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क्या कहूँ मैं कौन हूँ ,मैं तो इक ऐसी बयार हूँ ।

 क्या कहूँ मैं कौन हूँ ,  मैं तो इक ऐसी बयार हूँ । टूटकर बिखर गया हो जो , बसंत में । मैं वो इक अनचाही बहार हूँ । घटाओं को , निहारता रहा मैं "मलंग" के किस और बरसे । एक आस सी लिए , भिगूँ मैं भी । ना जाने कब ,  मेरे भाग का , सावन बरसे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिस दिन मैं दुनिया से , रुख्सत हो जाऊंगा ।

 जिस दिन मैं दुनिया से ,  रुख्सत हो जाऊंगा । मेरे ख्याल से मेरे लिए ,  मेरे उन अपनों में से । एक तुम ही होंगे जो ,  चुपके चुपके , आंसु बहाओगे । होगी न और कोई खविश तेरी , मेरे बाद किसी और की  याराना अपना ये  तुम, कभी न भूल पाओगी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आ जाओ के दिल , बहुत करता है । तेरे नूर पे ...तेरे नूर पे यह , बहुत मरता है ।

 आ जाओ के दिल , बहुत करता है । तेरे नूर पे ...तेरे नूर पे यह , बहुत मरता है । आ जाओ के दिल , बहुत करता है... तेरे गेसुओं में , लिपट जाने की 2 आदत है हमें । पास आ जाओ के ,तेरे गेसुओं में लिपट जाने का 2  जी बहुत करता है । वो घड़ी वो खयाल वो समा क्या याद है  तुम्हें । मेरे आगोश में आना तेरा , ऐ "गुल बदन" । और मेरी सांसों में घुल कर महक जाना तेरा । आ जाओ फिर एक बार आगोश में मेरे ,  तेरी खुशबू चाहता है मेरा मन । बहक जाए  एक बार फिर से हम, तो चले जाना  तुम । आ जाओ के दिल...बहुत करता है । आ जाओ के दिल , बहुत करता है । तेरे नूर पे ...तेरे नूर पे यह , बहुत मरता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी कभी दर्द से , दो दो हाथ कर लेता हूँ ।

कभी कभी  दर्द से , दो दो हाथ कर लेता हूँ । उठाकर कलम यादों की ,  और तेरा नाम लिख लेता हूँ । बहुत दर्द हूँ छुपाये हम सीने में , के दिखाएँ तो दिखाएँ  कैसे । ये ज़ख़्म जो है मेरे सीने में ,  कम वक्त  हँसते बहुत है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जाते जाते हाँ ! जाते जाते माँ , हर बार मुझसे कह कर , जाया करती थी ।

 जाते जाते हाँ ! जाते जाते माँ ,  हर बार मुझसे कह कर , जाया करती थी  । अपना ख्याल रखना , मेरा राजा बेटा !  मैं जल्दी लौट आऊंगी । मगर अब की गयी तो , न कुछ कहा ही । न लौटी अभी तक । ना जाने क्यों ?  शायद किसी बात पर , खफा हो ? पूछूं  भी तो कैसे माँ  तुमको ,  तुम ख्वाबों में भी  तो , नही आती हो । बाबा हर रोज , तुम्हें याद करते है । मन ही मन रोया करते है । अपनी थाली में से ,  एक ग्रास तेरे नाम का ।  हर रोज रखा करते है । बुदबुदाते है अपने मे ही ,  ये तूने अच्छा नही किया । मुझे भी ले जाते संग अपने , क्यों मुझे यहां अकेला छोड़ दिया । बहुत टूट चुके है अब वो ,  तुम्हारी यादों में । मगर किसी से , कुछ कह सकते  नही । कभी मुझसे ही , कर लेते है जिक्र तेरा । बह निकलती जब यादें बनकर अश्क  पलको पर वो रोक लिया करते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

इश्क ! क्या कातिल यूँ हुआ करते है ?

 इश्क ! क्या कातिल यूँ हुआ करते है ? करके घायल जिगर , क्यों छोड़ा करते है ? कर जाए फना जो , अपनी सर परस्ती में गम ए यार । महबूब वो यार के कभी , दगाबाज़ नही हुआ करते है । दूर हो के भी एहसास कम न हो , जो प्यार का । वो साँचा इश्क है जो , हुस्न के ढल जाने पर भी  किया करते है । दिल को आइना बनाकर , झाँक लेता हूँ मैं जब कभी । गुजरे वक्त का लगाना याद आता है । हम ख्यालो में रहते है , अब भी उसी तरह बस तेरा आना और याद आता है । यूँ तो मालूम है मुझको , बंदिशें है बहुत तुझ पर । मगर बंदिशों को तोड़ कर मिलना ,  आज मुझे , वो जमाना याद आता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

रहते हैं आज वो मेरे इन्तजार में , बेसब्र ।

 रहते हैं आज वो मेरे इन्तजार में , बेसब्र ।  न जाने क्यों ?  जिसे हमसे मिलाना , कभी गवांरा न था । आज ढूंढते है हमें , वो  दर ब दर । न जाने क्यों ? शायद वजह मेरी मोहब्बत , या कुछ और ! 🤔🤔 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैं ज़रा भीड़ से हट के , क्या चला था कि..

 मैं ज़रा  भीड़ से हट के ,  क्या चला था कि.. आज तक अकेला ही ,  चले जा रहा हूँ मैं । खो सा गया हूँ मैं कुछ ,  इस कदर के ,  अपनी तन्हाइयों में ही , अक्सर । आये जाए कोई ,  मेरे अगल-बगल से ,  इसकी किसे है कोई खबर । मैं ज़रा भीड़ से हट के ,  क्या चला था  कि..   रास्तों  में चिह्नित ,  पत्थर दरख़्त भी थे जो । वो उखाड़ , काट ले गया है कोई । जो चाहते थे के हम कभी ,  लौट कर वापस न आ सके । आज वो , भरी महफ़िल में , मेरी तारीफों के , कसीदे पढ़ा करते है  । ✍🏿ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

एक झलक देखी तो थी , जैसे...।

एक झलक देखी तो थी ,  जैसे...। मैंने , हुस्न ए यार की । क्या वो आयी होगी ?  या ! कहीं ये मेरा , वहम तो नही रहा होगा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 😘😘

मैं कैसे मान लूँ के , वफ़ा मोहब्बत का ही , नाम हुआ करती है ।

 मैं कैसे मान लूँ  के , वफ़ा मोहब्बत का ही , नाम हुआ करती है । हमें तो वफ़ा में उनकी , हर दम  बेरुखी ही , हासिल हुआ करती है । बहाने बहुत हुआ करते है गर ,  चाहत में मिलन की जुस्तजू हो । एक मुलाकात ही काफी होती है गर ,  इरादों में गुफ्तगू  हो । यूँ तो बहुत है जहाँ में गुलिस्ताँ मगर ,  चाहत का गुल हर जगह खिलता नही । हो जाये हासिल , मोहब्बत में वफ़ा ,  नशीब ऐसा , हर किसी को मिलता नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कखि कै की खुदों कु , उमाल त , नि आयी हो । (गढ़वाली)

कखि कै की खुदों कु , उमाल त , नि आयी हो । कखि तेरु कण्ठ त ,  नि भोरी आयी हो ? क्या जाण क्या , मन मा छ त्यरा ।  कखि कैकी माया त ,  मन मा ना , लूकायीं हो । ना जाणी क्यां कु होली ,  डब डब हेरणी , तेरी  सिया छुयाल आँखि । कखि कैकी ,जग्वाला मा त  नि स्या । दिन रात , बिताणी हो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ऐसी भी क्या , नाराजगी है हमसे । हकीकत तो आना क्या था ?

 ऐसी भी क्या , नाराजगी है हमसे । हकीकत तो आना क्या था ? अब तो तुम ख्वाबों में , भी नही आते । एक बार तो , मेरे ख्वाबों आ जाओ ! देखो बेताब हूँ , तुमसे मिलने को बहुत । आ कर मेरी , बाहों में समा जाओ । देख तुम्हें तो इश्क हुआ है ,  मेरे इस बैरागी मन को । बनकर राग कोई , प्रेम का तुम ! मेरी मन बंसी में , छिड़ जाओ । देखो बेताब हूँ मिलने को अब , मेरे ख्वाबों में आ जाओ । 😘😘 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

द्वापर समाप्त हो चला अब !

द्वापर समाप्त हो चला अब !  कलयुग ने है पैंठ जमाई  ।। न राधा है अब , कोई यहाँ । न कोई , राधा का मोहन । न रुकमणी है अब ,कोई पिया की । न मीरा जैसी कोई जोगन ।। समर्पण भाव , अब दिखता नही । मित्र असंख्य , ढूंढ सुदामा , किशन सा हितैसी , अब कोई नही । द्वापर समाप्त हो चला अब !  कलयुग ने है पैंठ जमाई  ।।(२) ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

चलो अच्छा ही हुआ , इस कलयुगी जमाने से तुम ! रुख्सत हो गए ।

 चलो अच्छा ही हुआ ,  इस कलयुगी जमाने से तुम ! रुख्सत हो गए । वरना न जाने और क्या क्या ?  मुसीबतों के बोझ , और उठाने को बाकी थे । तुम्हारी कमी , बहुत खल रही है हमें । खाते पीते उठते बैठते , सोते जागते । तुम हर वक्त , याद बहुत आते हो ।  मगर माँ ! तुम मेरे ख्वाबों में , क्यों नही आते हो ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बहुत रो लिए तन्हा में , ग़ज़ल ओ नज़्मों का , सहारा लेकर ।

 बहुत रो लिए तन्हा में ,  ग़ज़ल ओ नज़्मों का , सहारा लेकर । कसम से  कुछ , लिखने या गुनगुनाने का । जी में अब  , कुछ आता नही । नासूर सा बन गया है , ज़ख़्म अब सीने का । अब तो हमें ,  अहदे हकीम कोई दिल का , कहीं नज़र आता नही । लूट ने वाले बहुत है बैठे , दिल की महफ़िल को । कोई बसा दे प्यार , इस महफ़िल में । वो फरिश्ता प्यार का ,अब कहीं नज़र आता नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

खामोश ही रहते है , वो अब अक्सर ।

 खामोश ही रहते है , वो अब अक्सर । जो कहते थे कभी हमसे कि , वो बोलते बहुत है ।  जो कहते थे कभी कि , तुम विन हम रह नही सकते ।  ना जाने क्यों  वो अब , हमसे खफा है इस कदर । के दो लफ्ज़...... प्यार  के भी अब  , वो हमसे कह नही सकते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कोई मुझसे भी कर ले प्रेम , क्या महंगा है ।

 कोई मुझसे भी कर ले प्रेम , क्या महंगा है ।  दिल ही तो चाहिए , देने को दिल के बदले दिल ।  वो तो हम हाथ में लिए घूमते है , कहीं कोई आ जाये ।  हमें अपना कोई दिलवर , बना कर ले  जाये । जज्बातों की कदर बहुत है हमें , जज्बाती जो ठहरे हम । दुःख के बादल उमड़े बहुत , और सघन बरसे भी । ठहरे है इस इंतज़ार में कि , कोई थाम ले अब हाथ  मेरा । दिल की इस , नमी सी धरा पर । कहे कोई कि आ चले थोड़ा , संभल संभल ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जीते जी तो , मुश्किल है कि चैन आये ।

 जीते जी तो , मुश्किल है कि चैन आये । जी के बाद आये तो , कह नही सकते । वैसे भी जिये में किसी का साथ , वो सह नही सकते । पसंद है दुनिया उनको , अकेले ही । अपनी खुद की , खुद में समेटना  । खुलकर कभी , किसी से वो मिल नही सकते । एक ने दिया है दगा तो ,  सब को हांकते है वो , एक ही लाठी से । किसी दूजे के लिए ,  दूजी लाठी वो ,  अब रख नही सकते । नफरत इतनी , भारी हुई है के हर दम,  सीने में लिए चलते है वो । गर प्रेम से भी कोई उन्हें मिले , तो लगे दुश्मन सा वो । मजबूर है वो , अपने दिल के हाथों । दो शब्द प्रेम के वो अब , किसी से कह नही सकते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

काश ! हम तुम कहीं , फिर मिल पाते ।

 काश ! हम तुम कहीं , फिर मिल पाते । कुछ तुम कुछ हम,  अपनी कह पाते । कहते सुनते करते याद ,  गुजरते वक्त की , जो साथ गुजारे हमने । काश ! कहीं फिर हम , मिल पाते । दिल में इक अजीब सी , हलचल हुआ करती थी । तुम जब सामने होते थे । कसम तुम्हारी तुम ही ,  मेरे ख्वाबों ख्याल में , हर वक्त रहते थे । फर्क उम्र का है , बहुत माना ।  मगर सुना है मोहब्बत , उम्र की ।  मौताज़ नही , हुआ करती । दिल की लगी को , दिल ही जाने । आ जाये जो , किसी पर तो ।  कोई भी बंदिशे इसे , रोक नही सकती । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  😘😘😘

भले चिंगारी ही क्यों न हो , दफन दिल में ।

भले चिंगारी ही  क्यों न हो , दफन दिल में । सुलागने के लिए , आग होनी चाहिए । नफरत के तूफानों में भी ,  जल सकते है , चिराग ए उल्फत । इश्क के लिए बन्दा , जनूनी चाहिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अपनों से लगी टूटकर , सहारा गैरों का लिया

अपनों से लगी टूटकर , सहारा गैरों का लिया । वो गैर भी जो कभी ,  अपनों से भी खास , हुआ करते थे । वक्त का खेल कहें इसे , या मेरा मुकद्दर । आज वो भी... दूर दूर तक , नज़र नही है आते ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

हम तो चिराग ए उल्फत , दिल मे जलाये हुए है ।

हम तो चिराग ए उल्फत ,  दिल मे जलाये हुए है ।  हर शाम वो सहर । है इंतज़ार बे सब्र तेरा ,  आने का हकीकत । यूँ तो आते ही रहते हो ,  तुम !  हर रोज मेरे ,ख्वाबों के शहर । यह प्रेम ही तो है , तेरा मेरा ।  वरना इस जहां में कौन ?  बेगानों को इतनी ,  अहमियत देता है । कौन किसी को दुख दर्द , अपने ज़ज्बात कहता है ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यूँ ही तो ! नही रूठ जाता है कोई , किसी से ।

 यूँ ही तो !  नही रूठ जाता है कोई , किसी से । कोई तो कारण , होता होगा । कुछ खामियाँ खुद पर तो ,  कुछ , उन पर भी तो होता होगा । यूँ ही तो !  नही हो जाती , जिंदगी बेवफा । कोई तो इसे ,  बरगलाने वाला , होता होगा । माना के बहुत संजीदा है हम ,  दिल के , मुआमले में अक्सर । मगर हाल ए तड़प , ये कैसी ? कुछ तो गलत हमने ,  इस दिल के साथ , किया होगा ।  परेहज इश्क था , बताया शायद ।  दिल ए हकीम ने । लगी दिल की तभी शायद , इश्क की इन्तेहाँ हो गयी । सोच कर इश्क , दिल ने तो , बेइंतहां ही किया होगा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

रिश्तों में जब , भरोसा टूटता है तब ।

रिश्तों में जब , भरोसा टूटता है तब । तब ! दिल की हालत , क्या होती है ? कल्पना मात्र से ही , दिल बैठा जाता है । मन क्रोधाग्नि में.... तृण तृण कर ,भस्म हुआ जाता है । यूँ तो तब , सब कहते है कि अच्छे हैं । यह पूछे जाने पर के ,  कैसे हो ? अब क्या कहे कि...  मर मर कर , जी रहे है हम । रह गईं है अब .. जग दिखावे की , रस्में ही । किसी समझौते में , बंद होकर । लुटे लुटे होश में आये तो क्या ? अपना सब कुछ खोकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

किसने कहा था , बैठने को करके इश्क ।

 किसने कहा था , बैठने को ?  करके इश्क । हम तो कब से , कह रहे थे कि , आओ चले !  कुछ , आगे बढ़े । मगर तुम्हारे नखरे ,  वल्लाह ! क्या कहने ? रहो अब बैठे !  क्यों तरस रही हो ?  तेरे संग हम भी तो ,  रह गए है , बढ़ने से आगे । लो थामो हाथ , अब भी क्या , बिगड़ा है । आओ चलें !  देखो , मौसम भी अच्छा है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दुःखी हूँ मगर , खुश रहने की अदाकारी ।

दुःखी हूँ मगर , खुश रहने की अदाकारी । मुझे हर रोज , करनी पड़ती है । कभी दर्द छलक जाता है बाहर , तो रोक लेती हूँ । जख्म छुपाने की अदाकरी ,  हर रोज , मुझे करनी पड़ती है । गम का दरिया हूँ ,  ऐ नाशिबा तू ! क्या खूब मिला है । हर कश्ती पर सवार तेरी ,  आब ए फितरत पूछता है । इक तुम हो मलंग , जिससे चाहूँ में ,  बाँट सकू दर्द अपना । वरना चेहरे पर चेहरे , लगाने की अदाकरी । मुझे हर रोज , करनी पड़ती है । दुःखी हूँ मगर... ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कोशिशें बहुत की मगर......हर कोशिश नाकाम हुई ।

कोशिशें बहुत की मगर......हर कोशिश नाकाम हुई । कोई तो नही जो , चाहे हमें भी  उसी सिद्दत से । जैसा हमने चाह किसी को । अब तो जी चाहता है कि ,  अपनी चाहतों को , सुपुर्द ए खाक कर दूँ । या भर दूं आग , अपने सीने में इतनी के ,  इस मतलबपरस्त जहां को , जलाकर  राख कर दूँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्या समझूँ मैं तेरी , इस खामोशी को ।

क्या समझूँ मैं तेरी , इस खामोशी को । यही के , तुम शायद अब । नही चाहते कि , हमसे मुलाकात हो । वरना जमाने तो ,  कई बीते । हर रोज तुम्हें देखता हूँ , मैं आते जाते । कभी तो कुछ ठिठककर ,  हमसे दो हर्फ़ ही  कुछ , कहे होते आते जाते । सखी ! बेजान सा है जिस्म अब ,  तेरे ही ख्यालों में "मलंग" । खुद से ही खुद , गुफ़्तगू कर लेता है । तुझे , खुद में पाके । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ कुछ इधर भी नही , कटती है ये रातें ।

कुछ कुछ इधर भी नही , कटती है ये रातें । खामोश सी है । इक टकटकी सी ,लगी है ये नज़र । आशाओं की , राह जोहे । इक उम्मीद सी है तृण भर , दिखे वो तो , शायद पूरी होवे । क्या पता कब तलक , होगा इंतज़ार । कमल दल लिए , प्रेम सरोवर में । गाछ संग लिप्त , मन लिए स्वप्न ये । इक पूर्ण विराम तक । लिखे  कब ? जीवन के कोई शब्द नए । एक खोज मन की सखी , वो पूर्ण हो तुम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

रहे कब साथ तुम मेरे , एक तन ही तो था ।

 रहे कब साथ तुम मेरे ,  एक तन ही तो था ।  तुम्हारे...! मन की कमी तो ,  मुझे हर वक्त ही खली । चलो....! अच्छा ही हुआ , आज तन भी , तो मन भी है । इक दूजे से , कुछ जुदा जुदा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

याद है मुझे वो तेरा , मुँह का चिढ़ाना ।

 याद है मुझे वो तेरा , मुँह का चिढ़ाना । और मेरे दिल का टूटकर , तुझ पर आ जाना । वो तो वर्षो की बात है । आज हर वो बात , ख्वाब सी लगती है । मोहब्बत का जुनून जब , सर चढ़ कर बोला था । तब तू ही तू बस तू हाँ तू  , मुझे दिखा करती थी ।  हर तरफ.....और मैं तुझे । वो तो वर्षो की बात है । आज मैं तो हूँ  पर , तुम वो नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

तू दिल में बसी है इस , कदर ।

तू दिल में बसी है इस , कदर । के हर तरफ जिधर भी ,  देखूं । तू ही तू आती है , नज़र । मेरी मदहोशी को , न समझो । नशा कोई , गैर ए शराब । तेरी मयखाने सी नज़र का , है ये असर । बन के पैमाना , जाम ए हुस्न । पिलाये जाती है , मुझे तेरे ये नज़र । तू बतला भी दे सखी !  क्या अपनों में हूँ ,  मैं तेरे ? या ढूंढती है गैरों में ,  अब भी मुझे , तेरे ये नज़र । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम कहती हो.....! मन जो करे , मन जो माने , मन जो सोचे ।

 तुम कहती हो.....! मन जो करे , मन जो माने ,  मन जो सोचे । सब होये वो , जो मन चाहे । फिर.....!  मन चाहे तुम को तो , मन की क्यों ?  न माने तेरा  मन । क्यों रहते है ?  मन इधर उधर , अनमने से मन । बोलो सखी !  बोलो !   क्या कहता है , अब तेरा मन ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 🤔🤔🤔

लो खेलो ! ले आया हूँ मैं ,

 लो खेलो ! ले आया हूँ मैं  दिल अपना , मुरम्मत करवाकर । ध्यान से जरा , देखो !  कहीं फिर से टूट न जाये । क्योकि ! तेरे इस शहर में ,  दिल साज़ नही मिला करते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अपना तो सूरज निकले !

 अपना तो सूरज निकले ! एक अरसा हो गया है ,  शायद । आशाओं की राहें तंग और ,  अंधकार से घिरे । मन को लिए , अब भी । भटक रहा हूँ मैं , जमानों से । इक लौ की , तलाश लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न जाने क्यों ?

 न जाने क्यों ? मुझसे ही वास्ता पड़ता है ,  हर उस शख़्स का । जो मेरी ही तरह , टूटकर बिखर गया हो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बहुत शौक था , हमें ।

बहुत शौक था , हमें । उनके दिल में , उतर जाना । अफसोस कि हालात , कुछ ऐसे बने कि ,  वो ! नज़र से ही , उतर गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कभी बहे जिस जगह में , अरमान !

कभी बहे जिस जगह में ,  अरमान ! बन कर अश्क ए दरिया । आज वहां !  रेत ही रेत ,चारों ओर ! नज़र आते है । समझ सको तो , काफी है । पेश ए खिदमत में . यह अल्फ़ाज़ ! बचा क्या है अब और ,  जो लूट सके कोई । हम तो अपना , सब कुछ ! लुटाये बैठे है । अपनी नज़ाकत से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

रहा इश्क मेरा ,चढ़ते सूरज सा ।

 रहा इश्क मेरा ,चढ़ते सूरज सा । के ,  धीरे धीरे मोहब्बत की , शाम हो गयी ।  हर रातें गुजार ली हमने , आसरे पर यही ।   कभी तो होगी मेरे इश्क की ,  कोई सुबह वो नयीं । कैसी कटी जिंदगी , तड़प और बदगुमानियाँ में ,  क्या बताये । अब तो जीने की हसरतें खत्म ,  तमाम हो गयी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कम वक्त यह कोरोना.....उफ्फ ! ये नाज़ुक बाहें , और ये सुईंयाँ ।

 कम वक्त यह कोरोना.....उफ्फ !  ये नाज़ुक बाहें , और ये सुईंयाँ । इस बच्ची की ,तकलीफ अब । समझे कौन ? देखो हंस न देना , जब तक चुभे नही सूई ।  होता है दर्द कितना ,  बिना चुभन के , जानेगा कौन ? 😂😂😂 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इतना जानते हुए भी , हम महरूम क्यों आखिर !

 इतना जानते हुए भी , हम महरूम क्यों आखिर ! शायद मेरे नाम का इश्क , अभी कोई बना ही नही । थक गया हूँ  दर्द बांटते बांटते , बनकर मैं हमदर्द  । बांटे दर्द मेरा भी कोई , आखिर ! शायद मेरे नाम का हमदर्द , अभी कोई बना ही नही । ✍️ज्योति पर रतूड़ी

स्वयं पर कोढ़ होवे और , दूजे की फुंसी से घृणा ।

 स्वयं पर कोढ़ होवे और ,  दूजे की फुंसी से घृणा । धन्य है भारत के , विचित्र विपक्षी । बता भी दो के अब  ,   सत्ता के लिए अभी और , कितना है  गिरना । हमने जो चुनना था , वो हमने चुन लिया । देश को सुरक्षित हाथों में , हमने सौंफ दिया है । युग-युगांतरों पश्चात कदाचित ,  चाणक्य काल लौट आया है । घर द्रोही कर रहे है गठबंधन ,  देश को कैसे अब लूटा जाए । कर रहे है बाहरी देशों से संधि कि ,  भारत को कैसे नोंचा जाए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

एक कशिश सी है, तुझमे के दिल ..

एक कशिश सी है,  तुझमें कि दिल... तेरी ओर , खिंचा चला आता है । वरना लुभाने वाले चेहरे ,  बहुत देखे है हमने ,  हुश्न के इन बाजारों में । भाये इस दिल को चेहरा ,  किसी और का , तेरे सिवा । वो चेहरा तुझ सा.......  हमें कोई और , नजर आता नही । रोकने की कोशिश ,  करता हूँ बहुत के...... न करे ये प्यार तुझ से  मगर .... इस दिल को , तेरे सिवा ।  किसी और पर ,  प्यार आता नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इच्छा नही होती अब , किसी से बात करने की

इच्छा नही होती अब , किसी से बात करने की । न जाने क्यों ?  एक तेरे सिवा सब मुझे । बेईमान नज़र आते है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ खामोशियाँ और है , हिस्से में मेरे ।

कुछ खामोशियाँ और है ,  हिस्से में मेरे । ठहर ! देखकर जाना कि , मिलती है वो अब मुझे , किस हिसाब से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज फिर....उनका ख्याल आया ।

आज फिर....उनका ख्याल आया । विसरा हुआ वक़्त ,  वो लम्हा इश्क का । फिर , याद आया । आज फिर....उनका ख्याल आया । वो हवाओं में , लहराता हुआ , उनका अंचल । ज़ुल्फ़ों  का उनके , रुख्सारों पर , बिखर जाना । हटाएँ चेहरे से हम , ज़ुल्फ़ें उनकी और , उनका शरमा जाना । पल दो पल , रूठ जाना । फिर उनका मुस्कुराकर , गले से लग जाना । बिसरा हुआ वक्त , वो लम्हा इश्क का । फिर , याद आया । आज फिर....उनका ख्याल आया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ये जग है दो मुँही , कहीं भी ,जीने नही देती है ।

 ये जग है दो मुँही ,  कहीं भी ,जीने नही देती है । न हँसने , न रोने ही देती है । ये दुनिया है दुष्ट बड़ी , सही को गलत और,  गलत को सही कहती है । भ्रम जाल के ताने बाने में ,  उलझी हुई है , आम जन ।  कैसे पाए चैन भला ,  भय के इस , परिवेश में कोई । कौन मित्र और , बैरी कौन ?  न जाने कहाँ से आज जाए , अदृश्य बरछी । घात करने को , इस कारण , व्याकुल है हर मन । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी    

जो भूल गए है , हमें वो ।

जो भूल गए है , हमें वो । वो भी.... किसी और से , भुला दिए जाएँ । जैसे हम हुए है उदास , उनकी बे-रुखी से । खुदा करे कि वो भी ,रहे उदास । किसी की , बे-रूखी से ।            *** तुम भूलना चाहो हमें तो ,  भूल जाओ मगर । करोगे किसे याद तुम , भला ?  ये तो बतला  जाना । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी

देखा तुमने ...

 देखा तुमने !  कितनी मज़बूर थी ,  जिंदगी अब तलक ! तालाबंधी से । थोड़ा ढील क्या हुई , फिर चलने लगी जिंदगी । एक दम से , मस्त होकर । 😂😂😂 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

हमने यूँ हीं , कही थी जाने की ,

 हमने यूँ हीं , कही थी जाने की ,  रूठते वक़्त . काश की तुमने , तब  रोका होता ! आज हम , इतनी दूर ,  न आ गए होते , यूँ ही चलते चलते . ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी