दुःख तो यही होता है: जब अपनों ने हमें ठुकरा दिया, तब गैरों की चाहत बने हम। चाह जिसे उम्र भर, उसने हमसे नज़रे चुरा लिया। न होती जो मुलाकात, उस अजनबी से, तो जीते कैसे हम। रहते ग़म-ए-दर्द में बेहोश और, घुट-घुट के मर जाते हम। न मिला प्यार जब अपनों का तो, गैरों में हमने खुशियाँ तलाश लिया। क्या खोले राज़, क्या छुपाएँ हम? अपना क्या? कुछ भी तो नहीं। मेरा जीवन तो, खुली किताब है। पढ़ने वाला हो तो कोई, पढ़ ले जी भर। बस छुपा रखा है इक पन्ना वो, दिल के कोने में कहीं। पढ़ सकता नहीं उसे कोई, जो समझ सके मुझे, और मेरे जज़्बात को, सिर्फ़ पढ़ सकता है उसे वो ही। ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी