सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

तेरी जिद के आगे , आरजू अपनी दिल की को ,

 तेरी जिद के आगे , आरजू अपनी दिल की को ,  दफन किया हमने । तूने जैसा चाह , वैसा ही किया हमने । मुरझा गए क्यों वो फूल आज  , मेरी हसरतों के।  गुमान था जिन पर,  मुझे तेरी चाहत का।  वफ़ा पर तेरी मुझे भरोषा है बहुत , बस रंज बहुत है तेरे यूँ बदल जाने का। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कहूं क्या , क्या गजब लिखते हैं ।

कहूं क्या , क्या गजब लिखते हैं । किसी का हो या खुद ही , आप यह करामात खूब करते हैं । तारीफ करूं तुम्हारी उंगलियों की , जिसमें होती है कलम , यह करिश्माई । या दिल के तेरी जिसमें तुम ,  यह ज़ज़बात रखते हैं । जो भी हो जैसा भी हो मगर तुम ,  बहुत कमाल करते हैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

भटका ना अपनी नजर...

भटका ना अपनी नजर , किसी के रूप में यूं । दर ब दर..... चाहत और दिल जिसका अच्छा हो , उसकी क़दर कर । है वो तेरे ही करीब इतना कि , अपनी नजर उसके करीब कर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थी मौज ,क्या आंनद था उस जमाने में ।

 थी मौज ,क्या आंनद था उस जमाने में ,  थी टूटी चप्पल भले , मज़ा आता था चलने में । कपड़े रहे भले कम थे , तब भी ठंड की मजाल कहां । रोक सके जो हमें , लुफ्त बहार से लेने में । थी रोटी चाय , सुबह की हो शाम की । सताए भूक , तो वो कंद मूल सी  बात कहां । थे खेल वो निराले , मेले भी वो मतवाले । यही सोचते है हम कि ,  क्या फिर होंगे कभी हम , वो ही दिल वाले । ✍️ज्योति प्रसाद  रतूड़ी

ना जाणी किलै बिसरी जांदान सि (गढ़वाली)

ना जाणी किलै बिसरी जांदान सि , माया का बटोयी । हिटि रै सि कबि जु म्यारा , हृदे का बाट।। काख मेरी निवाति जु , कै जांदी रै । बिन म्यारा कभी जु , न खांदि थै । आज खांदी सैंदि होली वा , कनु कै ।  अर्थात :–  ना जाने क्यों भूल जाते है वो , प्यार के राही । गुजरे थे जो कभी , मेरे दिल के रास्ते ।। मेरे बगल को गर्माहट , जो करते रहे । मेरे बिना जो कभी , खाते नही थे ।। आज खाते सोते तो होंगे वो , मगर किस तरह । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

अब नही आते वो दोस्त पहले से

 अब नही आते वो दोस्त पहले से* , मेरी जिंदगी में । ना जाने कौन बदल गया....समय , दोस्त या मैं ? अकेला ही अब... खोजता फिर रहा हूं , वो निशान ए कदम  जो गवाही दे सके , हमारी दोस्ती की । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी अर्थ *दोस्त पहले से = पहले जैसे दोस्त , पहले की तरह दोस्त

अब , ना मालूम क्यों नही आते । वो पहले से ख्वाब...?

अब , ना मालूम क्यों नही आते । वो पहले से ख्वाब...? ऐसा भी तो नही है कि ,  चाहत में ही , कोई कमी आई हो । दिन दुगना और , रात चौगानी सी बड़ी है । दिल की चाहत में तुम....! फिर क्यों नही आती हो , मेरे इर्द गिर्द ? उसी पहले से अंदाज में तुम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बंदे मातरम का , नारा लगा कर ।

 बंदे मातरम  का , नारा लगा कर । उठा लो मशाल हाथों में ।। खतरे में है आज देश फिर से , जय घोष गूंजा दो गलियारों में । बांध कफ़न सर पर अपने ,  कूद पड़ों रण अंगारों  में । जात पात में न  बटों तुम , धर्म से धर्म न टकराव । मिलकर पताका अपना तिरंगा , शीर्ष जग में लहराओ । शहीदों की कुर्बानी को ,  व्यर्थ कभी न जाने   देना । मां का आंचल रहे सदा निर्मल , दुश्मन को कभी छूने न  देना । बंदे मातरम , का नारा लगा कर , उठा लो मशाल हाथों में । खतरे में है आज देश फिर से , जय घोष गूंजा दो गलियारों में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हमें बेसब्र ही रहता है इंतजार , तेरे आने का ।

हमें बेसब्र ही रहता है इंतजार ,  तेरे आने का । जबकि मालूम है हमें कि ,  तुम आते हो , किसी और के लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आसान नहीं है , भुला देना किसी को ।

आसान नहीं है , भुला देना किसी को । किसी से  दिल , लगा कर  तो देख । अगर भूल जाओ उसे तो , फिर कहना कहना । ❤️ अपने जज्बात को अक्सर वो , दबा लिया करते है । नादान है वो....! हम तो उनकी मन की बात ,  उनकी आंखों में , पढ़ लिया करते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हम समझे के, हमसे है इश्क उन्हें ।

हम समझे के,  हमसे है इश्क उन्हें । हमें क्या मालूम था के....  वो सीखते रहे हूनर प्यार का हमसे , किसी और के लिए । साह दर्द बहुत मगर उफ़ , तक न किया ।  वो जालिम जख्मों पर नमक लगाते रहे ।  हम दिल के नाजुक...... उनकी हथेलियों पर , फूंक मारते रहे । मेरे चेहरे की उदासियों पर , ना जाना ऐ जाग वालों । ये खामोशियां ये मायूसी , मेरी शरफत से इजात है । वरना दिल में सोले जलाए , हम भी रखते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जिंदगी भर नही भूलेंगे वो , मुलाकात की रात ।

 जिंदगी भर नही भूलेंगे वो , मुलाकात की रात । एक अंजान हसीना से हुई थी ,पहली मुलाकात । मेरे चेहरे पर , उनकी जुल्फों का खुलना । वो महकी महकी खुशबू जैसे , चंदन सा हो बदन उसका । नही भूलेंगे हम कभी , उनके संग गुजारी है जो रात । जिंदगी भर नही भूलेंगे वो , मुलाकात की रात । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हां गुजर रही है जिंदगी , मेरी भी यहां पर ।

 हां गुजर रही है जिंदगी , मेरी भी यहां पर । कोई ख्वाब का बोझ लिए के , हमसफर होते जो तुम । कसम से बहुत सकून से , गुजरती तब जिंदगी । ना सिकवा होता ना शिकायत ही खुदा से कोई । बन जाते हम नावाज , मेरे जो तुम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

राह ए मोहब्बत में , सबका नसीब कहां के , मुकाम हासिल हो ।

 राह ए मोहब्बत में , सबका नसीब कहां के , मुकाम हासिल हो । मैंने कहां चाह था के , उनसे मोहब्बत हो । हमें आदत हो गई थी ,  अपने दर्द ए दिल से गुफ्तगू की , हमनें कहां चाह था , कि उनसे मुलाकात हो । अपना ना होके भी , न जाने वो क्यूं , वो अपना सा लगा । दिल ने उन्हें , खुद में बसा लिया । मालूम नहीं कि , सही या ग़लत किया , जो भी हुआ , ये मेरे दिल  ने किया । जुदा गर अब वो , हो भी जाए , मुझे मझधार में , अकेला छोड़ भी जाए । नहीं सिकवा करेंगे,  उनसे कभी । उलझी है शाम उनकी , सुलझा पाऊं , किस हक से मै , चाह नहीं कभी , उनको इस क़दर  की अपना बना पाऊं , उन्हें  मैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उलझनों का सिलसिला कुछ , इस क़दर चला ।

उलझनों का सिलसिला कुछ , इस क़दर चला । जितने सुलझाते गए हम ,  उससे कई ज्यादा , उलझते चले गए । सोचता हूं "मलंग" क्या होगा आगे तेरा । क्या कमी  परवरिश की है , या किस्मत तेरी ।  समय की बिसात पर भी नहीं कोई ,पक्षधर तेरे । वरना तू अकेला ही तो नहीं , आया इस जहां में। बुरा नहीं तू , न आव ओ हवा ही बुरी तेरी , रहम भी है दिल में तेरे , फितरत भी आजाद जीने की । है दर्द भी सबके लिए पाले जो दिल में  लिए तू । "मलंग" वो अपना काम निकाल कर , छोड़ जाते है  तुझे । बदल डाल अब खुद को तू , छोड़ दे साथ उनका जो डूबो दे तुझे । जीवन पथ पर सफ़र लंबा है अभी , मजिल पाने के लिए । हासिल होगा मुकाम तुझे , संकल्प बांद ले । छोड़ कर निराशा के बीज भाव , अशाओ के दीप जला ले । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ आदत हो गई है आपकी

कुछ आदत  हो गई है आपकी , फिकर तो मुनासिब ही होगी । वैसे तो कई है दुनिया में ,  मगर चाहत हमें , हर किसी की ना होगी । आज ही तो नहीं हुई ,  गुफ्तगू तसली बख्श , ना ही दीदार हुए कुछ पल , हो जाते तो , दिल की ये हालत तो न होती । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ये मुझे भी ना पता है , और तुझे भी ना पता ।

 ये मुझे भी ना पता है , और तुझे भी ना पता । है कौन सा यह , प्यार हमारा । इसका नाम क्यों है लापता ? आ जा करीब मेरे , आ बैठ तो ज़रा  इस प्यार का कोई  नाम दे दें ।  रह न जाए ख्वाहिश कोई , जिंदगी की । हर ख्वाहिश को अंजाम दे दें । डूब जाए हम ,  आब ए मोहब्बत में इतना । कि खबर  हमें न जहां की हो । मै तुझ में समा जाऊं और , तू मुझ में समा जाओ ।  न तुम कुछ कहो , और न मै कुछ कहूं । चलें जाए दूर कहीं बे खबर , जहां प्यार ही प्यार हो , और हम इक दूजे में खो जायें। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तेरा साथ है मेरी जिंदगी , तेरा प्यार है मेरी बंदगी ।

 तेरा साथ है मेरी जिंदगी , तेरा प्यार है मेरी बंदगी । रहूं दूर तुझसे  किस तरह , तुझे पाने की जुस्तजू है मेरी । हो गया है मुझ पर ,  जिसके के प्यार का असर । वो मेरे यार तुम थी ,  तुम्हीं तो थी ।  मेरे दिल की आग को ,  कौन ये जला गया । थी बुझी जो हसरतें ,  उसको भी जगा गया । वो कौन थी  वो कौन थी , तुम तो थी , तुम्हीं तो थी । बसर जो हमने कर दिया , तुझको अपना मान कर । सूनी पड़ी थी ,  तब तलक , मेरे दिल ये धड़कने । आए नहीं थे , जब तलक । इस दिल तुम , गहराइयों में । वो मेरे यार तुम्हीं तो थी , जिसने इन्हे धड़का दिया । अपने प्यार के रंग से , जीने का ढंग बतला दिया । रात भर गुजर गई ,  पहर बदल बदल गया । जिसके प्यार का असर , इस तरह से कर गया । तन कहां , मन कहां ? ना कुछ पता न कुछ खबर , वो मेरे यार कौन था । तुम तो थी , तुम्हीं तो थी । खेलते रहे  हम ,  प्यार की बिसात पर । खुश हुए बहुत हम ,  अपने दिल को हार कर । जीत जो गया दिल मेरा , वो मेरे यार तुम थी , तुम्हीं तो थी । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

वो अभी तक खुद को , शातिर समझे हुए है ।

 वो अभी तक खुद को , शातिर समझे हुए है । और हम...!  जान कर भी अंजान , खुद को बनाए हुए है । हां शायद...!  इससे अच्छा , झूठ न चलने वाला था "मलंग" के हम नही है वो....!  और वो....!  सर ए आम रंग ए महफिल , सजाए हुए है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उम्र भर की तलाश....

उम्र भर की तलाश ,  पल भर में ही , खत्म हो जाए ।  अगर...! तेरा खिलखिलाता हुआ चेहरा ,  हमें जो...! इक बार , नजर आ जाए । फिर ना तमन्ना कोई ,  ना आरजू  ही रहे ऐ हुश्न ! बस जो तू  ! इक बार ही सही , मेरे गले से लग जाये । हो जाए मुकम्बल , दास्ताँ  मेरे इश्क की  रही जो अधुरी अब तलक...! हो जाए पूरी वो ,गर तेरे मोहब्बत की ,  ऐ हुश्न ! मेरे दिल पर सही* हो जाए । * हस्ताक्षर ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

पता नही क्यों मगर...! आज रह रह कर ...

 पता नही क्यों मगर...! आज रह रह कर , तुम्हारी याद आ रही है । करवटें बदल बदल कर...!   रह गए हम मगर ,  आज हमे नींद , नही आ रही है । तुझे याद ना करने की, कसम तो  हमने खाई है मगर ...!    किया जो तुझे याद तो , मेरी इन आंखों में बहे आंसू जो....! दिल के कसूर की ,  सजा पाई है । पता नही क्यों मगर...! आज रह रह कर , तुम्हारी याद आ रही है । करवटें बदल बदल कर...!  रह गए हम मगर ,  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्या कहे कि ना अब वो कशिश है ,तेरी गुफ्तगू में ।

क्या कहे कि ना अब वो कशिश है ,तेरी गुफ्तगू में । ना ही जुस्तजू है अब कुछ कहने और  कुछ सुनने की । इक दस्तूर ही महज रह गया है अब , कुछ लफज मुलाकातों का । चलती मैं जैसे कदम रोक लिए कुछ , दो शब्द  कहने सुनने में । अब तो हमारे कहे शब्द भी , बुरे लगने लगे है । शायद जरूरत से ज्यादा ही हम , कुछ कहने लगे है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

ना जाने मुझे अब , क्या हो गया है ।

 ना जाने मुझे अब ,  क्या हो गया है । नफरत सी हो गई है  मोहब्बत के नाम से।। थी तमन्नाओं में और तस्बुर में ,  जो आठों पहर । कटते नही थे दिन ओर  रातें ,  जिनके  बिगैर । अब नही है मेरे दिल में ,  उनका ठहर । सहज ही कट जाता है अब , उनके बिन मेरा हर पहर ।   ✍️ज्योति प्रसाद्र रतूड़ी

मिला क्यूं वो मुकद्दर , जिसमें लिखी जुदाई थी ।

 मिला क्यूं वो मुकद्दर ,  जिसमें लिखी जुदाई थी । दिल लगाने का सिला भी , क्या खूब मिला । गफलत , हमसे इतनी बड़ी भी कोई ना हुई । ना वो समझ सके हमको ,  ना हम समझा सके उनको । बस फासले बढ़ते ही गए , दिलों के दरमियान ।  💔 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

आ जा आ जा रे साथिया , वो मेरे साथिया ।

आ जा आ जा रे साथिया , वो मेरे साथिया । तुम बिन सूना है मेरी रतिया , दिन सूना , सूनी है , दिल की मेरी बगिया । आजा रे ! आजा रे ! हुई क्या मुझसे भूल भी ऐसी , रूठ गई क्यूं , दिल तू मेरी । प्रीत का दामन सूना पड़ा अब , ना कोई बहार है , ना वो मस्त नजारे , दूर गगन में है बस धुंधले तारे । आजा रे ..... जब से मुझसे रूठ गई तू , सो ना सका मैं , जाग भी ना पाया । दर्द छुपाए , तड़प रहा मैं , लेकर दिल में , तेरी यादों का साया । आजा रे आजा रे..... मेरा जीवन , मेरी काया । प्राण तू है , तू ही छाया । चैन भी तू है ,दिल का मेरे , लौट के आजा  ओ साथी मेरे । अन्तिम सांसे , जीवन की ये , दरस को प्यासी , तेरी सूरतिया की । राग पुराना , गीत सुहाना  आके तुम, संग फिर गुनगुना । आजा रे , आजा रे ,  साथिया , वो मेरे साथिया ।❤️ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

नही चाह किसी को , यूं आज तलक ।

 नही चाह किसी को , यूं आज तलक । "इश्क" मालूम नहीं हस्र क्या होगा ।। क्या मै ही हूँ इस तरफ डूबा , उनके ख्यालों में । या... उन्हें भी मेरा , ख्याल होगा ।। ❤️❤️ बहुत खूब सूरत , यह पल है । जीवन के हर मोड़ पर , यह याद आएगा । धूप हो या छांव , रुकते कदमों का , सहारा होगा । हर पल घुली होगी मिठास इसमें,  तेरे प्यार की । निराश ये मन , कभी न होगा । ❤️❤️ बे बक ही ,कह जाता हूं मैं । पता नहीं क्यों ? दिल से सिर्फ , तुम से ही,  बात करने को , जी चाहता है । समझ लो दीवाना या ,  और कुछ , अपनी समझ से । रहा नहीं जाता ,इक पल भी अब , तुम्हारे बिना । ❤️ आप ज़रा और करीब आजाएं तो ,  क्या हर्ज होगा ? मेरा....! आपके प्यार की छांव में , रहने का जी  , बहुत चाहता है । आरज़ू भी न रहेगी कोई , ना हसरत ही तब , पूरे हो जाएंगी , हर ख्वाइशें हमारी तब । तेरे पहलुओं में , लिपटने का जी , बहुत चाहता है । ❤️ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

जिंदगी का यही , इक फसाना है ।

 जिंदगी का यही , इक फसाना है । खाली हाथ आए और , खाली हाथ ही जाना है ।  पैदा होते ही दौड़ की जिद्द थी हमारी , उम्र भर दौड़ते ही जाना है । बंद मुट्ठी लाया बांध मुक्कदर , मिलेगा वहीं जैसा नसीब लाया है । जोड़ लिया धन माया वैभव सारे , संग तो मधुर वचन ही जाना है । गज दो जमीन वो ही अंत तक , जिसका कर चुकाना है । ना तेरा ना मेरा सब यहीं रह जाना है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैंने जिद्द छोडी है तुम्हे पाने की , उम्मीद नहीं ।

मैंने जिद्द छोडी है तुम्हे पाने की , उम्मीद नहीं । सुना है उम्मीद में जीना भी,  दिल को सकून , बहुत होता है । ❤️❤️ हम तो रहे आज तक  इसी भ्रम में , शायद असर हमारा है  ।  हुनर वो सीखते रहे  मोहब्बत के , किसी और के लिए ।  😎 बना ना लूं तो कहना , जिंदगी को अपने ही हिसाब से । बहुत जी लिया हूं अब तलक मैं औरों के हिसाब से । ☹️ वर्षों लग जाते है ,किसी को प्यार पाने में । ये खुश नशीबी हमारी क्या कम है...! चंद मुलाकातों में ही हम , इक दूजे के हो गए । 😘😘 दिल में प्यार की समा , जलाए रखना । अपनी हसरतों में हमें , अपना बनाए रखना । मैं आऊंगा जरूर , इक दिन पास तुम्हारे  अपने दिल में मोहब्बत जगाए रखना । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

जिंदगी भी ठहरी तो कहां आके , ऐ दोस्त !

 जिंदगी भी ठहरी तो कहां आके ,   ऐ दोस्त !    ना आएंगे पास तो , जाएंगे भी दूर  नहीं  । **** तुम भी तो कुछ बोलिए , मुख अपना खोलिए । माना बंदिशे है बहुत  , माना बंदिशें है बहुत  मगर हम इशारों को समझने का , हूनर बाखूबी जानते है । *** रहता हर वक्त , तेरा इंतज़ार क्यूं है ,  ऐसी भी तो कोई , बात नहीं है बीच हमारे । फिर कुछ खास होने का , अहसास क्यों है । न तो चाहत  है कोई , ना आरज़ू ही । फिर छुपी  हुई हो , कोई हसरत जैसे । दिल को यह , अहसास क्यों है । *** रख दिया आमने - सामने , किताब हमने जिंदगी की । पढ़ सको तो पढ़ लो ,  हर्फ कोई अब , छिपा नहीं  रहा क्या फसाले , दरम्यान अब हमारे , तुम्हारे । *** नींद हमारी , ख्वाब तुम्हारे । सोते है इन्हीं, के सहारे । टूट ना जाना सपने प्यारे ,  जब तलक ना हो , वो हमारे । *** दिल की सुनी पड़ी वीणा के तार  ,  फिर से छिड़ने लगे । बजने  लगा कोई संगीत पुराना । चोट आपने भी खाई है , मोहब्बत में शायद , वरना.....! समा यूं न उधर भी , गम का होता । *** वफा और प्यार ,  बस....!...

ई आसुं छ जु म्यारा , प्यारी !

 ई आसुं छ जु म्यारा , प्यारी !  यु खुदों कु उमाल छ । त्यारा बिन , ज्यू नि लगदु मेरू , प्यारी ! कन्नि या माया कु ,जंजाल छ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वक्त है वही , कमी सिर्फ आपकी...

 वक्त है वही , कमी सिर्फ आपकी , वक्त कब रुका है , कट ही जाएगा । लेकिन वो अब पहली सी बात कहां । ***** तुझे  कुछ तो होगी मोहब्बत ,  कभी तो हम तुम्हें याद आएंगे । जज़्ब कर लेना तब , आंसुओ को अपनी पलकों पर । हम तुम्हें उन्हीं में , नजर आएंगे । ❤️❤️ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बहुत ही खूब सूरत है यह तोफा तेरा , प्यार है नाम जिसका ।

 बहुत ही खूब सूरत  है  यह तोफा तेरा ,  प्यार है नाम  जिसका । लगा के रखा हूँ सीने से , इसे मैं हर दम । न ख्याल है रुसवाई का , न डर जमाने का । *** हाल ए दिल क्या बयां करें हम ,  बस इतना समझ लो कि..... जी रहे है हम अब , तेरे इंतज़ार में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यूँ लगता है मुझे , मेरा वसंत फिर लौट आया है ।

 यूँ लगता है मुझे , मेरा वसंत फिर लौट आया है । आप आये , आप आये के बाहार आयी है । हूँ अकेला ही , हूँ अकेला ही मगर अहसास तेरा  ही है मुझ को , संग संग चलता जो मेरे , वो साया ही है तेरा । यूँ लगता है ..... गुनगुनाता हूँ जब भी कोई गीत ,(2) तुम ही ख्यालों में होते हो । रख सर अपना मेरे कांधों पर , और गुम सी किसी ख्यालों में । हाथ जब उठता है मेरा , सहलाने को । तेरे रेशमी बालों पर ,  कस लेती हो तुम मुझको,  फिर अपनी बाहों में । ये ख्वाब है, ये ख्वाब है  मुझ को इस ख्वाब में ही , जी लेने दो । पता क्या , पता क्या फिर ये ख्वाब हो न हो । यूँ लगता है , मेरा बसंत फिर लौट आया है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

फिक्र है के...... महोब्बत न रुठ जये

 फिक्र है के......  महोब्बत न रुठ जये ,  मेरे किसी अजीज की । दिल का बड़ा नाजुक है वो... टूट गया तो , बिखर जायेगा वो । हिम्मत नही जुटा पाएगा वो , के चले वीराने में । आदत नही उसे के ,  तेरे बिना रह सके वो । तू ही ख्याल है उसका ,  तू ही ख्वाब है । यकीन नही मुझे के ,  तेरे बिन क्या जी सकेगा वो ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दर्द से रिश्ता , हर किसका होता है

दर्द से रिश्ता , हर किसका होता है  ऐ दोस्त ! फर्क सिर्फ इतना सा है ... कोई पी जाता है ,  चुप रह कर । और....! कोई छलका देता , आंसुओं में बहा कर  । **** कुछ बीत गयी है जिंदगी ,  कुछ और बितानी है । संग तेरा यूँ ही बना रहे तो...! हर दिन सुहाना और...! हर रात मस्तानी है ।  **** वो आए और आ के , चले गए । कुछ कहा भी नहीं और....! सब कुछ कह के भी चले गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

गैल नि न तुम म्यारा , कन्नी या गेल्याण छ (गढ़वाली)।

 गैल नि न तुम म्यारा , कन्नी या गेल्याण छ । माया भी या भिंडी छ , फिर किले से मैसी दूर छ । दिल का आस पास छ , प्रीत लुकीं छुपीं हमारी । खयाळ कब तक रालू यू , कब तकै की आस छ । दिल का एक क्वाणा मू  , बाँद तेरी मुखड़ी छ । रात का अंधेरा मु यकुली , सारू मेरु यू ही छ । सर आंदि भैर तू , ज्वान जनी दिखेंदी छ । गैल नि न तुम म्यारा , कन्नी या गेल्याण छ , माया भी या भिंडी छ , फिर किले मैसी दूर छ । ❤️ ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यूँ तो तेरी इस , रंग ए महफ़िल में ।

 यूँ तो तेरी इस , रंग ए महफ़िल में । तरानों की कोई , कमी न थी । मगर छेड़ दे जो , मेरे दिल के तार । ऐसा कोई , फनकार न मिला । *** खुद को जलाकर , खाक कर दिया हमने । फिर कैसे न कहें हम के , तेरे तलबगार हम नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरा आना लौट कर मुमकिन है बस..

 खिंच जाए जो लकीर , बन कर दरार रिश्तों में । फासले हो जो इजात , दरम्यां दिलों के । न पैदा करो हालात कभी ऐसे , जो घाव दुखता रहे , नासूर बनकर । **** न रास्ता कठिन होता है , न आसान होता । बस वो राही पर , निर्भर करता है कि वो कितना धैर्यवान है ।  जो परस्थितियों से न घबराए , मंज़िल उसी को मिला करती है । **** मेरा आना लौट कर  मुमकिन है बस.. ये बात अलग है कि , तुम हमसफ़र बन कर न चलो।  जो शब्द पिरोये है हमने , तन्हाई में अक्सर.. रहा अक्स तेरा , मेरी नज़रों के समाने। बस इक दीवार ही थी ,आर पार नज़र आता था ... कभी हम देखते थे तुम्हें , कभी तुम शरमा जाती थी , ख्यालों में। **** कुछ कुछ अब , अहसास होने लगा है । की शायद , यह रोशनी ही मुझे.... अंधकार में डुबो जाएगी । फिर न हसरत ही रहेगी ,जीने की ... और न आरजू ही , मारने की । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

खुद से खुद की , पहचान कर ।

 खुद से खुद की , पहचान कर । खुद से खुद सवाल कर । तेरा जन्म हुआ ,किस अर्थ भला । खुद में तू  जवाब , तलास कर । देखना जमाना भी , चल पड़ेगा पीछे तेरे । खुद को इतना , कामयाब कर । हो गुमान तुझ पर जमाने का,  रह सादगी में तू ,  न कभी अभिमान कर । रख दिल में दया भाव , सब के लिए । सज्जन तो सज्जन , दुर्जन भी प्रभावित हो । बने मिशाल तू जमाने में , ऐसा तू काम कर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न चल अंगारों में , तपिस बहुत है ।

 न चल अंगारों में , तपिस बहुत है । जल कर खाक न हो जाये कहीं, हसरत तेरे इश्क़ की ।। ******** यदि कभी न उतर पाऊँ खरा , तेरे पैमाने पर । गुजारिश है तुझसे , बेबफाई का इल्जाम न देना । होगी कोई मजबूरी उनकी ... यह कह कर , अपने दिल को समझा लेना ।। ********* कोशिश बहुत की छुपाने की इश्क , मगर हमारी सूरत ,  हाल ऐ दिल बयाँ कर गयी । पल पल गुजर रहा है.....  वक्त अब हमारा , सालों के "हिसाब " दिन करीब न आए कभी वो , शबब बने जो जुदाई का ।। ******* इलज़ाम बेदर्दी का , न लगाव मुझ पर ।  हमने अक्सर , दर्द को ही पिया है। भीड़ बहुत थी जहां में मगर ,  हर पल हमने खुद को , तन्हां होकर कर ही जिया है । ******** मिला मुक्कदर , कुछ पल ही सही । मगर खुश रहने के लिए....... यह दौर  मुलाकात का  , काफी है हमारे लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुझसे क्या सिकवा करे , गर तुम रूठ भी जाओ तो ।

तुझसे क्या सिकवा करे , गर तुम रूठ भी जाओ तो । फख्र  ही करेंगे हम तुझ पर ।। कि वक्त थोड़े ही सही , मगर तुमने मोहब्बत  हम से की है । ले लेंगे इल्जाम, बेवफ़ाई का सर अपने । मोहब्बत में अक्सर कहां , वफा सब को मिला करती है । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी

मै आऊं आपके साथ....

 👧मै आऊं आपके साथ 👨हो यह मुमकिन गर , तो कयामत आ जाये । रोक लूंगा मैं हर वो तूफान जो हम दोनो के दरम्यान आ जाये । 👧क्या बात है 👨सब असर आपका है , वरना हम कहां , बुझते दीये की रोशनी की तरह । 👧गजब 👨मत दिलासा दिला , कह कर "गजब"  हम दिल जले है , हर कदम पूंक कर रखा करते है । 👧ओह 👨हैरान न हो , हम दिल में बहुत दर्द लिये हुए है । शिकवा हम तुम से क्यों करे , जहां इतने है वहां एक और सही । 👧उफ्फ़ 👨ऊफ न कर ! न परेशान हो , हम तेरे शहर से चले जायेंगे । हम तो मुसाफ़िर  है , जिनकी ना कोई मज़िल है । जहाँ सांझ ढले ,  वहाँ ठहर जाएंगे । 👧आज की रात खास  होगी  👨हर  रात का आलम , एक सा है हमारे  लिये । अखिर जख्म सहलाने का , मज़ा ही कुछ और है । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी 

देखे हैं हमने फना होते हुये ...

 देखे हैं हमने फना होते हुये ,  मोहब्बत में कई थे जो .... किरदार ए इश्क इस जहाँ  में । अपनी कहूं तो , मेरी मोहब्बत  अधुरी भी रही , और फना भी हुई । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी 

हाल ए गम , क्या बतायें हम ।

 हाल ए गम  , क्या बतायें हम । बड़ी  तब्दीली हो गयी है यार! अब , तेरे मयखाने में ।  बदले बदले है यहाँ , साखी और पैमाने भी । अब नही है इलाज़ कोई ,  मेरे इस दिल का , तेरे इस मयखाने में। तेरे लब ए जाम की , नही  कोई मिशाल  ऐ मेरे हुश्न ए दिल ! यह चित मेरा , तुझ पर ही बुझा है । तू गैर है.....! बहुत थक गया हूँ , खुद को यह समझाते-समझाते । मालूम है कि ,  तू हासिल नही है मुझे । ना जाने क्यूं उम्मीदों से लगा हूँ , तुझे पाने  में । डर  है कि कहीं यह ,  जनून ए  इश्क मेरा , कयामत न ला दे  । ले लो इज़ाजत अब तुम , मेरे दिल से निकल जाने की । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी 

रूपसी तू मेरी माया मोहनी , तू मेरी जुकूड़ि कु धक्ध्याट छैं ( गढ़वाली)

  रूपसी तू मेरी माया मोहनी ,   तू मेरी जुकूड़ि  कु धक्ध्याट छैं । लुकि  छुपीक  कीलें छैं , धै  लाणि तू । सैन्दीक औ दें म्यरा समाणि   , हे लठ्याली ! तू ही मेरी ,आन्खियों कु  रगर्याट छै ।  ✍️ज्योति  प्रसाद रतुड़ी 

जौंका जिकुडी का काख म थै हमु , कभि का दिनु ( गढ़वाली)

 जौंका जिकुडी का काख म थै हमु , कभि का दिनु  आज कुज्याणी किलै रूसायां छिन उ मुख मोडिक । अब नि औणन उ दिन हैंसदा खेल्दा सच्ची , कभी बोड़िक । बचपन कु सँग  साथ  छूटी  , छूटीन गौं  गूठ्यार  । ना  जाणि  कै देश , कै मुलूक छिन उ ,   ना जाणि कथगा छ उकाल ,  वख जाण कय्यिं  । अर  न जाणि कथगा छे, उन्ध्यार । ✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी 

तुम तो नहीं थे कभी , मेरे ख्वाब ओ ख्याल में

तुम तो नहीं  थे कभी , मेरे ख्वाब ओ ख्याल में । फिर भी ना जाने क्यों , मेरे इस दिल में । तेरे होने का एहसास , नज़र आता  है ।                    *** ऐ मेरे दिल के अरमान  , ऐ मेरी जान ए  गज़ल । मेरी अनबुझी सी , प्यास हो तुम । कैसे करार आये अब तेरे बिन ,  मेरे प्यार का , पहला एहसास तो तुम । ✍️ज्योति  प्रसाद  रतुड़ी 

कोई लज़बाव , जिसका कोई शानी नही ।

 कोई लज़बाव  , जिसका कोई शानी नही ।  मेरे दिल में दफन वो  सूरत , है मेरे यार की । करूं न तारीफ मैं क्यों न उसकी ,  वो है ही , काबिल ए तारीफ इतना । क्या गजब का आफताब है , उसके चेहरे का । कम वक्त यह नजर , उसके चेहरे पर से हटती ही नही ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरी तारीफ में इतने ही , अल्फाज काफी है ।

 मेरी तारीफ में इतने ही , अल्फाज काफी है ।  कि  दर्द का गुबार हूं । और न पूछना क्यों किस कर , कहीं फूट गया तो , मुश्किल होगी ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हटा दिया है पैमाना अब हमने , जितना जी चाहे तू पी ।

हटा  दिया है पैमाना अब हमने ,  जितना जी चाहे तू पी । बे-हिसाब पी.... मगर रहे ख्याल इतना कि  , कदम कभी तेरे , लड़खड़ाने न पाये । वर्ना होगी रुसवाई , मेरे मयखाने  की । ज्योति प्रसाद रतुड़ी........✍️