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ये इश्क के मारों का हाल देखा है

ये इश्क के मारों का हाल देखा है , यह किस कदर टूटा है । न चाह जीने की , न उम्मीद मरने की । कौन आए -जाए फुर्सत किसे , ग़म ए समंदर से निकलने की । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हम तो यूं ही , दिल लगा बैठे थे।

हम तो यूं ही , दिल लगा बैठे थे। पता चला वो तो , खाली थे । दिल अपना वो , कहीं और गवां बैठे थे । बच गए इल्ज़ाम-ए-बेवफाई से हम । वरना खामखां बदनाम हम , तेरे शहर में हो जाते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी "मलंग"

न हैरान हो , न परेशान हो ऐ "मलंग

न हैरान हो , न परेशान हो ऐ "मलंग" दिन चार ही है , लाए हम मांग कर  । एक  गुजार दी खेल में , थी उम्र जो बाल की । दूसरी गुजरी काम में , थी जो उम्र यौवन की । तीसरी अब चल रही है ,  है जो उम्र न इधर की , न उधर की । थका हारा , बस हिसाब लगाना उम्रभर का । कंपकंपाते हाथों से ,पसीने की बूंदों को चेहरे पर से पोंछना  । लड़खड़ाते कदमों को , सहजता से रखना । कमर के झुकाव को,  कुछ देर ठहर कर , तनकर खड़ा होना।  और इंतजार अब , उस चौथे दिन का । आए कब वो , और सोए आराम से हम जी भर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

15 अगस्त सन 1947 को ,

15 अगस्त सन 1947 को , हम इस दिन आजाद हुए थे । हां ऐसा सुना था पर महसूस नहीं हुआ । होता भी कैसे ? दबे कुचले रहे सदियों से।  पहले बाहर वालों ने दबाया था , और 47 के बाद अंदर वालों ने । अब भी उनके कदमों के निशाँ, मेरे आंगन से नहीं मिटे । देखकर उन्हें..। यादों का वो भयानक मंजर , रह–रह याद आ जाते है । सभी बड़े बड़े ठाकुर , तख्ती हमारे नसीबों की जो लिख जाते है । अभी कहां उभरे हम आख़िरी जन है हम जो जंगल के । लगाकर हर कोई फेरा अपना ,चुनाव पर । बनाकर मूर्ख हमें ,और मुकद्दर अपना चमका जाते है । आज स्वतंत्रा दिवस है , हां ऐसा सुना था पर , महसूस नहीं हुआ । हां ऐसा सुना था पर , महसूस नहीं हुआ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से ।

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से । थोड़ा आ ऐ जिंदगी ! संग मेरे , तू भी सुस्ता ले । रहा है साथ तेरा जन्म से , और रहेगा मरण तक । सफर लम्बा रहा है , अब तलक । न जाने आगे रहेगा साथ , कब तलक । आ बैठ पास उर से निकल , पढ़ तो ! प्रभु ने भाग्य लेख में मेरे , क्या क्या रचना रची है । ढल गया हूं जिस्म से , देख तो । मेरे चेहरे पर चमक , कितनी बची है? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी"मलंग"

दर्द छुपाने का हुनर जो सिख लिया है हमने । कसम से....!

  दर्द छुपाने का हुनर जो सीख लिया है हमने । कसम से....! शिकायत की अब किसी से , कोई गुंजाइश न रही । हर कोई अब , हाल ए मिजाज ब खुशी पूछ जाता है। छुपाकर शिकन चेहरे का , दुरुस्त हैं हम कह लेते है । अंदर की हम ही जानते है , हां बाहर से खुश रह लेते है। निभाते है अब फ़र्ज़ "मलंग" , जब तक जी रहें है । सांसों का आना जाना ही है अब , मन से कहां अब जी रहें है हम । कवि हूं न यूं ही ख्यालों में ही , डूबा रहता हूं । सुबह न शाम की खबर ,  क्या पता क्या खा , क्या पी रहे है हम ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

काश के तुम हम रूबरू मिले होते ।

काश के तुम हम रूबरू मिले होते ,जिंदगी के दीए फिर न यूं उदास होते । कहूं क्या मुकद्दर का के काश , दिन ओ रात हम तुम संग में गुजारे होते । बहुत आग है तड़प में , जलता है जिया मेरा । काश तू आती , मेरे तन से लिपट जाती । बुझ जाती आग ये तड़प की , मैं चूमता बदन तेरा । खिल उठती आशाएं मेरी , झूमता गाता मन मेरा । काश के तुम हम रूबरू मिले होते , जिंदगी के दीए फिर न यूं उदास होते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी "मलंग"

रक्षाबंधन विशेषांक

भाई : वर्षों वर्ष रहे सलामत मेरी बहना । दुख न आए कभी करीब इसके , प्रभु ! तुम सदा इसके संग में रहना ।। बहन : प्रभु ! इस बहना का तुमसे बस , यही है कहना । सदा मुस्कुराता रहे भाई मेरा, तुम सदा इसके संग में रहना ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

मेेरा भय्या मेरा राज दुलारा ।

मेरा भय्या मेरा राज दुलारा , बहना की आंखों तारा । सलामत रहे तू जग में ,  किस्मत से है मैंने , तुझ सा भय्या पाया । तू है मेरा जीवन सारा , तू ही मेरी कश्ती का सहरा । तू ही मेरी खुशी सुहानी , तुझ से मेरा मायका प्यारा । मेरा भय्या मेरा राज दुलारा , बहना की आंखों तारा । रहें चिरंजीवी सदा तू , प्रभु हो सदा तेरा रखवाला । दुख दरिद्रता न आए , पास तेरे । खुशी में झूमे  तू , बन कर मतवाला ।  रक्षा बंधन की ढेरों शुभकामनाएं ! ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम रूठे हो हमसे हम नहीं..

तुम रूठे हो हमसे हम नहीं ,  न जाने क्यों ?  बात करनी तुमने छोड़ी है , हमने नहीं । फुर्सत हो तो चले आना , दिल मेरा अभी भी, तेरे इंतजार में धड़क रहा है । कोई भी नहीं हमारा ,  इस हजारों की भीड़ में । इससे अच्छा तो था,  अकेले ही करते सफर हम जिंदगी का । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरे प्यार में पागल ,हुआ जा रहा हूं मैं ।

 तेरे प्यार में पागल ,हुआ जा रहा हूं मैं । ना जाने क्या कशिश है तुझ में ,  तेरी और खींचा चला जा रहा हूं मैं ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बहुत सी बातें है , जिन्हें सह रहा हूं मैं ।

बहुत सी बातें है , जिन्हें सह रहा हूं मैं । था जिसका कभी मैं , हम बिस्तर । आज उसकी नजरों में ,अछूत बनकर रह रहा हूं मैं ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

चलो अच्छा हुआ कि हम , वक्त पर सम्भल गए ।

चलो अच्छा ही हुआ कि हम , वक्त पर सम्भल गए । कुछ देर और होती तो , हम कहीं के न रहते । इतना क्या बुरा कहा था , प्यार ही तो  मांगा था । छिटक कर  वो हाथ अपना ,और पल में गैर बन गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी "मलंग"

ये न पुच्छो कि क्या हुआ...

  ये न पूछो कि क्या हुआ, हम बता न सकेंगे । कुछ कहें हम किसी से , और वो रुसवा हो । यह हम , सह न सकेंगे । ✍️ मलंग

होऊंगा कब मैं रुबरु तुझसे , सुना है तू बेवफा नहीं

होऊंगा कब मैं रूबरू तुझसे , सुना है तू बेवफा नहीं । मिला है ये जो मुकाम मुझे , न जाने बसर हो कब तलक । आए न जाने तू , कब तलक ये मौत ! मुझसे अब इस जहां में , रहा जाता नहीं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी "मलंग"  

एक वहम पाला था मैने...

 एक वहम पाला था मैने कि ,  बदल गए है वो अब । हमारा ख्याल हमारे जज्बात का ,  उनको होने लगा है एहसास अब । देखा जो आज उनको किसी गैर से ,  छुप छुप के बतलाते मुस्कुराते । हमारे पास जाते , हमीं पर चिल्लाते । वो वहम आज , दिल से दूर हो गया ।। अब तो नफरत सी हो गई है ,  मोहब्बत के नाम से । दगा बाज है वो ही जो कसम खाते थे कभी ,  वफ़ा के नाम से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी (मलंग)

यादों के समुद्र में....।

  यादों के समुद्र में डूबा हुआ , इक सीप हूं मैं । कोशिश की बहुत जलूं मैं , उल्फत में , आफताब बनकर । हो न सका जो रोशन कभी , वो दीप हूं मैं ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

काश जमाने की रुसवाई का हमें डर न होता....!

काश जमाने की रुसवाई का हमें डर न होता....! तुम हमारे दिल के करीब हो यह ,  दुनिया से हमने छुपाया न होता । आज खुशी का आलाम है यह जो....! हम तुम ने इसे मिल जुल , कर मनाया होता । तुझे भूल चुके थे कब के हम शकुन की खातिर....! काश कि तुम्हें खोकर , फिर से हमने पाया न होता । हम तो ना जुटा पाए साहस खुद में , तुम्हें अपनी खुशी में शरीक करने की । करो शामिल तुम हमें क्या खुशी में अपनी ,  यह हक काश हमने गंवाया न होता । अब तो देर बहुत हो चुकी है "मलंग"  काश के वक्त रहते हमने , हर मामलात को सुलझाया होता । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उठा जो चिलमन

 उठा जो चिलमन , इक झलक सी नजर आई हो । हुए बेपर्दा जो तुम , कुछ सिमटी सी कुछ शरमाई हो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

करवटें बदल बदल कर अब

करवटें बदल बदल कर अब , मेरी रात गुजरती है । उफ्फ ! काश कि वो आएं , और कोई बात बने ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कहूं क्या किस कदर अब बसर हो रही है जिंदगी

 कहूं क्या किस कदर अब , बसर हो रही है जिंदगी । बस कट रही है किसी तरह से , तन्हां तन्हा...! ख्यालों में से होकर अब , गुजरी रही है जिंदगी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

है कोई जो अपना भी नहीं मगर

है कोई जो अपना भी नहीं मगर ,  अपने से कम भी नहीं । मोहब्बत है उससे बेपन्हा  , जताना भी चाहूं और नही भी । हक भी नही उस पर मेरा कोई मगर, जताना भी चाहूं , और नही भी । दिल में ही रखा उसे हमने छुपाकर ,  दुनिया की नजरों से बचा कर । एहसास ही बहुत है उनका , मेरी मोहब्बत की खातिर । दुनिया को ये ,  बताना भी चाहता हूं और नही भी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

मानो सदियां गुज़र गईं

 मानो सदियां गुज़र गई हो , तुमसे मुलाकात हुए । अभी कल रोज की ही तो बात है ,हमें तुमसे मिले हुए ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैं अब बुझ जाऊंगा...

मैं अब बुझ जाऊंगा , क्या पता कब । ठहर कुछ देर और , ऐ मेरे दोस्त ! मालूम क्या कब , थम जाए ये सांसें । और तुझे लौटने में , वक्त लग जाए ।। फिर गिला रहेगा तुझे खुद से ही , के काश मैं  होता । और रहेगी बेचैन मेरी रूह भी , के काश तू होता ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब तो मक़सद ही न रहा कुछ ,जीने का ।

अब तो मक़सद ही न रहा कुछ ,जीने का । बस....! अब तो बेवजह ही , जीती लाश ढोए जा रहा हूं मैं । बची हुई उम्र न जाने कब ,खत्म होगी । बस....! अब इसी इंतजार में , जिए जा रहा हूं मैं । हैं तो बहुत अपने आसपास मेरे , मगर खामोश है सब.....! करे कोई गुफ्तगू मुझसे भी , क्यूं यह आश किए जा रहा हूं मैं । खुदा भी रूठ गया है , शायद मुझसे । अपनी आगोश में काश , भर लेता वो मुझे ।  तो , क्या हर्ज था ? ना जाने वक्त क्यों  , इतना लगा रहा है वो । यही हर दम , सोचे जा रहा हूं मैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कोशिश तो बहुत की...

 कोशिश तो बहुत की जवां वक्त लौटाने की ,  कमवक्त....! वक्त के साथ साथ सूरत ए हाल भी बदल गए । कैसे कटे अब वक्त खामोश होकर । हम तो वो थे...! जिनके आने से महफिल , रोशन हुआ करती थी । बदले वक्त में अब , कहां वो नूर रहा । पास पास है सब माना मगर ,  दिल से.... हर शक्स हमसे अब , दूर ही रहा । शोर बहुत है इस शहर  मगर ,  जो पुकारे मुझे चाह से.... वो आवाज अब , मुझसे दूर ही रहा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ऐ मेरे बचपन तू लौट आ , मुझे तेरे बहुत याद आ रही है ।

ऐ मेरे बचपन तू लौट आ , मुझे तेरे बहुत याद आ रही है ।  मां का लाड बाप की डांट, भाई बहनों का प्यार । संग सखाओं की हमझोली , वो नंगे पांव का चलाना । फटा झगा तन में , वो शान से चलाना कुचे कूचे । आ लौट आ मेरे बचपन , मुझे तेरे याद आ रही है । वो खाने की थाली मां की परोशी ,  वो नखरे मेरे खाना ना खाने के । ना पसंदी में उठकर , खाना छोड़ना और  रूढ़ जाना । मां का मनाना , प्यार से पुचकारना । अपने हाथों से फिर , मुझे खाना खिलाना । नलहना धुलाना , प्यार से संग अपने बाजार घूमांना । हाय कितना अच्छा था , बचपन का वो गुजारा जमाना । ऐ मेरे बचपन तू लौट आ , मुझे तेरी बहुत याद आ रही है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तन्हां भी नही हम , और न महफ़िल ही ।

तन्हां भी नही हम  , और न महफ़िल ही । दूर हो  तुम मगर  हो दिल के करीब , मेरे लिए यही काफी ही ।  हो जाती है गुफ्तगू तुमसे रह रह कर....! बस तुम अपने हो मेरे , मेरे लिए यह एहसास काफी ही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुझमें और मुझमें...

तुझमें और मुझमें बस ,  यही एक बराबरी है । कि.......! तू मुझमें , और मैं तुझमें हुं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ तो बोल दिया होता तारीफ में हमारी।

 कुछ तो बोल दिया होता , तारीफ में हमारी । हम कौन सा तुमसे , नजराना मांग रहे थे । दर ओ दीवार भी अब अजीब लगती है,  इस दिल ए मकाम की । खुला ही है ये कई सदियों से , एक तेरे इंतज़ार में । आ भी जा अब , बर्दास्त के बाहर है  तेरा इंतजार इसे । ना जाने कब , रुखसत हो जाए "दिल" मौसम ए बहार से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हां यही तो तुम्हारी ख्वाइश थी कि , हम गैर हो जाएं ।

 हां यही तो तुम्हारी ख्वाइश थी कि , हम गैर हो जाएं । तभी तो हमारी मजबूरियों का तुमने , फसाना बना दिया । गर समझते तुम हमें अपना , तो कब का माफ कर देते । मगर.... मगर तुम ने तो हमारा , बज़्म ए महफ़िल में तमाशा बना दिया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ गलत फामियां....!

कुछ गलतफमियां पाल ली है ,  तुमने अपने जहन में इस कदर । कि चाहकर भी अब हम ,  खुद को बेगुनाह साबित , कर सकते नही ।। खास तू थी , है और रहेगी , हमारे लिए सदा । रूठ कर तुम गई हो , हम नही ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उसने कहां था कभी , दोस्त बनते वक्त ।

 उसने कहां था कभी , दोस्त बनते वक्त । मुझे न चाहना कभी बेइंतेहा...! मेरा भरोसा नही ,  कभी भी छोड़ कर , चली जाऊंगी ।। आज देख भी लिया है और,   जी भर रो भी लिया है । सिसकियां भरते रहे हम रातभर ,  और सोचते रहे यही । के हस्र यही होना था "मलंग" दिल लगाकर उम्रभर रोना था । ये तो होना ही था , हो लिया , हो लिया , हो लिया । .....ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हां ख्याल तो बहुत रहा , उनको मेरा बस ।

हां ख्याल तो बहुत रहा , उनको मेरा बस । मैं ही , बेख्याल निकला । कि उनका किया इंतजार हमने ,बेसब्र होकर । और वो हरजाई सनम , न मिले कसम से । वो बड़ा दगा बाज निकला । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

तुमसे ना हो सकी मुलाकात जी भर ।

तुमसे ना हो सकी मुलाकात जी भर , बस यही मलाल रहेगा मुझे उम्र भर । नादान भी तुम इतनी ना बनो,  कि तुम जो समझ न सको । दायरे भी है कुछ ,  खामोशी से गुजर कर । समझ लो दिल की सदा ,  आहें भी सामिल है इसमें। तू मेरा दिलवर तो नही , मगर तेरे बैगर मेरा , दिल भी तो नहीं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

रूठे हुए है आज न जाने क्यों वो ?

 रूठे हुए है आज न जाने क्यों वो ? जो मेरे आंखों में कभी , ख्वाब बनकर रहते थे ।  ख्वाब ही तो थे , कब किसके हुए । चलो अच्छा ही हुआ चले गए । अब नहीं है तसव्वुर में मेरे , उनका अक्स । बे फिक्र सा हुआ दिल अब , कुछ हल्का हल्का सा हुआ । अब दिल ने तोबा कर ली  लागी से ,  और कहे अब आगे नहीं, और अब  बस । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी 

मैं समय के साथ बदला हूं , या समय मेरे साथ ।

मैं समय के साथ बदला हूं , या समय मेरे साथ । जो भी हो पर अब , अंतर पहले से बहुत हो गया है । लाली गुम और , गाल गुठली आम हो गया है । उमर अभी खास नहीं मगर , लगते बुजुर्ग 60 पार हो गया है ।। मुंह में दांत नहीं और ,पेट में आंत नहीं । सब खाली-खाली सा मन का अब ये, मकाम हो गया है । जो भी हो पर अब , अंतर पहले बहुत हो गया है । हमसे कुछ ज्यादा ही रुष्ठ अब , शायद भगवान हो गया है । कांपते हाथ और , लड़खड़ाते कदम ,मानो भूकंप आया हो हल्का सा जैसे । भय से रक्त का रगों में , तीव्र संचार हो गया है । जो भी हो पर अब , अंतर पहले से बहुत हो गया है। सब खाली-खाली सा मन का अब ये, मकाम हो गया है । हमसे कुछ ज्यादा ही रुष्ठ अब , शायद भगवान हो गया है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कहूं क्या इस दर्द ए हाल में ..

 कहूं क्या इस दर्द ए हाल में ,  अब अल्फाजों ने , जुबां से  रुखसत ले ली । आ करीब कुछ और हमारे ,  वक्त न जाने कब , हमें  खामोश कर दे ।। ठहर कुछ देर और ऐ जिंदगी ! कुछ देर और  उन्हें , मैं  गले से लगा तो लूं ।। जी भर के जी लूं , कुछ और अपने जी संग ।  इन शबनमी आंखों से मैं ,  कुछ देर और उन्हें , जी भर के देख तो लूं ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

गुजर गए वो वक्त अब .....

 गुजर गए वो वक्त अब ,  अच्छा या बुरा जैसा भी रहा होगा । फिक्र तो अब आगे की है कि , वक्त अब आगे का कैसा होगा ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यादों के झरोखोंसे आज...।

यादों के झरोखों से आज, तेरी याद चली आई है । ऐ मेरे बचपन तू , अब तो लौट आ । कई बहार आई और गुजर गई , इस रंगीन जमाने में । बे रंग सी जिंदगी है अब हमारी , सदियों की तन्हाई है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी कातिल आंखें है..।

तेरी कातिल आंखें है , यह लोग कहते है । इक बार इधर तो देखो ,ये हुस्न ए बाहर । हम इन आंखों से, कत्ल होना चाहते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वो मेरे आंसू थे ...

वो मेरे आंसू थे ,  जो छलक गए अंखियों के झरोखों से ।  आह...!  आई किसी की याद आज , सच कई दिनों से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

जो कहते थे हम से कल मिलते है ...।

जो कहते थे हम से के , कल मिलते है । जमाना गुजर गया मगर...! उनका कल , आज तक आया नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

छुपाकर दर्द अपना...

छुपा कर दर्द अपना ,  मुश्किल से जी पा रहा हूं मैं । कहीं वो परेशान न हो जाए ,  जान कर मर्ज मेरा..! इसलिए , मुस्कुराए जा रहा हूं मैं ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज हर इजाम तेरा , ओ बेदर्द !

आज हर इलजाम तेरा , ओ बेदर्द !  हम अपने नाम किए जाते है । जा तूझे माफ किया , इलजाम तेरी बेवफाई का हम , अपने सर किए जाते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी घबराया तो , कभी शरमाया हूं मैं

कभी घबराया तो , कभी शरमाया हूं मैं । कभी चिलमन को हटाया तो , कभी खुद को उसमें  छुपाया हूं मैं । दिल में हुआ था कुछ कुछ , देख कर उन्हें  मेरे । शायद रहा हो वो "इश्क" जिसे जमाने से अब तक ,छुपाया हूं मैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुझे नींद नहीं आएगी ।

मुझे नींद नहीं आएगी अब ,  न जाने क्यों ? इक आग , बुझी बुझी सी अब । सुलगती सी , नजर आ रही है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी कभी दर्द भी हंस लेता है मेरा ।

 कभी कभी दर्द भी हंस लेता है मेरा , तेरी बेरूखी पर । के अंजाम ये वफ़ा का , क्या खूब हासिल हुआ हमें । इतने भी  गुस्ताख तो नही थे हम के ,सजा मुआफी के काबिल भी न हो । अफ़सोस होता है मुझे ,तेरी उन बेरूखी नजरों पर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी याद आ रही है ....!

 तेरी याद आ रही है ....! ये ही सच है जो कह नही सकता मैं , जमाने से । डर ना होता तेरी रुसवाई का तो ,  कब का ले आता तुझे मैं , अपने कूचे में । (पहले चलने वाली से तो पूछ लो 😂😂) जरूरत ही क्या , उन सवालातों को पूछ कर । जवाब जिनका हम जानते हैं । इनकार ही था तब और अब , आगे भी । बस नशीबों में आहें ही तो है , मेरी हमदम बनकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज मैं तुम्हें अपनी आंखों में ।

आज मैं तुम्हें अपनी आंखों में , बंद कर सो जाऊंगा । जो कभी ,  हकीकत में मुकम्बल ना हो सके । तू आयेगी क्या मेरे पास ,  मेरा सुहाना ख्वाब बनकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी