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काँच और दिल, दोनों नाज़ुक होता है ।

            काँच और दिल,            दोनों नाज़ुक होता है ।         फर्क सिर्फ इतना सा है कि ,              चोट लगने पर ।          काँच आवाज के साथ तो ,                         दिल ,            खामोश होकर टूटता है ।               ज्योति प्रसाद रतूड़ी. ....✍️

ऐ मेरे रूठे हुए ख्वाब , आ जा !

 ऐ मेरे रूठे हुए ख्वाब , आ जा  ! मुद्दतों से तुझे हमने , देखा नही । सोये भी हम बहुत मगर , संग तुम थे जब । वैसा आज तलक ,  फिर  कभी हम , सोये नही । ऐ मेरे रूठे हुए ख्वाब , आ जा  ! मुद्दतों से तुझे हमने , देखा नही । ज्योति प्रसाद रतूड़ी. .....✍️

कैसी कशिश है ये ...

 कैसी कशिश है ये ,  ना चाहते हुए भी दिल । ना जाने क्यों तुझ और ही ,  खींचा चला आता है । ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️

गरज़ क्या किसी को खत्म हो , जो बजूद मेरा ।

गरज़ क्या किसी को खत्म हो ,  जो बजूद मेरा । फैला था सारी कायनात में मैं कभी  ,  आज सिमट कर रह गया है , मेरा ढेरा। मैं सनातन हूँ   हाँ!  मैं सनातन हूँ ! अपने ही घर में डरा सहमा सा ,  कभी कत्ल हुआ मैं ।  कभी तलवारों से मुझे , धमकाया गया । कभी प्रेम पाश में लपेट कर , मुझे छला गया । सबको छोड़ कर मुझे ही , धर्मनिपेक्षता में , उलझाया गया ।  मेरे ही, मेरे विरोधी रहे है ,  सदियों से । किया अपना अपना , अलग बसेरा । फैला था सारी कायनात में मैं कभी  ,  आज सिमट कर रह गया है , मेरा ढेरा । ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️  

तेरा आना जिंदगी थी , जाना मौत मगर...

 तेरा आना जिंदगी थी , जाना मौत मगर... जी रहे है फिर भी किसी तरह  ,  न जाने , किस जुर्म की  सज़ा हो ।  दिन भी निकलता है , रात भी ढलती है ।  सुबह और शाम भी होती है मगर... मेरे शहर में अब वो , पहले सा , खुशनुमा समा कहाँ । दिल भी है धड़कनों की रावनियाँ भी , गाए जो कभी सरगम ये , तुम संग मगर.... मायूसियों के अंधेरों  में आज , ना जाने गुम है कहाँ , मेरे दिल का जहां ।  तेरा आना जिंदगी थी , जाना मौत मगर... ज्योति प्रसाद रतूड़ी........ ✍️

तुम हाल ए दर्द मेरा , जान सको तो कहूँ ।

 तुम  हाल ए  दर्द मेरा , जान सको तो कहूँ । के तुम अब हमसे मेरा , हकीम बनकर न मिला करो । कुछ देर तक राहत होती है सिर्फ  जख्म जो नासूर सा है ये ।   तू जा ऐ हकीम अब , रहने दे इलाज ए दर्द ।  मुझे मेरे इन जख्मों के , साये में रहने दो ।   ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️

सुलग रहा हूँ बनकर , अंगारों सा धुँआ धुँआ ।

सुलग रहा हूँ बनकर ,  अंगारों सा धुँआ धुँआ । देख कर वो कहीं ओर है ,  सजाये अपनी महफ़िल । काश की उनसे , कभी मिले ही न होते । शायद मेरे भी अरमाँ होते , जवाँ जवाँ ।   ख्वाइशें तार तार हो गयीं अब ,  दिल ए चम्मन अब , सब बिखर गया । ढूंढता हूँ वो , निशान ए इश्क मैं , जो मिले थे मोहब्बत में , शायद मिले अब । दिल जो मेरा ये टूटकर , टुकड़ों में बंट गया । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️

हम तो आज भी अजनबी है , तेरे शौक ए नज़र में ।

 हम तो आज भी अजनबी है ,  तेरे शौक ए नज़र में ।  बस फर्क इतना सा  है कि ,  तुम्हे अब मेरा पता मालूम है । हम तो करीब आ कर ,  भी दूर ही रहे । सोचा फिर के , क्या फायदा ? यूँ घुट घुट कर , संग रहने का । इस लिए तेरी दुनिया से , रुख्सत हम , हमेशा के लिए , हो चले । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.... ✍️

मेहनत और मुकद्दर जब ....

 मेहनत और मुकद्दर जब  एक साथ हो तो ही , ऐसा संजोग मिल पता है । " बुलन्दियों को छूने का" वरना अपने लिए कमी ,  कौन चाहता है । हर इंसान मेहनत करता है , कोई आसमान छू जाता है । और कोई जमीं पर ही ,  राह जाता है । ज्योति प्रसाद रतूड़ी .....✍️

जला है जी बहुत , जब सुना उनकी जुबाँ से आज ।

👨जला है जी बहुत , जब सुना  उनकी जुबाँ से आज ।  👧🤔क्या ? 👨कि तमन्नाओ में है , बसा गैर कोई ,  बेहद मिलन की आरजू लिए । 👧😂😂 ठीक है में सोने जा रही हूँ । 👨रुको तो ! कुछ और जी भर कर , कर ले बातें । फिर क्या पता ? मुझसे भी बेहतर  कोई और मिले । और हम....बिछुड़ जायें ।☹️ 👧हाँ वही तो ! हमारा अब यही काम है🙄🙄🙄🙄🙄 👨😂😂😂😂ok गुड नाईट ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️

कम वक्त मानता ही नही दिल !

कम वक्त मानता ही नही दिल !  वो दर्द है फिर भी.......उसी को ही ,  गले से  लगाने को , जी चाहता है । और क्या सफाई दूँ मैं , अपने इश्क की । ये क्या कम है के , उसी ही में मुझे । अपना खुदा ,  नज़र आता है । ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️

आओं करीब , तुम यूँ हमसे दूर क्यों हो ।

आओं करीब  , तुम यूँ हमसे दूर क्यों हो । मुद्दतों से बुझी नही है प्यास ,  इन आँखों की । आओ करीब तुम्हें , जी भर के देख लूँ  । आओ लग जाएं गले से ,  बहुत हुआ इंतिहान मोहब्बत का । बुझ जाए प्यास दिल की ,  अंजाम फिर जो होना हो...हो । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️

छलक तो , रहा नही....।

 छलक तो ,  रहा नही....। तेरे चेहरे से ,  कोई गम ए शिकन । यह जाना है , पहली बार  गम शायद , मुस्कुराते भी बहुत है ? ज्योति प्रसाद रतूड़ी...✍️

लो आखिर ! मिट ही गया तेरा , रेत पर उखेरा गया वो , प्यार का घरोंदा जालिम !

लो आखिर ! मिट ही गया तेरा ,  रेत पर उखेरा गया वो , प्यार का घरोंदा जालिम ! मैं न कहता था मत बना ,  ये समंदर का किनारा है , कब तूफान आ जाये क्या खबर । ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️

बहुत है दर्द , दिल में दफन , बस...

 बहुत है दर्द , दिल में दफन , बस...  देख सके जो दर्द , मेरे दिल का । वो हकीम ए नज़र कोई , दिल ए इलाज चाहिए । ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️

ढोल पीटो चाहे नगाड़ा !

 ढोल पीटो चाहे नगाड़ा ! ये  तो मस्त चाल से ,  चल रहें है , मोदी मेरे भाया ! मोदी मेरे भाया , सुन शाह तुम ! कहाँ सो रहे हो ? शत्रु- सडयंत्र के ,चक्रव्यूह में तुम ! चाहूँ ओर से , घिर रहे हो । उठो जागो नींद से अब तुम,  बहुत हुई स्वप्न देश की सैर सारी । खतरे में है देश अब हकीकत में,  कर लो इसे बचाने की तुम तैयारी । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️

गज़ब का दस्तूर है , यह मोहब्बत का ।

 गज़ब का दस्तूर है , इस मोहब्बत का । देता है जख्म जो , मरहम की उमीद भी , उसी से ही । नादानियों से सीखी है , हमने मोहब्बत । समझदार होते तो , शायद तुम्हें पा जाते । यही तो नही आया हमें , कुछ कहकर कुछ हो जाना । वरना तेरी महफ़िल के हम , मेहमान ए खास कहलाये जाते । नज़र भर देखे भी न , जी को हाये मनाये कैसे । दीदार ए हुश्न के बगैर , वापस घर जाएं तो जाएं कैसे । ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️

ऐ जा कख लुकी च तू , भिंडी दिनु ह्वे (गढ़वाली)

 ऐ  जा कख लुकी च तू ,  भिंडी दिनु ह्वे , यों आँखियोंन नि , दिखी त्वे । मी छों यकुली... यकुली यों रातियों मा । द्योरा बटी भी आज ,  गैणा , ज्वान ... कुज्याणी कख चली गैन। उफ्फ या अन्ध्यारी राति .. रे तेरी खुद भी , बोड़ी ऐन । ऐ जा कख लुकी च तू ,  भिंडी दिनु ह्वे । टक लाई हेर्न छायी ,  आँसुल भोरी आँखि ,  आँसुल भोरी आँखि मेरी रे़ । औंदी ले सुपिन्या तू त.... यों आँखियों त म्यारी अब , निंद भी नि रै । भिंडी दिनु ह्वे , यों आँखियोंन नि , दिखी त्वे । ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️

माना कि , तरसती निगाहों का ।

माना कि , तरसती निगाहों का । मुमकिन नही है , पा जाना दीदार ए यार....। जिंदगी ! ये क्या  तू भी ? रुख्सत हुई जाती हैं । ठहर तो कुछ देर , और सही ... आने की उनकी अभी , थोड़ी सी उम्मीद बाकी है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

औ दें कि अब त ज्याणी कु ज्याणी , बसंत कथगा चली गै ।(गढ़वाली)

 औ दें कि अब त ज्याणी कु ज्याणी , बसंत कथगा चली गै । मी जग्वाल म छों तखि मू , जख तू औण क बोलगी थै । औ दे कुछ छुई त लगवा यनि कि , जु रस्यांण ऐ ज्याली । भिण्डी दिनु कु खुदियूं मन , तेरा बिग़ैर.... जरा औ दें मुलमूल हैंसी जा दें कि ,   वरषु बटी कुंद मेरी मुखड़ी , दिखी त्वे हैंसी ज्याली । औ दें कुछ छुईं  त लगवा यनि कि , जु रस्यांण ऐ ज्याली । औ दें कि अब त ज्याणी कु ज्याणी , बसंत कथगा चली गै । मी जग्वाल म छों तखि मू , जख तू औण क बोलगी थै । ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️

उतरा नशा , इश्क का अब ।

 उतरा नशा , इश्क का अब । के हाल  बे-हाल ,  सनम वो कर गए । शायद ! किसी की,  दुआ का  असर ही रहा ये ।  जो साँसों के. .. काबिल भी ,  तुम  रह गए । ज्योति प्रसाद रतूड़ी......✍️

तेरी इन्ही नन्ही सी , अदाओ से ही , तो है आबाद ।

 तेरी इन्ही नन्ही सी ,  अदाओ से ही , तो है आबाद । मेरी ये दिल  की , दुनिया  । वरना कसर , कहाँ छोड़ी थी । हमें मिटाने वालों ने , हमें  मिटाने की । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.......✍️

हमने तो उनकी हर यादें ही , मिटा डाली थी ।

 हमने तो उनकी हर यादें ही , मिटा डाली थी । मगर , कम वक्त यह दिल है के ...... उनके तसब्बुर को , आज भी संजोय बैठा है । माना कि नही है अब , मलाल हमें कोई । उनसे बिछुड़ने का ..... कम वक्त यह आंखें है कि .... उनको ख्वाबों में , आज भी देखा करती है । कह तो गए थे वो हमसे के ,  मुझसे बेहतर हासिल है अब उनको । कम वक्त , ना जाने हमें ,  उन पर भरोसा  क्यों है इतना के ....... उनकी इस जुबाँ पर हमें यकीन नहीं है । ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️

देख रहा हूँ मैं....

 देख रहा हूँ मैं ,  काफी दिनों से , आपको ।  बदले बदले से हज़ूर ,  नज़र आ रहे है ।। न जाने क्या है बात , उनमें ऐसी । के तुम हमें , भूले जा रहे है ।  😭 ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️

मिला मुकदर में , कुछ ऐसा कि हम ।

 मिला मुकदर में ,  कुछ ऐसा कि.... ना तो हम रो सके ,  न हँस सके । मिला साथ , तेरा यूँ के , न तो छोड़ सके ,  न पा सके । मिला मुकद्दर में कुछ....... माना पाया , तुझसे ही सब कुछ ,  बैभव शान , धन दौलत । जानी क्या सुख , इस भौतिक में । जब डूबी , इस नशे में  सब शौहरत , । मिला मुकद्दर में कुछ.... तुझसे दूर मैं , जाना चाहूँ ,  मगर तुम बिन , खड़ूस !  मैं , रह न पाऊँ । घायल दिल में मेरे , दर्द भरा है । देख मेरी आँखों देख इनमें मेरे  दिल का ,  हाल छुपा है । मन अतृप्त है सघन ,  घन अंधकार । आशा की किरण , ओझल । आएगी कब वो जाने ,  कौन घड़ी , होगी साबित ।  जब तुम होंगे ,  होश ओ हवास में ,  मेरे मन मुताबिक । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम बनकर प्रेम वर्षा , वर्षो मेरे , हृदय धरा पर

तुम बनकर प्रेम वर्षा ,  वर्षो मेरे  हृदय धरा पर । वर्षो यूँ के , कभी थम न पाए । रहे शेष न , तृष्णा मन की । अग्नि विरह की ,   कभी जल न पाए । तुम बनकर प्रेम वर्षा ,  वर्षो मेरे हृदय धरा पर । सघन काली घटा निराली , तेरे केशो ने कर डाली । रहे पड़े ये यूँ ही मुझ पर ,  सदा रहे ये शाम मतवाली । राधा तुम मेरे मन की ,  कान्हा मैं तेरा बन जाऊँ । आ डूबे ऐसे , प्रेम सागर में । तू मुझ में मैं तुझ में , समा जाऊं । तुम बनकर प्रेम वर्षा ,  वर्षो मेरे ,  हृदय धरा पर । वर्षो यूँ के , कभी थम न पाए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हमने अब जाना , तिलस्म क्या है...

हमने अब जाना , तिलस्म क्या है ,  तेरे इस हजूम का ।   हर एक के हाथ में है प्याला ,  और इंतज़ार है तेरी शराब का । ****     ******     ******* *** दावा तो यूँ है के ,  सताए हुए है ये सरकार । हमसे तो यही भले ,  पी खा कर मस्त से.....लेते ये डकार । ये आंदोलन है किसान का ,  दावा जबरदस्त है भारी ।  तेरी तू जाने ,अपनी तो , निकल पड़ी है , पटरी पर ।  मौज़ मस्ती की , गाड़ी । आजा आजा तू भी आज , पहन टोपी हरे वाला । खेती का तो , तू बन न सकेगा ,  हाँ बन किसान तू सड़कों वाला । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी #किसान आंदोलन

दिल को छूकर गुजरा वो , कुछ यूँ कभी ।

दिल को छूकर गुजरा वो ,  कुछ यूँ कभी । के अभी तलक दिल को , उनकी तलास है । गुजर गए कई लम्हें , जिंदगी के उनके बगैर । अब भी हमें उनके , लौट आने की आस है । आये न वो कभी ,  करीब रूबरू मेरे । मगर है वो करीब दिल के , जाने क्यों हमें , आज तक यह अहसास है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वक्त के तराजू पर , तुला मैं ।

 वक्त के तराजू पर , तुला मैं ।  भाग्य के बाट से झोंका गया.... कभी ऊपर उठा , तो कभी नीचे झुका । हिण्डोला सा ही , हिलता रहा मैं  अचेतन , अवस्था तलक । कब शांत हुआ. .... न जाने कब शून्य पर रुकी , चाहत कोटि की । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

तुझे क्या पता ? कि हम , रात भर न सोये ।

तुझे क्या पता ? कि हम , रात भर न सोये । मत पूछो क्यों ,  बस तुम जो , महफ़िल में थी ।  रूबरू , किसी ओर के ।☹️ दगा बाज़ भी न कहेंगे ,  हम तुम्हें । और वफ़ा भी तो नही । करके नज़र अंदाज़ हमें तुम , गैरों से मुखातिब हुए । ☹️☹️ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

और कुछ भी तो नही है अब , पास मेरे । सिवा दर्द के .....

और कुछ भी तो नही है अब , पास मेरे  । सिवा दर्द  के ..... कहीं भूल ना जाऊं मैं तुम्हें ,  इसलिए थोड़ा थोड़ा,  मैं जख्म अपना ,  हर रोज़ , कुरेद लिया करता  हूँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

पाई थी कभी खुशी , तेरे दर से ।

 पाई थी कभी खुशी , तेरे दर से । आज सितम है , तेरा मुझ पर । हुई क्या चूक , मेरी वफाओं में । तुझे तेरे सितम की , कसम.....  मुझे मेरे  गुनाहों की , वो तस्वीर बता दे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

छोड़ दिया है उसने मुझे.....

छोड़ दिया है ,  उसने मुझे । किसी की , खातिर । अफसोस नही मगर... सोचती हूँ कि , ऐसा क्या था उसमें , जो मुझमें नही । बस यही इक सवाल था , मेरी जिंदगी का । जिसका आज तलक.... जवाब न हुआ , हासिल मुझे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ऐसे भी न तड़पा हमें कि , हम कहीं

ऐसे भी न तड़पा हमें कि ,  हम कहीं   हद से न गुजर जाएं । रोओगी फिर तुम तन्हां ,  हमें अपने करीब न पाकर । यूँ ही नही हर्फ लिखे हमने ,  मोहब्बत के । तेरे तीर ए नज़र से ,  घायल हुआ , परिंदा ये   दिल का । लगाए न लगे मरहम ,  मेरे इस,  जख्म ए दिल पर । यूँ तो मिले कई हकीम , मगर । तुमसा हाकिम ,  मेरे इस दिल का , और कहाँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल कुछ लिखने को , अब मेरा करता क्यों नही ?

दिल कुछ लिखने को , अब मेरा  करता क्यों नहीं ?☹️  न जाने  अब , मेरे तसब्बुर में । कोई चेहरा , आता क्यों नहीं ? अब महसूस नही होता , दर्द ओ गम । ना कोई एहसास , खुशी का ।  क्षितिज में ही ,देखता रहता हूँ । इक टक... न जाने इस रात की , सुबह कब हो । क्या है आखिर , वो राज़ ए फिक्र ? मेरे जेहन में वो राज़ आता क्यों नही । दिल कुछ लिखने को , अब मेरा  करता क्यों नहीं ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अपना बचपन और माँ , याद आ गयी ।

अपना बचपन और माँ ,  याद आ गयी । जैसी भी थी माँ , माँ थी । मारती भी थी तो , पुचकारती , दुलारती भी थी । माँ तो माँ थी , जैसी भी थी । ममता से भरी ,प्यार में खरी थी । दुख-सुख में जो , मेरा ख्याल रखती । मेरे बिन जो , न खाती न सोती । मुझे दिखे बिन जो , चैन से न रह पाती । वो माँ ही थी , हाँ वो माँ ही थी । बचपन तो बचपन था ,  जवानी में भी , माँ का बहुत सहारा था । थका हारा...   दुनियादारी के ,झंझटों से जब मैं आता । माँ की गोद में सर अपना रख कर । माँ सहलाती सर मेरा....  और मैं , आराम से सो जाता । माँ तो माँ थी ,  जैसी भी थी  , माँ तो माँ थी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

बातों ही बातों में हम इतना भी क्यो खुल गए ...

बातों ही बातों में हम ,  इतना भी क्यों खुल गए । के हम उनसे , इज़हार ए मोहब्बत कर गए । थी हक्कीकत जो मेरी ,  बिन सोचे हम उनसे ,  क्यों बयाँ कर गए । हुए कई रोज उनसे ,  मुलाकात हुए "मलंग" काश के वो ,  हमको बता पाते कि , वो हमसे खफा ,  क्यों हो गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

गीदड़ भभकी से डरना, किसी और की ...

 गीदड़ भभकी से डरना,  किसी और की ,  फितरत में , शामिल होगा ।  हम शेर है.....  नाखूनों से चीर कर । दुश्मनों का.... . लहुँ , पी जाया करते है । बंदेमातरम ! जय भारत ! ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी कभी आ जाता हूँ , रंग ए महफ़िल में ।

 कभी कभी आ जाता हूँ ,  रंग ए महफ़िल में ।  कुछ गम अपना , भुलाने को ।  क्या पता था आ जाएंगे ,   आपसा कोई  । ज़ख़्म , मेरा दुखाने को ।☹️ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्या लिखूं के , तेरे बिन अब । कुछ भी , अच्छा नही लगता ।

क्या लिखूं के , तेरे बिन अब । कुछ भी , अच्छा नही लगता । दुनिया है दुनियादारी भी मगर ,  तेरे बिन अब ....... इस दुनिया में कुछ भी ,अच्छा नही लगता । गिनता हूँ मैं भी अब ,  दिन उंगलियों पर । ना जाने कब तक लिखा हो  नसीब , इस धरा पर । बुला ले मुझे भी संग अपने ,  बिन तेरे अब । इस धरा पर ,कुछ भी  अच्छा नही लगता । ना पास आने का वक्त है , किसी को । न दूर से कोई , पूछता है हाल मेरा । किससे कहे , अपना हाल ए दिल । है कौन अब , सुने जो । आ जाओ मुझे भी संग अपने , ले जाओ के  तेरे बिन अब । इस दुनियां  में कुछ भी , अच्छा नही लगता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

हार चुका हूं , खुद से खुद मैं ।

हार चुका हूं , खुद से  खुद मैं । जीतू  संसार को ,  क्यों भला ?  आखिर इस संसार में , रखा ही क्या है ? हर तरफ है दुश्मन ,  इंसान के इंसान यहाँ । एक चेहरे पे कई चेहरे , लिए घूमते फिर रहे है । बनकर हमदर्द..... पहचान मुश्किल है अब । कौन दोस्त है और , दुश्मन कौन  यहाँ है  ? टूटते देखे है वफ़ा के रिश्ते ,  हल्की सी हवा के चलते । अब वो प्यार की , शीतल सी फुआर कहाँ है ? हर तरफ है दुश्मन ,  इंसान के इंसान यहां । हार चुका हूं , खुद से ही खुद मैं । जीतू संसार को  ,  क्यों भला ?  आखिर इस संसार में , रखा ही क्या ?

अब तो खूब जमेगी , मयखानों में ।

अब तो  खूब जमेगी , मयखानों में । मेरी और , मय के  प्यालों की । उनकी मेहरबानियों का ,  असर ही हुआ, कुछ ऐसा , कि हम , तन्हां हो चले । साखी न रूठ जाना तुम भी ,  वरना मुश्किल होगी । कम वक्त किसी और के ,  हाथों से अब ।  जाम ए शराब ,  हरगिज़ चढ़ती नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

तुम जो न चिराग जलाते , मेरे दिल का ।

 तुम जो न चिराग जलाते ,  मेरे दिल का ।  तो न ये दिल का जहाँ मेरा ,  रोशन  होता । रहता गम के अंधेरों में मैं , और उदासियों का , सहारा  होता । आ जाओ कि अब  , तुम बिन रहा , जाता नही । हसरतें सिमट गई है ,  अब मेरी । तेरे इर्द गिर्द आ के । मखमली बाहों में तेरे , निकले दम मेरा अब । तेरा ही होकर मरूँ मैं , और कुछ आरजुओं में , मेरे अब आता नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ना छेड़ो तुम धुन , बिरहा की

ना छेड़ो तुम  धुन , बिरहा की  के मुझे मेरे गम , याद आए ।  जिन्हें भुला चुके है हम , ब-मुश्किल ।  वो दर्द ए दिल ,  हमें वो सितमगर , फिर याद आए। शाम जो हुई मेरे दिल की ,  फिर न कभी कोई , हसीं सुबह आई । बे दिल से मुस्कुराते रहे हम बदस्तूर ,  मुद्दत हुए , हमें शायद दिल से मुस्कुराए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थी तम्मनाओं में जो बसर , वो था इक नूर सा , चेहरा "मलंग"

 थी तम्मनाओं में जो बसर ,  वो था  इक नूर सा , चेहरा "मलंग"  मेरी दुआओं का तो देखो ,  यह कैसा रहा असर ।  चाहत भी रही हमें उनकी ,  और वो हमें..... हो भी न ,  सके हासिल । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

शुक्र है कि हम.... दिल को हाथ में लिए , फिसले नही ।

 शुक्र है कि हम....  दिल को हाथ में लिए , फिसले नही । संभल गए...! वरना कहीं फिसल जाता तो , मुश्किल होती । चलो अच्छा ही हुआ..... रंग तेरी वफ़ा का , बहुत जल्दी ही धूल गया । वरना कहीं हम.... तेरी उस चमक में खो जाते , तो मुश्किल होती । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आ ऐसी शमा बनाएं

 आ ऐसी शमा बनाएँ , छलके नीर नैनों से । गर कभी जो हम , आपस में बिछुड़ जाएँ । तेरे दम से , मेरा दम हो । मेरे दम से हो , तेरा दम । आ प्रेम की उस , गहराई तक हम जाएँ । रहे बे खबर हम ऐसे  , के बेखुदी में हम जाएँ । आ तुम हम में ,  हम तुम में समा जाएँ । छलके नीर नैनों से । गर कभी जो हम , आपस में बिछुड़ जाएँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

किस्मत से मिलता है महबूब , जो कोई , आखरी दम तलक ।

किस्मत से मिलता है महबूब कोई ,  आखरी दम तलक । ढलते हुस्न की परवाह में जो , बेइंतेहा हो ।  वरना यहाँ तो......   भरी जवानी , जंग खाये बैठी है । उदास है राहें यहाँ , इश्क की मेरी , ऐ हुस्न , तेरी बे रूखी से । बर्बाद हुए है मेरे , हर लम्हें ।  एक तेरे , इंतेजार में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मिटा दिया है बजूद ही हमने उनका , अपने दिल से ।

 मिटा दिया है बजूद ही हमने उनका  , अपने दिल से । आज से अब , सकुन बहुत है । ******* इस हंसी ने ही तो लूटी है ,  जहाँ भर की खुशियां ।   अब खामोश रहों या कुछ कहो ,  क्या फर्क पड़ता है  । अब तुम पर मिटने वाले , हर आशिक ।    सपुर्द ए खाक , हो चले है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मलाल न हो तुम्हे कोई ..

 मलाल न हो तुम्हे कोई , लो ख्वाइशें तेरी , आज पूरी कर देते है । फायदा क्या संग यूँ ही , साथ चलने का । जब मोहब्बत ही न हो  लो आज से अपनी राह , जुदा कर देते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी