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तेरी यादों ने एक पल भी , सोने नहीं दिया ।

तेरी यादों ने एक पल भी ,  सोने नहीं दिया । पलकों के बंद होते ,  चेहरा तेरा दिखता था । हर करवट पर ,  तेरे होने का एहसास । ना जाने क्यों ,  मुझे हुआ करता था । क्यूं होता है मुझे ऐसा ,  अक्सर । तू है क्या , मुझ में बसर ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दूर तक जहां भी निगाहें , जाती हो ।

दूर तक जहां भी निगाहें , जाती हो । हो सकून ए जिन्दगी की , राहें वो । मोहब्बत मिले तुम्हें , हर किसी से । गम का नमो निशां , बाकी न हो । 🎂जन्म दिवस की , हार्दिक शुभकामनाएं पुत्र !🎂 04/01/2023 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

ये राहें गुजरते वक्त का , निशां होंगी ।

ये राहें गुजरते वक्त का , निशां होंगी । पलकों में जमी गर्त , उम्र की ढलान लिए । यादों में संजोए होंगे गुजरे पल , कुछ खट्टे कुछ मीठे । एक लालसाई भर ये नज़र , जब तरसेगी , देखने इन राहों को । फिर कौन दिखायेगा , इन नजारों को । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उम्र के इस पड़ाव में भी..

 

यही राज़ ए जवां है , मेरी जिंदगी काp

  यही राज़ ए जवां है , मेरी जिंदगी का । तुम जो हो संग मेरे , बनकर मेरा हम साया  ।।  छुपाकर गम और , तरीका मुस्कुराने का ।। मैने सलीका ये जीने का , तुम से ही है पाया ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उफ्फ !कमवक्त दिन गुजरता है ....

उफ्फ !  कमवक्त दिन गुजरता है अब ,  सकून से तेरे बैगर । वरना कोशिश तो हमारी रहती है के ,  तू याद आती रहे । भूल हुई , चाहत जो बनी तू । दर्द अब, तब से बहुत है ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अभी कल की ही तो बात है , मुलाकात हुए ।

अभी कल की ही तो बात है , मुलाकात हुए । फिर.... ना जाने क्यों होता है ? अहसास कुछ ऐसा के , जैसे मुद्दों से तुझे देखा नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम पियो संग हमारे तो हम.....

तुम पियो संग हमारे तो हम , अपनी कसमें भी तोड़ देंगे । ये प्यार है मेरा जानम !  आजमाना नही । तुम कहो तो हम तेरे लिए , यह दुनिया भी छोड़ देंगे । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

विरानों में है अब , बसर जिंदगी ।

विरानों में है अब , बसर जिंदगी । कहने को तो है बीच , सबके मगर । हर कोई गुम है , अपनी अपनी धुन में । किस को किसी की , क्या खबर । डूब चुका है सूरज न खबर , उगा कब । ऊंचे आसमान पर , इक टक टकी सी भरी नजर । न जाने , झुकेगी कब तलक । है इंतजार में , झरझर लिए काया "वृद्ध " कोई तो आए करीब , कुछ पल ही ...हां कुछ ही ,  पर बतियाए । हर पल मन में, यही बात धर । मगर किसको परवाह अब , उस माझी की जो डूब रहा हो सबको , किनारे पर उतार कर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कई दिनों के बाद , आया हूं मैं....तेरे शहर ।

कई दिनों के बाद , आया हूं मैं.....तेरे शहर । अनजान सी नही वो गलियां ,  जहां मिले थे हम.....मगर ।  अब बदली बदली सी ,  ना जाने क्यों लगती है.....वो डगर ? ठहर तो कुछ देर और कि ,  देख लूं तुझे जी......भर । फिर ना जाने कब हो आना....मेरा  तेरे इस शहर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अंजुमन में फिरता ,चिराग कोई "इश्क"

 अंजुमन में फिरता ,चिराग कोई "इश्क"  हुस्न की , वफ़ा की तलाश लिए ।  मालूम क्या था , वो तूफानों के बवंडर को । अपने दमन में , समेटे हुए है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल की यही , तमन्ना है बस ।

दिल की यही , तमन्ना है बस । रहो भले रूठे हुए ही , क्यों न तुम मगर । हर रोज तेरा ही , दीदार चाहिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

बहुत दिनों से न लिखा कुछ , मेरी कलम तूने ।

बहुत दिनों से न लिखा कुछ , मेरी कलम तूने । क्यों ? क्या जज्बातों के बाज़ार में तुझे अब ,  कोई दिल तड़पता हुआ नही दिखा ? खामोश है क्यों ,कई जमाने से ? देख तो सही , मेरे दिल में झांक कर  । अब भी बाकी , दर्द ए निशान है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हाॅं ठीक च , द्यखदौं तब मैं कुछ दिन रूसैकि । (गढवाली

 हाॅं ठीक च , द्यखदौं तब  मैं कुछ दिन रूसैकि । कब तक नि आली सिया, मी मनौण । वन्नु त मी , सासा मा नि छौ  अब... पर फिर भी । क्या जाण... ह्वे जाउ कुयि देवता दैंणू शैद ,  म्यारा मैत कु । कि , बैठी क वींका घट पिंड मा ,  जू....। मेरी खुदै की आग जगै द्यो । अर रौ जु सिया , सुलगणी मेरी खुद मा  यनु कुुई चमतकार, शैद कुुई  देव दिखे द्यो । ऐ जाउ बौड़िक पुराणा दिन ,  हाॅ सि दिन... हैंसी खेली , बीत्या जु ।  लौटीक एै जाउ मयाली स्या,  रौणभौण । ✍️ज्योति प्रासद रतूड़ी

ऐसे भीगे पलों में काश , कोई अपना होता ।

ऐसे भीगे पलों में काश ,  कोई अपना होता । वो होती बाहों में मेरे , या मैं...! उसकी , बाहों में होता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

कुछ यादें ही है आज बस !

कुछ यादें ही है आज बस ! गुजरे जमाने की । विरासत में हमें दर्द के सिवा ,  और क्या मिला ? बदल गए है सब साथी बचपन के ,  और कुछ छोड़ गए है । था रिश्ता जिनसे एहसासों का कभी,  वो भी अब कहां रह गए है ? हर कोई व्यस्त है ,  किसी को किसी के दर्द का , अब एहसास कहां ? एक हम है ,जमाने भर का दर्द लिए , अश्क जल  ओंस सी , बटोर लेता हूं । और इन्हीं को दिल की हांडी में , यादों की आग पर , तपा लेता हूं। लगी प्यास  सकून की तो बुझे कैसे ? हर तरफ दिखते है लुटेरे चैन के । सोचता हूं के अब , रुकसत हो जाऊं मैं , खुदा तेरी दुनिया से । मगर एक मन ये भी कहे कि हम , उन्हें छोड़ कर ऐ खुदा !  तेरी दुनिया से , जाएं तो जाएं कैसे ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यनु भी क्या शरील पर बिति ग्याई कि (गढ़वाली)

यनु भी क्या शरील पर , बिति ग्याई कि , जिणों को मोह भंग ह्वे ग्याई । अभी त उमर बाळापन मान ,  थोडा ही उबे होई । क्या दिखि क्या लाई गाडी , अभी बाबा , जु ई ज्वानि सि , मन भोरै ग्याई । अभी लठ्याला उ लो छन , ताणी भोना । जु अपणा दिन अब , ग्रेस मा छ जिणा । अभी त तुमारी , दुनियादरी भी शुरू नि होई । अर तुम अभी बटि हार ,किले छ मनणा । हिकमत जोडी रखा दौं ,  मिललू बाटु जरूर , एक दिन दिक्यान  बस यू वक्त बुरू जु छ , ये तैं जाण दियां दौं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

शक तबाह कर देता है ।

शक तबाह कर देता है , कई  जिंदगियाँ । इसके बीज ना बौना कभी ,  गर खुद पनपे यह ,दरम्याँ तुम्हारे तो । खर पतवार की तरह , उखाड़ कर  फैंक देना । वर्ना शक बर्बाद कर देता है , जीवन  रुपी खेत में , प्रेम रुपी फसल को । भरोषे की खाद और विश्वास का जल , प्रेम की फसल को जिन्दा रखती है । आत्मसमर्पण  प्रेम में बहुत जरुरी है । अन्यथा बिन बागवाँ का बाग ,   उजड़ा उजड़ा सा , खाली खाली सा । अजमाना नही कभी भी , प्रेम में एक दुसरे को । आजमाते आजमाते ,  दुरियां ही बढ जाती है । फिर पास आये भी तो क्या , दिलों में खठास लिये । गर हो अहसास अपनी गलतियों का तो ,  क्षमा मांग लो । यकीनन मिठास प्यार की सदा , बनी रहेगी । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी 

पिडा बटोळि क ल्यायों मी ,आज माया लै की (गढ़वाली)

हे.. हे.. हे...! आ...आ...आ ह....! हुं हूं ह उं.... पिडा बटोली क ल्यायों मी आज माया  लै की ,  आयों बोडी जब मी उंका मुलूक छोडिक । ना रोकि उं म्यारू बाटु ना क्वी  सौ ना कारार, ना बोली उं ना जवा मी छोडिक । रैयूं सासा... रैयों सासाा भिण्डि दूर तलक भी,  मी थै धै लगालि वा । मुड़िक पछनै देखि त जनी , हाथ हल्कैकि , मी खुणि बुलोणी छ वा । दौडी गै मी अंग्वाठि मा , जाण का उंका । जनी पोंछी पोंछी मी वख मा , ना जाणी कख गै वा । पिडा बटोलि क ल्यांयों मी.... सच्ची बोदौं भुळो मी  तुम , माया नि लयान माया नि लयान । भरेन्दु नि घो मिलदू जु माया मु , देंदू जु कुई निर्मोहि । कै कि मयाली छ्यूं मा ऐकी, कै तै अपणु दिल न दियान । सैडी सैंडी रतियों मा..२ होड फरकि फरकी क ,  रात बिती जांदी रात बीति जांदी । न दिन कु चैन छ अब ये दिल मा , ना अब यूं आखियों मा नींद आंदी । पिडा बटोळी क ल्यायो मी....  अपणा आंसुं....आंसू मीन पेट उंद समै । खुद रोयों मी अर , जग मीन खूब हंसै । रूमनांदि माया म्यारि जिकुडी झुरआंदी, जिकुडी झुरांदि । तोडी माया जौन्न मीतै , किले आज , उंकी याद आंदी । किलै नि मिटदि होली ...

बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छोड़ दिया

बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छोड़ दिया । क्योंकि अब...! उन्होंने हमारे दिल के आंगन में , आना छोड़ दिया । नही थमा करती थीं जिनके कदम  कभी ,   चहल कदमी को  हमारे संग । आज संग हमारे चलाना , उन्होंने छोड़ दिया । यूं तो ना पेश आए वो कभी , राह ए मोहब्बत में खुलकर । मगर ,  अदाओं में उनके मोहब्बत के , पैमाने छलका करते थे । रहता था मस्त "मलंग"  देख कर उनके  हुस्न ए मयखाने को । उन्होंने आज मोहब्बत का , वो पैमाना तोड़ दिया । उनकी बज़्म में आज , हम है मगर ... उनके तकल्लुफ ने मेरी तरफ ,  आज मुखातिफ होना छोड़ दिया । बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छोड़ दिया । क्योंकि अब...! उन्होंने हमारे दिल के आंगन में , आना छोड़ दिया । रहेंगी सूनी , सूनी सी , यह दिल की दुनिया अब । रंग ए बहार अब , मेरी जिंदगी के ,  फीके फीके से , हुए जातें है । मेरे दिन ओ रात अब , उदासियों में घिरे जाते है । देखता है टकटकी भर ,दिल बनकर चकोर ,   उम्मीदों के आसमां पर । शायद दिख जाए वो कहीं ,  दिल का चांद.... जिसने अब मेरे शहर में आना छोड़ दिया । बहारों ने अब शायद , मुस्कुराना छो...

वफा की क्या उम्मीद रखें उनसे "मलंग"

वफा की क्या उम्मीद रखें , उनसे "मलंग"  जो दिखते हैं कुछ ,  और होते कुछ हैं ।  वो संग ए दिल होंगे ,  यह काश मालूम होता । इश्क को मोड़ देते हम ,  अपनी तन्हाइयों में । रोक लेते हम अपने कदम , जाने से उनकी वादियों में ।   ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हाय रे सफर क्या मस्त था वो ,

हाय रे सफर क्या मस्त था वो , जब हम कभी , जवां हुआ करते थे । इन्हीं राहों में गुबार ए धूल ,  हम भी अपने कदमों से ,  जब कभी उड़या करते थे ।। लाचार हुए चलने में आज , बेबस हुए कदम । इक तिनका बहुत , सहारा जो मिले । खोजती है ये निगाहें आज , उस सहारे को । जिसको नजर अंदाज  कभी , किया करते थे हम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हुआ नासूर वो जख्म , जिसकी वो दावा दे गया ।

हुआ नासूर वो जख्म , जिसकी वो दावा दे गया । बनकर वो  हमदर्द मेरा ,  दर्द वो मुझे , और दे गया । वो ही तो बना सबब ,  मेरे डूब जाने का । वरना हम तो तैर जाने में , माहिर बहुत थे । यकीन था जिस पर हमें बहुत ,  संग चलने का । वो ही आज हमें , अकेला छोड़ गया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैं तो तब भी रहा , और अब भी हूं । तेरे प्रेम का प्यासा ।

मैं तो तब भी रहा और अब भी हूं , तेरे प्रेम का प्यासा । ना बुझी थी प्यास  तब ..! और उर कंठ अब भी , शुष्क पड़े है । आओ अब तो दर्शन , दे दो कान्हा ! कितने जन्म लेने और , अब शेष पड़े है । हो जाऊं पार इस , माया के भव सागर से । जन्म मरण के इस , चक्र कुचक्र से । रख दो हाथ तुम , सर पर मेरे । मैं मोक्ष को , प्राप्त हो जाऊं । कान्हा मेरे अबकी आना ,  मेरे दुखों को हर ले जाना । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम क्या जानो ....? दीवाने दिल का ।

 तुम क्या जानो ....?  दीवाने दिल का । तुम्हें पल भर भी ना देखूं , तो बेकरार हो जाता है । यही कमजोरी है ,  मेरे इस दिल की । जो तुमसे दूर होना इसे ,  रास नहीं आता है । ना जाने क्या जादू किया है , तुमने मुझ पर । हर तरफ तेरा ही जलवा मुझे , नजर आता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सो जाओ कि रात , बहुत हो चुकी है ।

सो जाओ कि रात , बहुत हो चुकी है । इंतजार में है ख्वाब , आंखों में आने को । कही सुबह ना हो जाए ,  हसीं ख्वाब कहीं रह ना जाए । देखो चांद भी अब , कर रहा है इशारे । सज रही बरात , अब सितारों की । देखो शायद कोई तारा टूटा है  कोई किसी से शायद रूठा है । कर लो पलकें बंद अब कि ,  हो जाए वो ख्वाब पूरा । जो अभी तक रहा , अधूरा है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ना देखा तुझे दूर से...

ना देखा तुझे  दूर से ,  ना कभी करीब ही आए । तेरी तस्वीर ही है दिल में , बस...!   हम उसी से है ,प्रीत लगाए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अभी तो नया नया शहर है यह

 अभी तो नया नया शहर है यह ,       कदम संभालने में कुछ तो ,         मुश्किल होगी ही ।         पड़ जायेगी आदत ,       जब चलोगी रफ्ता रफ्ता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सीने से लगा के रखेंगे हम , तेरे दिए हर दर्द को ।

सीने से लगा के रखेंगे हम ,  तेरे दिए हर दर्द को । खुदा कसम ,  तेरे दिए हर दर्द के साथ ।  तुम , बहुत याद आते हो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

तुम रहो मेरी , ये चाहत मेरी ।

 तुम रहो मेरी , ये चाहत है मेरी । जिसे किया है  मैंने रोशन , अपनी  चाहतों के चिराग से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी हँस लिऐ खिलखिलाकर

कभी हँस लिऐ खिलखिलाकर , कभी रो लिऐ  आँसु बाहकर ।  कट गये दिन चार जवानी के यूँ ही,  फक़त चन्द साँसे ही बाकी रह गई है । अब ये भी थम जाऐगी , आखिर दम तलक तेरा नाम लेकर ॥ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

उनकी महफिल में हमने....

उनकी महफिल में हमने ,  बहुत कुछ खोया और , बहुत कुछ पाया है । ले आए बोझ भरकर दिल में , कुछ आंखों से ओझल कर । आ मेरी तनहाई गले लग जा , तुझसे मुलाकात का , सिलसिला भी अभी बाकी है । मिला क्या क्या रंज ओ गम , उनकी महफिल से ।  ये हिसाब लगाना भी, अभी बाकी है । ✍ज्योति प्रसाद रतूड़ी

गुजर जाए आज चंद लम्हें ही...

गुजर जाए आज चंद लम्हें  ही ,  सकून से वो ही सही , तेरी  आगोश में । बन जाएंगी याद वो , तन्हा  रहेंगे हम जब कभी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कितने है दिन ? ना जाने जो गुजरे तेरी यादों में ।

 कितने है दिन ?  ना जाने जो गुजरे , तेरी यादों में । अफसोस है कि...  एक भी दिन हमारा , हमारा न हुआ । के तू कहे पास आके ,  हमें कि तुम.....! बहुत नही पर कुछ ही तुम , याद आते हो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यूं तो जिंदगी ने बहुत कुछ सीखा दिया था मगर ...

यूं तो जिंदगी ने बहुत कुछ ,  सीखा दिया था मगर । बस इक कमी रह गई ,  हम शराफत न छोड़ सके । ** मोहब्बत कितनी भी कर लो ,दिल से , मगर... लोगो को सच्चे दिल वाले नहीं,  बल्कि.... अच्छी शक्ल वाले ही पसंद आते है । ** इनके मासूमियत पे मत जाना ,  बड़े जालिम है ये  कांटे बाबुल के । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम बिन बिरानें है फिजाओं में ।

तुम बिन बिरानें है फिजाओं में ,  अब वो पहली सी रंगत कहाँ । थे जब तुम संग तो ,रौनकें ही रौनकें थी ।  अब तो चारों तरफ है , खिजाँ ही खिजाँ। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

चिलाना बंद करो तुम , ऐ धूर्तों....!

चिलाना बंद करो तुम , ऐ धूर्तों....!  कितनी भी सफाई क्यों न ,  दे दो तुम अब..... कुछ नही होने वाला ।  तुम्हारी यह कोशिश बेकार है कि , तुम फिल्म रुकवाने में..... कामयाब हो जाओगे । सनातन अब जाग चुका है.... बहुत जुल्म ओ सितम , किए है तुमने । अब आ टक्करा..... बन गया हूं मैं फौलाद का अब , आग में तपते तपते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी #कश्मीर फाइल

मुकद्दर वाला होगा वो ....

मुकद्दर वाला होगा वो ,  जिसे आपकी दोस्ती हासिल है दिल से.... हम तो यूं ही चकोर बनकर , चांद को निहारते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बस इक खूबसूरत सा सफर , उसमें आप और हम ।

बस इक खूबसूरत सा सफर , उसमें आप और हम । रह गई ये आरजू भी ,दिल के किसी कोने में दफन । इस बेबसी में , करें तो क्या करें हम । मिलन हो तो कैसे.... ? आएं तो आएं कैसे..? पहरे जमाने ने , बहुत बिठाए हुए है । रहना मुश्किल है अब , इन अंधेरों में सनम ! बुझते हुए चिराग दिल के , जलाएं तो जलाएं कैसे ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वक्त करता जो वफा , आप ! हमसे भी मिलते ।

वक्त करता जो  वफा , आप ! हमसे भी मिलते । करते गूफ्तगू मिलकर , हाल ए मिजाज पूछते । जुबां खामोश होती मगर , मुलाकात फिर भी होती । आखों से आखें मिलती दिल से दिल । मगर मायूस हूं अब कि तुम , बिना मिले जा रहे हो जब । ☹️ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बदल गया मौसम भी और , वो इंसान भी ।

बदल गया मौसम भी और  , वो इंसान भी । जिन्हें गुमान था कि,  हम नही बदलने वाले । हुआ आज अहसास और , देख लिया भी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कैसे करे इश्क यहां ,

कैसे करे इश्क यहां ,  इस...! बेईमान हुस्न की , दुनिया में । सेज उल्फत की ,  रकीबों की खातिर सजी हो ।  और...! बनकर हम कदम , संग वो हमारे चले । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ये तेरी ख़ामोशी , ये तेरा उदास मन ।

ये तेरी ख़ामोशी , ये तेरा उदास मन । कहीं हमारी जान  ना ले ले सनम । नहीं बर्दास्त मुझे कोई भी  तेरा गम । तुम क्या जानों तुम क्या हो मेरे , मेरी जिंदगी हो तुम  । एक अहसास है प्यार का जो , तेरे दिल से ही तो पाया है मैंने । तुझसे मिलने के बाद ही तो , जिंदगी को जाना मैंने । किस कदर छुपा कर गम , मुस्कुराते है लोग , यह राज है जिंदगी का एक खूब सूरत इल्म ,  वो तुझसे ही जाना मैंने । तू प्यार है किसी और का , तेरी दुनिया तेरे लोग । खुश रहो तुम सदा , अपनी प्यार भरी दुनिया में । कहीं मेरा दर्द ना बन जाए , तेरे दिल का कोई रोग । तेरी दुनिया से , मै अब चला जाऊंगा । सपना  समझ कर , भूल जाना मुझे , अब न तेरी दुनिया में , मैं वापस आऊंगा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ बदला बदला सा यार ..

कुछ बदला बदला सा यार ,  आज नजर आ रहा है । वो दौर पहली मुलाकात का ,  मुझे आज याद आ रहा है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

पा के प्यार उसका कैसे , भूल जाऊँ मैं ।

 पा के प्यार उसका कैसे ,  भूल  जाऊँ मैं ।  जिसने कई रातें गुजारी हो ,  मेरे इंतज़ार में । हां ये बात अलग है अब , वो पहला सा प्यार नहीं । मगर रह जाए वो मेरे बिन जुदा , यह मुमकिन भी नही । दिखने चाहिए इक दूजे को ,  पल पल झलक इक दूजे की । वरना दिल , बहुत घबरा जाता है । रहे साथ यह भी तो , नही सुहाता है । यह कैसा प्यार है मेरे प्रभु !  यह मुझे समझ में , क्यों नहीं आता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जीने का तरीका बदला तो

 जीने का  तरीका बदला तो ,  दुनिया वो जो , हमकदम चलती थी ।  आज वो हमें , न जाने क्यूं ? बेगानी सी ,  लगने लगी है । 🤔 जीने के नए तरीके ढूंढ , ऐ  जिंदगी ! ताकि हम कुछ बन जाए , उतरे है आज , जिसकी नजरों से हम ,  उन्हीं के दिल में हम उतर जाए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी जिद के आगे , आरजू अपनी दिल की को ,

 तेरी जिद के आगे , आरजू अपनी दिल की को ,  दफन किया हमने । तूने जैसा चाह , वैसा ही किया हमने । मुरझा गए क्यों वो फूल आज  , मेरी हसरतों के।  गुमान था जिन पर,  मुझे तेरी चाहत का।  वफ़ा पर तेरी मुझे भरोषा है बहुत , बस रंज बहुत है तेरे यूँ बदल जाने का। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कहूं क्या , क्या गजब लिखते हैं ।

कहूं क्या , क्या गजब लिखते हैं । किसी का हो या खुद ही , आप यह करामात खूब करते हैं । तारीफ करूं तुम्हारी उंगलियों की , जिसमें होती है कलम , यह करिश्माई । या दिल के तेरी जिसमें तुम ,  यह ज़ज़बात रखते हैं । जो भी हो जैसा भी हो मगर तुम ,  बहुत कमाल करते हैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

भटका ना अपनी नजर...

भटका ना अपनी नजर , किसी के रूप में यूं । दर ब दर..... चाहत और दिल जिसका अच्छा हो , उसकी क़दर कर । है वो तेरे ही करीब इतना कि , अपनी नजर उसके करीब कर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी