **तुमको भुला दूं मैं ,  चाह में जब भी ये मेरे  आया । तुम त्यों त्यों बहुत याद आए । यूं आए याद के मैं खुद को ,  पास तेरे आने से , नही रोक पाया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आ चले आज के मन करता हैं।

आ चले आज के मन करता हैं। दूर कहीं क्षितिज पर , जहां आकाश धरा से मिले । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इंतजार करने का , मज़ा ही कुछ और है

 इंतजार करने का , मज़ा ही कुछ और है "मलंग" उम्मीद पर उम्मीद बंधती जाती है । हां ये बात अलग है कि , दिल के टूटने की आवाज कहां आती हैं ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

रौनक अब उड़ गई है चेहरे से

रौनक अब उड़ गई है , चेहरे से । क्या बताएं क्यों ? बस यूं समझिए कि, कई दिनों से । तुम बिना अब , मिज़ाज ठीक नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वर्षो के बाद मालूम हुआ ,के हम दूर के है ।

वर्षो के बाद मालूम हुआ ,के हम दूर के है । वरना हमें तो रोज तुम , करीब के ही लगे ।। खैर कोई बात नही , दुआ तो हमारी रहेगी यही । के सलामत रहे , तेरा जहां ।। मिले मोहब्बत तुम्हें ,खूब अपनों से ।  तुम में अब हमारे लिए , अपने वाली वो बात कहां ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी यादों ने एक पल भी , सोने नहीं दिया ।

तेरी यादों ने एक पल भी ,  सोने नहीं दिया । पलकों के बंद होते ,  चेहरा तेरा दिखता था । हर करवट पर ,  तेरे होने का एहसास । ना जाने क्यों ,  मुझे हुआ करता था । क्यूं होता है मुझे ऐसा ,  अक्सर । तू है क्या , मुझ में बसर ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दूर तक जहां भी निगाहें , जाती हो ।

दूर तक जहां भी निगाहें , जाती हो । हो सकून ए जिन्दगी की , राहें वो । मोहब्बत मिले तुम्हें , हर किसी से । गम का नमो निशां , बाकी न हो । 🎂जन्म दिवस की , हार्दिक शुभकामनाएं पुत्र !🎂 04/01/2023 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

ये राहें गुजरते वक्त का , निशां होंगी ।

ये राहें गुजरते वक्त का , निशां होंगी । पलकों में जमी गर्त , उम्र की ढलान लिए । यादों में संजोए होंगे गुजरे पल , कुछ खट्टे कुछ मीठे । एक लालसाई भर ये नज़र , जब तरसेगी , देखने इन राहों को । फिर कौन दिखायेगा , इन नजारों को । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उम्र के इस पड़ाव में भी..

 

यही राज़ ए जवां है , मेरी जिंदगी काp

  यही राज़ ए जवां है , मेरी जिंदगी का । तुम जो हो संग मेरे , बनकर मेरा हम साया  ।।  छुपाकर गम और , तरीका मुस्कुराने का ।। मैने सलीका ये जीने का , तुम से ही है पाया ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उफ्फ !कमवक्त दिन गुजरता है ....

उफ्फ !  कमवक्त दिन गुजरता है अब ,  सकून से तेरे बैगर । वरना कोशिश तो हमारी रहती है के ,  तू याद आती रहे । भूल हुई , चाहत जो बनी तू । दर्द अब, तब से बहुत है ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अभी कल की ही तो बात है , मुलाकात हुए ।

अभी कल की ही तो बात है , मुलाकात हुए । फिर.... ना जाने क्यों होता है ? अहसास कुछ ऐसा के , जैसे मुद्दों से तुझे देखा नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम पियो संग हमारे तो हम.....

तुम पियो संग हमारे तो हम , अपनी कसमें भी तोड़ देंगे । ये प्यार है मेरा जानम !  आजमाना नही । तुम कहो तो हम तेरे लिए , यह दुनिया भी छोड़ देंगे । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

विरानों में है अब , बसर जिंदगी ।

विरानों में है अब , बसर जिंदगी । कहने को तो है बीच , सबके मगर । हर कोई गुम है , अपनी अपनी धुन में । किस को किसी की , क्या खबर । डूब चुका है सूरज न खबर , उगा कब । ऊंचे आसमान पर , इक टक टकी सी भरी नजर । न जाने , झुकेगी कब तलक । है इंतजार में , झरझर लिए काया "वृद्ध " कोई तो आए करीब , कुछ पल ही ...हां कुछ ही ,  पर बतियाए । हर पल मन में, यही बात धर । मगर किसको परवाह अब , उस माझी की जो डूब रहा हो सबको , किनारे पर उतार कर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कई दिनों के बाद , आया हूं मैं....तेरे शहर ।

कई दिनों के बाद , आया हूं मैं.....तेरे शहर । अनजान सी नही वो गलियां ,  जहां मिले थे हम.....मगर ।  अब बदली बदली सी ,  ना जाने क्यों लगती है.....वो डगर ? ठहर तो कुछ देर और कि ,  देख लूं तुझे जी......भर । फिर ना जाने कब हो आना....मेरा  तेरे इस शहर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अंजुमन में फिरता ,चिराग कोई "इश्क"

 अंजुमन में फिरता ,चिराग कोई "इश्क"  हुस्न की , वफ़ा की तलाश लिए ।  मालूम क्या था , वो तूफानों के बवंडर को । अपने दमन में , समेटे हुए है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल की यही , तमन्ना है बस ।

दिल की यही , तमन्ना है बस । रहो भले रूठे हुए ही , क्यों न तुम मगर । हर रोज तेरा ही , दीदार चाहिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

बहुत दिनों से न लिखा कुछ , मेरी कलम तूने ।

बहुत दिनों से न लिखा कुछ , मेरी कलम तूने । क्यों ? क्या जज्बातों के बाज़ार में तुझे अब ,  कोई दिल तड़पता हुआ नही दिखा ? खामोश है क्यों ,कई जमाने से ? देख तो सही , मेरे दिल में झांक कर  । अब भी बाकी , दर्द ए निशान है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हाॅं ठीक च , द्यखदौं तब मैं कुछ दिन रूसैकि । (गढवाली

 हाॅं ठीक च , द्यखदौं तब  मैं कुछ दिन रूसैकि । कब तक नि आली सिया, मी मनौण । वन्नु त मी , सासा मा नि छौ  अब... पर फिर भी । क्या जाण... ह्वे जाउ कुयि देवता दैंणू शैद ,  म्यारा मैत कु । कि , बैठी क वींका घट पिंड मा ,  जू....। मेरी खुदै की आग जगै द्यो । अर रौ जु सिया , सुलगणी मेरी खुद मा  यनु कुुई चमतकार, शैद कुुई  देव दिखे द्यो । ऐ जाउ बौड़िक पुराणा दिन ,  हाॅ सि दिन... हैंसी खेली , बीत्या जु ।  लौटीक एै जाउ मयाली स्या,  रौणभौण । ✍️ज्योति प्रासद रतूड़ी

ऐसे भीगे पलों में काश , कोई अपना होता ।

ऐसे भीगे पलों में काश ,  कोई अपना होता । वो होती बाहों में मेरे , या मैं...! उसकी , बाहों में होता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

कुछ यादें ही है आज बस !

कुछ यादें ही है आज बस ! गुजरे जमाने की । विरासत में हमें दर्द के सिवा ,  और क्या मिला ? बदल गए है सब साथी बचपन के ,  और कुछ छोड़ गए है । था रिश्ता जिनसे एहसासों का कभी,  वो भी अब कहां रह गए है ? हर कोई व्यस्त है ,  किसी को किसी के दर्द का , अब एहसास कहां ? एक हम है ,जमाने भर का दर्द लिए , अश्क जल  ओंस सी , बटोर लेता हूं । और इन्हीं को दिल की हांडी में , यादों की आग पर , तपा लेता हूं। लगी प्यास  सकून की तो बुझे कैसे ? हर तरफ दिखते है लुटेरे चैन के । सोचता हूं के अब , रुकसत हो जाऊं मैं , खुदा तेरी दुनिया से । मगर एक मन ये भी कहे कि हम , उन्हें छोड़ कर ऐ खुदा !  तेरी दुनिया से , जाएं तो जाएं कैसे ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यनु भी क्या शरील पर बिति ग्याई कि (गढ़वाली)

यनु भी क्या शरील पर , बिति ग्याई कि , जिणों को मोह भंग ह्वे ग्याई । अभी त उमर बाळापन मान ,  थोडा ही उबे होई । क्या दिखि क्या लाई गाडी , अभी बाबा , जु ई ज्वानि सि , मन भोरै ग्याई । अभी लठ्याला उ लो छन , ताणी भोना । जु अपणा दिन अब , ग्रेस मा छ जिणा । अभी त तुमारी , दुनियादरी भी शुरू नि होई । अर तुम अभी बटि हार ,किले छ मनणा । हिकमत जोडी रखा दौं ,  मिललू बाटु जरूर , एक दिन दिक्यान  बस यू वक्त बुरू जु छ , ये तैं जाण दियां दौं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

शक तबाह कर देता है ।

शक तबाह कर देता है , कई  जिंदगियाँ । इसके बीज ना बौना कभी ,  गर खुद पनपे यह ,दरम्याँ तुम्हारे तो । खर पतवार की तरह , उखाड़ कर  फैंक देना । वर्ना शक बर्बाद कर देता है , जीवन  रुपी खेत में , प्रेम रुपी फसल को । भरोषे की खाद और विश्वास का जल , प्रेम की फसल को जिन्दा रखती है । आत्मसमर्पण  प्रेम में बहुत जरुरी है । अन्यथा बिन बागवाँ का बाग ,   उजड़ा उजड़ा सा , खाली खाली सा । अजमाना नही कभी भी , प्रेम में एक दुसरे को । आजमाते आजमाते ,  दुरियां ही बढ जाती है । फिर पास आये भी तो क्या , दिलों में खठास लिये । गर हो अहसास अपनी गलतियों का तो ,  क्षमा मांग लो । यकीनन मिठास प्यार की सदा , बनी रहेगी । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी