कुछ यादें ही है आज बस ! गुजरे जमाने की । विरासत में हमें दर्द के सिवा , और क्या मिला ? बदल गए है सब साथी बचपन के , और कुछ छोड़ गए है । था रिश्ता जिनसे एहसासों का कभी, वो भी अब कहां रह गए है ? हर कोई व्यस्त है , किसी को किसी के दर्द का , अब एहसास कहां ? एक हम है ,जमाने भर का दर्द लिए , अश्क जल ओंस सी , बटोर लेता हूं । और इन्हीं को दिल की हांडी में , यादों की आग पर , तपा लेता हूं। लगी प्यास सकून की तो बुझे कैसे ? हर तरफ दिखते है लुटेरे चैन के । सोचता हूं के अब , रुकसत हो जाऊं मैं , खुदा तेरी दुनिया से । मगर एक मन ये भी कहे कि हम , उन्हें छोड़ कर ऐ खुदा ! तेरी दुनिया से , जाएं तो जाएं कैसे ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी