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बने याद कोई ऐसी की , ये मन कभी न बुझाने पाए ।

बने याद कोई ऐसी की ,  ये मन कभी न बुझाने पाए । आ बैठ पास मेरे,   ऐसा कोई समा बनाये । न तुम कहो कुछ हमसे,  न हम कहें तुमसे । और मुलाकात हो जाए । शब ए आलम ,  आज बहुत खुशनुमा सा है । शायद इन्हें खबर थी ,  तेरे आने की । गिरा दो चिलमन अपने चेहरे पर ,  कही बहारों की नज़र न लग जाए । आ बैठ मेरे पास ,  ऐसा कोई समा बनाये । वर्षों से है प्यासा ये मन ,  प्रेम रस थोड़ा नीर बहाएं । बुझे हुए मन में हम अपने ,  प्रेम का कोई दीप जलायें । बने याद कोई ऐसी की ,  ये मन कभी न बुझाने पाए । आ बैठ पास मेरे,   ऐसा कोई समा बनाये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

हमें ख्याल ही नही रहा कि :

हमें ख्याल ही नही रहा कि :    थक गई है कलम अब , इसमें वो बात कहां । ढल कर निखर जाए, किसी के मन की किताब में । हुआ अहसास आज , जब पूछ लिया अचानक , हमने अपने दिल से ।  शायद ही कलम अब उठे , और कुछ लिखा जाए ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हो रहा है ना जाने क्यों हमको , यह एहसास ।

हो रहा है ना जाने क्यों हमको , यह एहसास । तेरी बज़्म ए दिल के अब ,  हम धुंधले सितारे  है । जान न सके तुम मेरी मजबूरी , और हमें फरेबी समझ बैठे । चाह जिसने तुम्हे ऐ दिल, हम वो ,तकदीर के मारे है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

रफ्ता रफ्ता ही सही ,उम्मीदें बांध कर रखिये ।

रफ्ता रफ्ता ही सही , उम्मीदें बांध कर रखिये । यह वक्त है बुरा यारों , कट ही जाएंगे । जलाकर आशाओं के दीप , दिन भले आ ही जाएंगे । होगी फिर वही उमंग ,  वही तरंग जीवन की । महक उठेगी सुंगध ,  मन मधुबन की । बसंत फिर जीवन , में लौट आएंगे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ला-ईलाज़ ए गम है , दिल बना है नासूर ।

ला-ईलाज़ ए गम है , दिल बना है नासूर । जिंदगी जख्म और , दिए जाती है । न जाने कब , मेरे मालिक तू । भेजेगा फरमान , मेरी मौत का । इसी इंतज़ार में , "मेरी" ।  दिन और रात, गुजर जाती है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज मायूस सी है, जिंदगी ।

आज मायूस सी है, जिंदगी ।  ऐ वक्त थोड़ा सा ही सही , मुझे मेरे बचपन की , रोशनाई लौटा दे । बे-सुर बे-रंग लगने लगा है , अब यह जहां न जाने क्यों ? ये वक्त ! मुझे , हल्का सा ही सही । मुझे मेरी वो रंगीन महफ़िल , वो रुबाई लौटा दे ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

वो नही तो कोई और सही ।

 वो नही तो कोई और सही ,  दिल में उम्मीद जगाए रख । आज नही तो कल सही , रहगुजर कोई और तलास कर ,  इक नई मंज़िल के लिए ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी दिल में उम्मीद जगाए रख । आज नही तो कल सही , रहगुजर कोई और तलास कर ,  इक नई मंज़िल के लिए ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इक तूफान लिए हूं ,सीने में कर दफन मै ।

 इक तूफान लिए हूं , सीने में कर दफन मै । डर है कि कहीं उमड़ ना पड़े , सैलाब क़यामत का । मेरी आंखों के समन्दर से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दर्द-ओ-ग़म-ए-दिल , मैं अपना छुपाता रहा ।

दर्द-ओ-ग़म-ए-दिल , मैं अपना छुपाता रहा ।   अपना समझ कर , आया था मैं यहां ।  और बेगाना हुआ मैं ,   "तेरी महफ़िल में " बेगानों पर रहा करम तेरा , मिली उन्हें पन्हा ।   "मोहब्बत की तेरी" हम तो सिर्फ , नाम के ही रहे तेरे अपने । तेरी चाहत में तो  , कोई और थे । हम तो यूँ ,  ही बदनाम हुए ।    "तेरी महफ़िल में" ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

लौट के जाना ही बेहतर है ।

लौट के जाना ही बेहतर है ,  तेरी बज़्म से । सुना है तेरी इस महफिल में,  मोहब्बत बिका करती है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

पहेली बनी है दर्द दिल का ,ज़ख्म भरे तो सुलझाऊं ।

पहेली बनी है दर्द  दिल का , ज़ख्म भरे तो सुलझाऊं । टूटा हुआ है तार दिल का ,  जुड़े तो कोई संगीत सुनाऊं । गैरों की खातिर मुस्कान है उनकी , मेरी खातिर अंगारे । धधक रही ज्वाला दिल में , हो शांत तो कोई दीप जलाऊं । पहेली बनी है दर्द दिल का , जख्म भरे तो सूलझाऊं ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हमसे रहा नही जाता ,देखकर बे रुखी उनकी ।

 हमसे रहा नही जाता ,  देखकर बे रुखी उनकी । रहे वो खामोश , यह हमसे से साह जाता नही नही । पता नही क्यों रहने लगें है वो,  हमसे दूर दूर आजकल ,  यह समझ में आता नही ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बहुत मुश्किल भरा ,सफर है ये जिंदगी का।

बहुत मुश्किल भरा ,  सफर है ये जिंदगी का। हर मोड़ जोखिम भरा है , जाने कब थमेगा , ये तूफान क्या पता । क्या है तेरे दिल मे ऐ खुदा,  अपनी रज्जा तो बता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न जाने क्यों मेरे मन का चाँद,

न जाने क्यों मेरे मन का चाँद, घुमता है तेरे ही चारों ओर । जबकि मालूम है मुझे ,  तू दुनिया है किसी ओर की ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरी ज़िद है मेरे पास न आने की ।

 तेरी ज़िद है ,  मेरे पास न आने की । तो ज़िद मेरी भी है , रहुंगा तेरे ही इन्तजार में। देखता हुँ सब्र तेरा टुटता हैं ,  य मेरे इन्तजार का ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

नही है वक्त अब उनके ,पास तुझे पढ़ने का ।

 नही है वक्त अब उनके ,  पास तुझे पढ़ने का । हो गए काफी दिन उन्हें , तुझको बिसराये हुए । ऐ मेरी दिल की किताब , अब तू ,चुप से बंद हो जा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

धधक रही है ज्वाला जी में, अश्रु बने अंगारे है ।

धधक रही है ज्वाला जी में,  अश्रु बने अंगारे है । उठो वीर अब लांघ चुके वो ,  अपनी सीमा सारी । ध्वज केसरी , अस्त्र-शस्त्र हाथ में । धर्म रक्षण की । अब कर लो , तुम तैयारी । जयघोष शंख पांच मुखी को तुम । गुंजा दो अब । कूचे कूचे , हर  गलियारों में । बहुत खेल लिए वो , खेल रक्त रंजित का । पूरी हो गयी सीमा अब , सहन की सारी । उठो जागो ! चिरनिंद्रा से । महासंग्राम की अब ,  कर लो तुम तैयारी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कठिन है डगर , लक्ष्य अटल है ।

कठिन डगर है , लक्ष्य अटल है ।  सोये है जो "सनातनी" ,उन्हें जगाना है । सनातन धर्म ध्वज ,  "अखंड भारत में" फिर से लहराना है ।  कड़ी से कड़ी जोड़ कर ,  घड़ी फिर से वो लाना है ।  हो "भगवा" अखण्ड भारत बर्ष में , तिरंगा संग लहराना है । सदियों से तोड़ा है मरोड़ा है , हमारे दया भाव संग , दुश्मनों ने बहुत खेला है । अब सजगता से बदलो पासा , विजय परिणाम हमारा है । इंच एक भी , हटो न पीछे ,  नया इतिहास बनाना है । कठिन डगर है , लक्ष्य अटल है ।  सोये है "जो सनातनी" , उन्हें जगाना है । सनातन धर्म ध्वज , अखंड भारत में ,  फिर से लहराना है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुझे तुम से , कुछ नही चाहिए ।

मुझे तुम से , कुछ नही चाहिए । बस तेरा साथ , उम्र भर चाहिए ।  रहे तुम खुश सदा , मुझे तेरा गम चाहिए ।  बस यूं रहना करीब , सदा मेरे दिल के । मुझे तुमसे सिर्फ , तेरा दर्श चाहिए । आ जाये तू करीब , वक्त की महर हो । लगा के गले से हमें , तेरी खुश्बू की महर चाहिए । यूँ तो समय की बिसात है , ये जहां ।  मुझे तेरे प्यार का इक छोटा सा ,जहां चाहिए । है चाहत तू मेरे दिल की ,  यूँ ही ये बनी रही उम्र भर । मुझे अपनी चाहत की , तुम से उम्र चाहिए । तूम साथ ही रहोगे मेरे , यह वादा न सही । साथ न छोडोगी तुम मेरा कभी , वादा तुमसे हमें यह चाहिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

गज़ब तमासा है "प्रीत" इस दुनिया का ।

 गज़ब तमासा है "प्रीत" इस दुनिया का । जुड़ने थे रिश्ते कहाँ , और जुड़ गए कहाँ । मुद्दतों से रहा जो खिदमतगार शौहर ,  वो फकीर बन गया ।  कमवक्त इश्क भी क्या चीज़ है , आज महबूब तेरा , रकीब बन गया ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल के मुआमले में नाजुक बड़ा हूँ मैं ।

दिल के मुआमले में नाजुक बड़ा हूँ मैं ,  प्यार का यह प्यासा है ।  बस जाता है जो , इस दिल की गहराईयों में । तुमसा , और कोई नही है । मोहब्बत भी नही तो , और क्या है ये ? के तेरे सिवा इससे और , कोई जचता ही नही है । इश्क ही कुर्वान हुए है ,  हुश्न की समा पर । परवाने अक्सर ,  मिट जाया करते है ।  मिट जाए समा गर , परवाने के साथ ही ।  दुनिया उस मोहब्बत को,  सदा याद करते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बहुत मुश्किल है इस जहां में ।

बहुत मुश्किल है इस जहां में , ऐसा कोई मिलना । जो दर्द कोई बांट सके ।। नज़र गाड़े हुए है ,लोग यहां , जख्म देने को ।  यह झूठ का पुलिंदा है साहिब ! नही कोई साथी सच यहां ।  चार दिन रहेगी मुलाकात ,  फिर तू कहाँ और वो कहाँ ।  न उम्मीद कर किसी से के कोई ,  हमसफ़सर बन जायेगा यहां । फरेब ही फरेब है चारों तरफ ,  और नकाब पोश में है चेहरे यहां ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

पी है पैमाने से बे-हिसाब ,देखो रे वर्षों बाद पी है ।

पी है पैमाने से बे-हिसाब , देखो रे वर्षों बाद पी है । नशा भक्ति का ,  ख़ुमारियाँ न बन जाए । इसीलिए तो अब,  लगातार पी लेता हूँ । कई मुद्दतों से मिला है , साखी मेरे मन का । अब जो भी हो अंजाम , परवाह नही । "भरोसा है उस पर"  इसलिए ही । उसी के ही मयखाने से अब ,  बे-हिसाब पी लेता हूँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

आज लोग किसके इशारों पे, बे खोफ हुआ करते है ।

आज लोग किसके इशारों पे,  बे खोफ हुआ करते है । खेल रहे है जो अपनी , जान की बाजी हमारे लिए , उन्हीं को पीटा करते है । शर्म न हया रह गयी अब ,  न भाव इंसानियत का । उतार रहे है तस्बीर कैमरों में और , तमाशाई बन लोग गुमा करते है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इंतज़ार ए नज़र रखना ।

इंतज़ार ए नज़र रखना , सब्र ए दिल रखना । छट जाएगी एक दिन,  कयामत की यह बदली । दिल मे मोहब्बत , कायम रखना । कहाँ चैन हमें भी यहां ,  तेरे बगैर । तड़पता है यह दिल मेरा , मिलने को तुमसे  । मेरी मोहब्बत पर , एतबार रखना ।   ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अपने गम को बेचने चला था ।

 अपने गम को बेचने चला था , ऐ मालिक! मैं तेरे बाजार में । बहुत ढूंढा खरीददार , यहां मगर । मुझसे ज्यादा हर किसी का यहाँ , "गम" निकला । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सम्भलकर करना , "इश्क" ये दिल !

सम्भलकर करना , "इश्क" ऐ दिल ! मोहब्बत में अक्सर हुश्न ,  दगा बाज़ हुआ करते है । बिरले ही होते है कोई समां जो , परवाने संग बुझ जाया करते है । वरना देखा है अक्सर , समां ही ।   परवाने को जलाकर , इठलाया करते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कैसे कहें मेरा हर लम्हां ,किस कदर गुजरा तेरे बगैर ।

 कैसे कहें मेरा हर लम्हां ,  किस कदर गुजरा तेरे बगैर ।  सूनी है गालियां यहां दिल की ,  सूना है शहर - शहर ।  अहा भी भरी और ,  दिल को भी थाम लिया ।  रूठ भी लिए खुद से , और खुद को मना भी लिया ।  खुद को जी भी लिया ,  और खुद को मार भी लिया ।  इसी तरह से तन्हां जी ,  गुजर हमने कर लिया ।  अहा भी भारी और ,  दिल को थाम भी लिया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ईलाज़ ए गम होता तो , तन्हाई कहाँ जाती ।

ईलाज़ ए गम होता तो , तन्हाई कहाँ जाती । मिल जाता जो ,  मुकाम ए मोहब्बत ए वफ़ा सब को ।  तो खिजां ए जफ़ा कहां जाते ।  नासूर ए जख्म बन गया अब दिल का ,  दिल ए मर्ज कहां ढूंढे सकून ए दिल ,  हर तरफ तो दगा बाजियां है । मिल जाता सबको सकून वो सहर,  तो मयखाने कहाँ जाते ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हम अभी भी है उसी रहगुजर में ..

हम अभी भी है उसी रहगुजर में , राहें वो ही अपनी हमसे जुदा कर गए । कहते थे जो हमसे कभी कि हम , मुस्कुराते हुए अच्छे लगते है। वो ही आज हमें तन्हां ,छोड़ कर चले गए। देखा न दर्द उसने  ,मेरी हंसी में जो छुपा था। हर किसी से ठुकराए गए हम , और आंसुओ के घूट हम पी गए। वफ़ा क्या जिंदगी , दर्द ए दिल का सकून ही अब ,  मेरी तन्हाईयाँ है। खुश हूँ मैं बहुत , अपनी उदासियों में रहकर। दिख रहा है , आज उनका बेनकाब होकर।  ✍ज्योति प्रसाद रतूड़ी

काश यह "मर्ज़ी" न होती ।

 काश यह "मर्ज़ी"  न होती । होती तो , मेरी खतिर ही होती । बहुत दिल करता है, उनसे ही बात करता रहूँ । मगर न जाने कब हो , मेहरबान मुझ पर वो ,  "उनकी मर्जी" । 🤔🤔 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

लॉक डाउन/ कोरोना काल गरीबों की व्यथा ।

बे - रोजगार बे घर ,  फाका की आ गयी है नौबत । बंद है बाजार , जेब खाली है । घर जाए भी तो कैसे ,  बंद है बस -गाड़ी ।  कुछ समझ नही आता , विकट संकट की , कैसी आ गयी यह घड़ी है । कोरोना तूने गरीबो को , कहीं का नही छोड़ा है ।  तू आये भी मुझ पर तब भी ,  न आये तब भी ,  मुझे तो हर हाल में ही रोना है ।  आसमान है छत मेरी ,  धरा मेरा बिछोना है । आंसूओ से क्या बुझेगी , प्यास मेरी ।  आशाओं से , क्या भूख मिटेगी ।  प्रभु तेरे जग में अभिशाप ही ,  गरीबों का होना है । कोरोना तूने गरीबो को ,  कहीं का नही छोड़ा है ।  तू आये भी मुझ पर तब भी ,  न आये तब भी ,  मुझे हर हाल में ही रोना है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

पसरा है कोरोना का कहर विश्व व्यापक ,गांव गांव शहर शहर ।

पसरा है कोरोना का कहर विश्व व्यापक ,  गांव गांव शहर शहर । मन बैठा जाता है , काल कैसा आया यह भयंकर । समशान सा पसरा सन्नाटा है ,चारों ओर । कैद हो गयी जिंदगी , जेब खाली है ,  राशन के है खाली ड्रम । मरे तो दोनों तरफ ,  यही सोच कर क्या हो गया ये ,  अब क्या होना है । जाए बाहर तो करोना है । रहे अंदर तो रोना है । चलो जो होगा देखा जाएगा ,  रहेंगे बंद घरों मे ही ।  कोई न कोई हल तो आएगा । आज नही तो कल ही सही , करोना चला जाएगा । लौट आएगी फिर से जिंदगी , कुछ खो कर , मर्मरिक घाव दफन कर ।  चेहरे पर निशान आसुओं के देकर ।  पसरा है करोना का कहर , विश्व व्यापक ,  गांव गांव शहर शहर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तमन्नाओं में , आरजू जिसकी थी उन्हें ।

तमन्नाओं में , आरजू जिसकी थी उन्हें । वो मुकदर से उन्हें , मिल ही गया। इक तरफा ही रहा इश्क मेरा  , उन्हें अपने सपनों में बिठा कर। बुझा देंगे हम अब , चिराग अपनी चाहतों का।  लौट आएंगे वापस हम, अब अपनी तन्हाइयों में। भूल जाऊं मैं उन्हें यह मुश्किल है बहुत ,  उनकी यादें दिल से मिटा न सकूँगा। चलो इक और गम सही ,  तन्हाइयों की गुजर के लिए । खुदा हाफिज , यह सलाम आखरी मेरा।  जी लेंगे अश्कों में , तेरा अक्स लेकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

नव क्रांति का देखो , आज आगाज हुआ ।

 नव क्रांति का देखो , आज आगाज हुआ ।  शायद टूट गया है बांध सब्र का , नया इतिहास बनाने को ।  शंख नाद सहस्र मुख से , जय घोष गूंज उठा ।  बदल देंगे तस्वीर अब देश की ,  सनातन अब जाग उठा ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

पिता उम्मीद है , अहसास है। पिता नन्हे से बच्चे, की शान है।

 पिता उम्मीद है ,  अहसास है। पिता नन्हे से बच्चे, की शान है। पिता ने जो सिखाया, वही कर्म है। पिता ने जो समझाया, वही धर्म है। पिता है तो, सब सपने साकार है। उनके बिना, सब कुछ बेकार है। पिता से ही जीवन है, संस्कार है। पिता ही, भगवान् का अवतार है।  ✍️सांभर:  विकास रतूड़ी

थी मौज क्या आंनद था, उस जमाने में ।

थी मौज क्या आंनद था, उस जमाने में ।    थी टूटी चप्पल भले , मज़ा आता था चलने में । कपड़े रहे भले कम थे , तब भी ठंड की मजाल कहां । रोक सके जो हमें , लुफ्त बहार से लेने में।  थी रोटी चाय , सुबह की हो शाम की।  सताए भूक , तो वो कंद मूल सी अब बात कहां । थे खेल वो निराले , मेल भी वो मतवाले। यही सोचते है हम कि , क्या फिर होंगे कभी हम ,  वो ही दिल वाले। आज के दिल वालों में अब, वो पहली से बात कहाँ । ✍️ज्योति प्रसाद

कुछ आदत हो गई है हमें उनकी,

कुछ आदत हो गई है हमें उनकी,  फिक्र तो मुनासिब ही होगी । वैसे तो कई है दुनिया में मगर,  चाहत हमें , हर किसी की ना होगी ।  आज ही तो नहीं हुई है , गुफ्तगू उनसे ,  ना ही दीदार हुए कुछ पल । हो जाते तो , दिल की ये हालत तो न होती । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ये मुझे भी ना पता है ,और तुझे भी ना पता।

ये मुझे भी ना पता है , और तुझे भी ना पता। है कौन सा यह प्यार हमारा ,  इसका नाम क्यों है लापता । आ जा करीब मेरे दिल के , इस का कोई नाम दे दें। रह न जाए कोई ख्वाहिश, जिंदगी की । हर ख्वाहिश को,  अंजाम दे दें । डूब जाए हम , आब ए मोहब्बत में इतना । कि खबर न हमें फिर , जहां की हो। मै तुझ में समा जाऊं और , तू मुझ में समा जाओ। न तुम कुछ कहो , और न मै कुछ कहूं।  आ चलें जाए दूर कहीं हम, जहां प्यार ही प्यार हो । और कुछ भी , नजर न आये। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बहुत बड़ा , एहसान है तेरा मुझ पर ।

बहुत बड़ा ,  एहसान है तेरा मुझ पर । "ऐ मेरी जिंदगी" दर्द में भी जो तूने मुझे,  मुस्कुराना सीखा दिया । वरना जीना कहां आसान था , इस बेदर्द जमाने में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिंदगी की राह में तू जो संग है ।

जिंदगी की राह में ,  तू जो संग  है । तो कठिन कहाँ , फिर वो डगर है ।  हर पल उत्सव है ,  हर क्षण उमंग है । दुःख दूर है अब हमसे ,  तेरा प्यार जो मेरे संग है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मिला क्यूं वो मुकद्दर ।

मिला क्यूं वो मुकद्दर ,  जिसमें लिखी जुदाई थी ।  दिल लगाने का सिला भी ,  क्या खूब मिला ।  गफलत हमसे ,  इतनी भी तो कोई हुई थी ।  ना वो समझ सके हमको ,  ना हम समझा सके उनको ।  बस फासले बढ़ते ही गए ,  दिलों के दरमियान । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हुई नहीं चाहत किसी की ।

हुई नहीं चाहत किसी की , आज तलक ।  इतनी बे वजह , " इश्क "  मालूम नहीं हस्र ,  अब क्या होगा । हूं क्या ? मै ही इस तरफ ।  या उसे भी ,  उस तरफ होगा ।  बहुत खूब सूरत पल है , यह जिंदगी का जो । जीवन के हर मोड़ पर ,  हर वक्त याद आएगा ।  धूप हो या छांव ,  रुकते कदमों का,  यह सहारा होगा ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हमने पूछा उनसे , कहो क्या लिखू तुझ पर मै ।

हमने पूछा उनसे ,  कहो क्या लिखू तुझ पर मै ।  ऐतबार उनका देखिए  " जैसा दिल तुम्हारा चाहे "  जबाव था यह उनका ।  प्यार उनकी , मासूमियत पर और गया ।  कैसे दगा दूं  मैं उनको ,  जिसने अपने दिल में मुझे , इस क़दर बिठा दिया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तू चांद है मेरा दिल का ।

 तू चांद है मेरा दिल का ,  चाहता तुझे भी मै बहुत हूं ।  छोड़ भी कैसे दूं मै सूरज को ,  वो उजाला है मेरे सवेरे का ।  ना रह सकता हू तेरे बिना ,  ना जी पाऊंगा उनके बिना ।  तू साज है तो वो , तराना मेरे जीवन का । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ग़म से भरी नज़्म है ,यह जिंदगी मेरी ।

 ग़म से भरी नज़्म है ,यह जिंदगी मेरी । भरोसा नहीं रहा, अब महफ़िल का । इस लिए तन्हाई में ,गुनगुना लेता हू । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

लौट जाऊंगा , तेरे दर से मैं ।

 लौट जाऊंगा , तेरे दर से मैं  कुछ देर तो और , ठहर तो लूं । मज़ा क्या फिर, तन्हाई का ।  जो तेरी याद में, रो न लूं । ग़म की तू , फिक्र न कर । बे सुमार है ,दामन में मेरे । एक और सही, तेरी जुदाई का । कुछ देर तुझे , और देख तो लूं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हमारे प्यार की कश्ती , न हो पार कभी ।

 हमारे प्यार की कश्ती , न हो पार कभी । मज़ा जो चलने का ,धाराओं में है । वो साहिल , मिल जाने  में कहां । न मंज़िल का , पता मिले । न सफर खत्म हो , ये कभी । बिखर जाते है ,मुसाफिर अक्सर । मंज़िलों के आते ही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आये है यहां चार दिन और फिर लौट कर चले जाना है ।

आये हैं यहां, चार दिन और फिर , लौट कर इस दुनिया से ,चले जाना है । मिली खुशी तो खुशी है जिंदगी  , मिला गम तो, गम है जिंदगी  । बचपन है जिंदगी , जवानी और बुढ़ापा है जिंदगी । जिस हालात से गुजर हो , वो हालात है जिंदगी । बस...! एक तू है जिंदगी, और इक़ , मैं हूँ जिंदगी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज दिल को हुआ यह अहसास

आज दिल को हुआ यह अहसास , कहा किसी ने खूब ही । हम जिसे चाहे जितना भी , जरूरी नही वो भी ,तुम्हें चाहे उतना ही । न गम कर उसका ,जो कभी तेरा हुआ ही नही । खो जाने का क्या डर, जिसे कभी पाया ही नही । न ला दिल किसी को किसी करीब इतना । टूट कर बिखर जाएगा तू , जब मालूम होगा के । वो है किसी के, करीब उतना ।  तेरी मोहब्बत के मायने महज , खेल है उनके लिए । है दिल उनका जिस पर, वो तुझ सा बेहतर, है उनके लिए ।  न वक्त जाया कर अपना ,  दिल को मना ले , लौट आने के लिए ।  बहुत दर्द दिए जिंदगी ने ,  इक़ खुशी पाने के लिए ।  मालूम क्या था ,वो निकल जाएंगे यूहीं ।  किसी और से , दिल लगाने के लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी