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न वो रातें ही रही अब , न वो ख्वाब ही ।

न वो रातें ही रही अब , न वो ख्वाब ही । सजाकर रखे थे जो कभी , हमने तेरे लिए । लूटी लूटी सी रह गयी है ,  जिंदगी आज , तेरे जाने के बाद । इल्म था न कभी के , इश्क में हुश्न । दगा बाज़ भी , होते है । मारे जो आहिस्ता आहिस्ता आशिक को , ये वो अंगूठी ए नगीना ए जहर होते है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अजीब तमासाई है लोग यहां , खुद की नुमाइश बेहिसाब , बड़े शौक से किया करते है ।

 अजीब तमासाई है लोग यहां ,  खुद की नुमाइश बेहिसाब , बड़े शौक से किया करते है । यह जुनून भी कमाल का है , खुद को दिखने दिखाने का । वाह ! वाह तो , कभी किसी के दिल से ,निकलती है हाय । सुन कर अपनी तारीफ में कसीदे , बहुत खुश हुआ करते है । मगरूर भी बना देती है , किसी को । भीड़ भी , चाहने वालों की । उन्हें फिर अपने सिवा ,और कुछ दिखाई देता नहीं । छोड़ो हमें क्या हम भी कह देते है ,  वाह ! बहुत खूब जैसे हर कोई , तारीफ किया करते है ।  अजीब तमासाई है लोग यहां ,  खुद की नुमाइश बेहिसाब , बड़े शौक से किया करते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इंटरनेट के आने से इस जमाने में , बहुत कुछ बदल गया ।

इंटरनेट के आने से इस जमाने में , बहुत कुछ बदल गया है । देखिए ना मेरे जैसा नालायक भी ,  कवि और  लेखक बन गया है । व्यस्त हैं , कुछ तो काटा छांटी , चिपका चिपकी में ।  दूसरों की अपनी बना कर , पेश ओ पेश में । अचंभित हैं , कुछ अपनी , किसी और के आंगन में खिलती देख । निराश है ,  कुछ स्वामित्व अपना , अपनी में हटता देख । रचना किसी की , अपनी  बन जाए । बड़ी चमत्कारी कला है ये  , जो किसी को आ जाए । मुश्किल नही कोई जो कवि और लेखक ,न बन जाये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

उफ़ ! नहीं चाहिए तुम हमें के , हमारे दिल में धड़को ।

 उफ़ ! नहीं चाहिए तुम हमें के , हमारे दिल में धड़को । मगर दिखो तो सही , भले चाहे आंख में खटको । अजीब सी सरसराहट होती है , इन आंखों में तुम्हें बिन देखे । आदत सी जो हो गयी है अब तुझे , हर बार देखने की । अब हर बार न सही तो , कम से कम ।  एक बार ही सही , दिख तो जाया करो । सुना है राह बदल दी है,  तुमने खुद की । चलो अच्छा किया मगर , कभी तो हमारी खातिर । इस तरफ से भी गुजर  जाया करो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

छोड़ों ऐ दिल कि , क्यों गम करें इस बात का ।

 छोड़ों भी ऐ दिल कि , क्यों गम करें इस बात का ।  के न मिला साथ उनका , जिन्हें चाह जी भरकर ।  यही रहा हो मुकद्दर में शायद , चंद मुलाकात ही बस ।  यही बहुत है के देख भी लिया  हमने , उन्हें कुछ नज़र । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

है तो सवाल कई मगर , चलो !उन्हें रहने देते है ।

है तो सवाल कई मगर , चलो !उन्हें रहने देते है । अभी तेरी इन कातिल निगाहों से हम ,  इश्क की रज़ा पूछ लेते है । 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸 तुम अपनी अदाओं पर , लगाम लगाओ । वरना कही हम, बेलगाम हो गए तो, मुश्किल होगी ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

महबूब बनके गम मेरा....

 मुझे दर्द से है इश्क भला , मैं क्यों दर्द को यूँ बदनाम करूँ । महबूब बनके गम मेरा , रहे साथ मेरे जख्म हरा हरा । मुझे दर्द से है इश्क भला.... रहे  उम्र भर वो खफा खफा , मेरे दर्द की वही इक दावा ।  आये न चैन तो क्या , बेकरार रहूँ तो क्या ।  क्यों करूं मैं जुस्तजू करार की , भला ।  मिले जो सकून , दिल ए बेकरार में । वो , दिल ए करार में है कहाँ ।  महबूब बनके गम मेरा , रहे साथ मेरे जख्म हरा हरा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम्हें मेल जोल बढ़ाना पसंद नही ।

 तुम्हें मेल जोल , बढ़ाना पसंद नही ।  तो हमें भी किसी को , परेशां करने का , कोई शौक नहीं। मुआफी के काबिल हो जो मैं ,  तेरी नज़र में तो , मुआफी दे दीजियेगा । वादा रहा आज से ,  न भेजेगे हम तुझे , पहगाम फिर कभी । अपने खुश मिज़ाजी , या रंज ओ गम  का । बहुत उदासी सी है , आज की रात । दिल बहुत दुखा है , काफी दिनों के बाद ।  कुछ तो दर्द में ,  इज़ाफ़ा तो हुआ है , शायद आज । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वर्तमान का एक क्षण , जो बनेगी कभी संस्मरण ।

 वर्तमान का ये एक क्षण , जो बनेगी कभी संस्मरण । भविष्य के लिए , 🎂सुंदर एक पल ।  सुकामना लिए मेरा मन ।  सदा यूँ ही रहे ,  साथ हमारा उम्र भर ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अपने नाम के ही , अनुरूप दिख रही हो शीतल ।

अपने नाम के ही , अनुरूप दिख रही हो शीतल । स्वभाव ही है ऐसा , जैसा दिख रही हो । या वैसा होने का , अभिनय कर रही हो । जो भी हो मिज़ाज़ों में , छाए खूब रहते हो ।  हाँ कभी गुम शूम सी , कभी खिली खिली सी ।  अक्सर खोई खोई सी तुम , न जाने क्यों रहती हो ।  बहुत मुश्किल होता है "दर्द" छुपाये मुस्कुराना ।  साफ छलकता है "दर्द" , तेरे चेहरे पर । जिसे तुम मुस्कुराकर , छुपा रही हो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुझसे पूछता है , जो कोई यह आजकल ।

मुझसे पूछता है , जो कोई यह आजकल । कैसे हो , क्या हो रहा है जी ,आजकल ? तो मेरा जबाब उनके , लिए रहता है यही । हाँ जी सब ठीक है , कुछ नही हो रहा है । बस दिन , पूरे हो रहे है बैठ बैठ कर ।  अक्ल भी  न जाने , कहाँ चली गयी । वो भी काम नही , कर रही है अब । आगे का रास्ता , कुछ सूझ नही रहा है अब । चलते जा रहे है , कदम दो कदम ।  हर दिन न जाने , कहाँ ले कर जाएंगे ये कदम । अनजान सी डगर , न जाने कौन सी मंज़िल । कब मिले सकुन का सफर , इन्जार है हर नज़र । भटकती मृग की तृष्णा , न जाने बुझे कब । मन की पिपासा शांत हो , न जाने कब । बस बैठे है , एक टकटकी सी देख रहे । कभी मायूस से है , कभी हँस रहे है  बे मन । बस हर दिन रात , चलता ही जा रहा है यह क्रम । न जाने कब ,कब थमेगा यह बवंडर । यह महाप्रलयकारी , ब्याधि भयंकर । भय की छवां में जी रहे है हर निरंतर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

हे भगवान क्यों...? क्यों तड़पा तड़पा कर , सता सता कर मार रहे हो ।

 हे भगवान क्यों...? क्यों तड़पा तड़पा कर , सता सता कर मार रहे हो ।  एक ही बार में पृथ्वी को , उलट-पलट कर दो । ना दर्द के लिए बचेगा कोई , न शिकायत के लिए । सब की जीवन लीला इक बार में ही समाप्त कर दो । ये सहमी सहमी सी जिंदगी , अब नही जी जाती । खुद के हाथों से भी , ये  मिटाई नही जाती । या जीने दे जी भर , या ले जा तुरंत । इस डर के माहौल में अब , किसी को किसी की बेबसी देखी नही जाती । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्यों न चाहूँ मैं , तुझे ऐ जिंदगी ।

क्यों न चाहूँ  मैं  , तुझे ऐ जिंदगी ।  आखिर इतने सालों तलक , तू ही तो वफ़ा से रही है । वो महब्बूब होगा तो सही , आखरी वक्त के बाद ।  उसके आने तलक तो ये साँसे , तेरे सहारे ही तो रही है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

घायल हुआ हूँ मैं , तेरे तीरे ए नज़र से ।

घायल हुआ हूँ मैं , तेरे तीरे  ए नज़र से ।  निगाहें है , तेरी मस्त कातिल ।  ऐ हुस्न तू ही बता , तुझमें है ये कैसा नशा ।  क्या तू शराब है , किसी मयखाने की ।  या है तू कोई , तिलस्मी शर्बत "शीतल"  । जो भी हो तुम , बहुत गज़ब की है ।  तेरी यह , मुस्कुराने की अदा । मंज़िल मिल ही जाएगी  , अगर तुम चाहो तो । आ चले मिलकर , आहिस्ता आहिस्ता ।  मोहब्बत की , इस अनजान डगर से । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

माना के हम नही सुमार उनमें , जो दिल ए ख्वाईश में है तेरे ।

माना के हम नही सुमार उनमें ,  जो दिल ए ख्वाईश में है तेरे । अनचाहे मन से ही सही मगर ,  कभी तो मुलाकात कीजिये । एक मुद्दत से तमन्ना थी दिल की ,  रहूँ बन्द मैं आगोश में तेरे ।  हो के न खफा मुझसे ,  न अनजान यूँ बना कीजिये । हो जाए ख्वाईश , इस दिल की  पूरी । अनचाहे मन से ही सही मगर , कभी तो ।  अपनी बाहों में हमें , भर लिया कीजिये ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

और क्या चाह था , हमने कुछ ऐसा ।

 और क्या चाह था , हमने कुछ ऐसा ।  जो वो , दे न सके । इक प्यार ही , तो था । जो चाह था , हमने प्यार के बदले । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जरूरी नही के हर मुस्कुराने वाला , दिल से मुस्कुरा रहा हो ।

 जरूरी नही के हर मुस्कुराने वाला , दिल से मुस्कुरा रहा हो । हो सकता है के , अपनों के दिए ज़ख्मों को । दुनिया से , छुपा रहा हो । नश्तर से चुभे शब्द , अपनों के दिल पर । फिर भी  महफ़िल में , शिरकत उसकी ।  ये न समझो के , तन्हां नही है वो ।  हो सकता है के वो , गमों से समझौता कर ।  दुनियां के सामने , रिश्ता निभा रहा हो । जरूरी नही हर मुस्कुराने वाला , दिल से मुस्कुरा रहा हो । हो सकता है के , अपनों के दिए ज़ख्मों को । दुनिया से , छुपा रहा हो । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

किताबों में धूल जमने से माना ,कहानियां नही बदला करती है ।

 किताबों में धूल जमने से माना ,  कहानियां नही बदला करती है । हाँ पढ़ना ही बंद कर दो , वो किताबें  ।  जिनकी कहानियां , दर्द का सबब , बना करती है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मुद्दतों से , हाँ मुद्दतों से ।

 मुद्दतों से , हाँ मुद्दतों से । आज , मुस्कुराया हूँ यार । सच ! दिल से , हाँ दिल से । खुलकर हँसा हूँ मैं आज , कई सालों  के बाद । रहना यूँ ही सदा तुम ,  अब मेरे इर्द गिर्द । दिल ए ज़ख्म , हो चले अब । "बे दर्द" कई मुद्दतों के बाद । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

देखी है , मुद्दतों से आज ।

 देखी है , मुद्दतों से आज । तस्वीर आपकी  यार !  लगा जैसे कि , तुम आयी हो । बनके मेरे मन का , चाँद । मेरे दिल पर , छाई हो आज । ली है आज , अंगड़ाईयाँ । मेरे अलसाये हुए , दिल ने । सिफर में था जो , अब तलक । चमका है वो आज ,  तेरे आफताब से , वर्षों के बाद । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

बचपन लौट आया है शायद आज ।

 बचपन लौट आया है शायद आज  । हाँ हाँ कुछ ऐसा ही , एहसास हुआ है मुझे । कुछ कुछ धुमला सा ,  वो दिन बचपन का , मुझे याद आया है आज । बहुत सुंदर था तब ,  खेल भी और मेल भी , दिलों से खेले जाते थे । दिल से  दिलों को , जीते जाते थे । कुट्टी कुट्टी अंगूठे को , दांतों से छटक कर कहना । पल  भर में रूठकर , कुछ दूर जाना । उसी पल अंगूठे को , मुख में गोल गोल घूमकर । अब्बा-अब्बा कहकर ,पास आना ।  उसे मनाना उसका मान जाना ,  उसी पल रोना , उसी पल हँसना । हँसते हँसते एक दूजे से , लिपट जाना । सब याद आया है आज , वो बचपन का जमाना । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्या बात शायर बन गये हो ?

 👧क्या बात शायर बन गये हो ? 👦यह सब तुम्हारी ही बदौलत है ,  जो लिख लेता हूँ थोड़ा बहुत । अगर तुम न आये होते जो ,  जीवन में मेरे ।  तो , ओ मेरी जान ए जाना ! यह , मुमकिन न था मेरा यूँ , उभर कर , निखर कर , इस जहाँ में , चमक जाना । 🤗🤗 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब तुम ही बताओ सखी !

अब तुम ही बताओ सखी !  तेरे सिवा और क्या माँगू ,  मैं रब से । जब मेरी चाहत में ही , सिर्फ तुम हो । कैसे भूल जाऊँ मैं तुम्हें ! दर्द में थमा जो हाथ , आपने । गम नही है अब , मुझे ।  जख्म ए दिल का ।  मेरे दर्द ए दिल की दवा , अब जो तुम हो ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

दिल को झंझोड़कर , रख देगा यह दृश्य ।

 दिल को झंझोड़कर ,  रख देगा यह दृश्य ।  मानवता कह लो , या इंसानियत । अब तो सब , लापता ही हो गयें है । मैं इससे आगे क्या कहूँ ,  रोना चाहूँ तो रो भी लूँ मगर । पागल ही समझा जाऊंगा मैं ,  क्योकि अश्क तो अब । आंखों से ही लापता हो गयें है । ना कंधा मिला एक भी , न स्पर्श । और कर दुराश से दफन , बे कफन ही   ले गए हैं । आज मानव मानवता से ही ,  बिमुख हो गए है । धर्म का अंतिम संस्कार अब ,  हर कोई कर गए है  ना मिले कांधे चार न किसी का स्पर्श ,  ले गए बिना कफन । हाय रे तेरी इंसानियत , हाय रे तेरा धर्म । कर गए मुझे क्यूँ यूँ , बेअदबी से दफन । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मगर हम...हम तो कभी न , जीते यारां !

हम...हम तो कभी न , जीते यारां !  जीत....जीत कहाँ हुई , नशीब में हमें कभी हासिल ।  हम.....हम तो दिल से दिल , हर दम हारे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आच्छादित है नभ श्याम पट से , चंद्र झांके लुक छुप ।

आच्छादित है नभ श्याम पट से , चंद्र झांके  लुक छुप ।  कभी व्योम के बाहर , कभी अंदर । दिशाओं में अंधकार गहन , एक तारा आशाओं का ध्रुव ।  उत्तर का भान , रमणीय सुंदर । इक टक टकी सी लगी , धुंधला सा हुआ आंखों में कुछ । कब भोर हुई होश नही , खोया रहा न जाने कहाँ मेरा अंतर्मन । तेज दिनकर की तपिस , पड़ी जब मेरे चर्म पर । आभास हुआ भोर होने का तब , जगा  कुछ हल्का सा मेरा मन । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वो जो ख्वाबों में देखता हूँ मैं तुझे के , तुम मेरे हो सखी ।

 वो जो ख्वाबों में देखता हूँ मैं तुझे के ,  तुम मेरे हो सखी । काश वो हक़ीकत होता तो , अच्छा होता । मुद्दतों से चाह है तुम्हें काश ,मेरी चाहतों का सिला । हासिल मुझे तुम होते , तो अच्छा होता । ना गुजरती तन्हां मेरी ये रातें , न बेकरार ये दिल का बेचैन दिन होता । होती तुमसे हर रोज मुलाकातें , तो अच्छा होता । पतझड़ सा हो गया है , मेरे दिल का चमन । बहारों ने भी , अब आना छोड़ दिया ।  आ जाती बहारें शायद तेरे आने पर , तुम दिल मे फिर आ जाते तो अच्छा होता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

उसके मौन में भी छुपी है , कोई विनाश लीला इंतज़ार करो ।

 उसके मौन में भी छुपी है , कोई विनाश लीला इंतज़ार करो । इंतज़ार करो  उस समय का , जो बनकर महाप्रलयकारी ।  फूटेगी खामोशी की धरा से , एक भयंकर ज्वालामुखी । टूटेगा मौन वो प्रचंड लहरों से ,ज्वार भाटा का निर्माण होकर । मचेगा हाहाकार चाहूँ दिशाओं में , चुन चुन कर लेगा हर एक सनातनी , प्रतिशोध अपना ।  सह रहा है जो अत्याचार वो  अभी तक  मौन होकर ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न जाने वो शाम कब आएगी ।

 न जाने वो शाम कब आएगी । कहा था कभी तुमने के मैं , शाम को फोन करूंगी  । तब से हर शाम ,मोबाइल को सज़ा धज़ा कर । बैटरी फूल , चार्ज करवा कर । इयरफोन को , मोबाइल में कनेक्ट कर मैं ।  कानों में चिपका कर हर शाम । बस तेरा ही फोन का इंतज़ार , किया करता हूँ । न जाने वो शाम कब आये , आये भी या न आये ।  बस यही अंजमस में ही , पड़ा रहता हूँ । ☹️☹️☹️ ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वाह क्या बात कही है तुमने कि हम , तेरे कायल हो गए है ।

वाह क्या बात कही है तुमने कि हम ,  तेरे कायल हो गए है । जब से सुना है कि ,  हकीम तुम हो , दिल ए मर्ज का । यहां इस , दर्द ए महफ़िल में , एक मैं ही नही बल्कि ,  दिल यहां हज़ारों के, घायल हो गए है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

लाख सोचता हूँ मस्त रहूँ , और रहता भी हूँ मैं मस्त ।

 लाख सोचता हूँ मस्त रहूँ  ,   और रहता भी हूँ मैं मस्त । मगर कुछ देर तलक  , फिर  !  फिर एक अजीब ख्याल ,  बेचैन कर देता है , मेरे दिल को । मन ...मन की चंचलता ,  हदें  पार कर जाती है । कभी कभी हाँ , कभी कभी ।  बेहदी इतनी बढ़ जाती है कि ,   टूट कर बिखर जाता हूँ मैं । टूट कर हाँ !  टूट कर , बिखर जाता हूँ मैं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दुखा होगा दिल किसी का भी , शायद मेरी ही तरह ।

 दुखा होगा दिल किसी का भी , शायद मेरी ही तरह । काटी होगी जब उसने भी , इंतज़ार में कई कई रातें मेरी ही तरह । " दर्द " अपना ही लगता है , जियादा मगर । वो भी फूँक रहा होगा ज़ख्म अपना , तुझे कहाँ  आता है नज़र । खुद गरज भी ये क्या के , गम जियादा तू ही है बहुत ।  अरे ज़रा कुछ देर और तो , ठहर जाते पास हमारे । हम अपना गम ए दरिया ,  तुम्हें देखते  ।  जो दफन है , दिल में हमारे ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कर ले खुद को मज़बूत ऐ दिल के , वो साथी चलते सफर का था ।

 कर ले खुद को मज़बूत ऐ दिल के ,  वो साथी चलते सफर का था ।  ऐ दिल चंद मुलाकात उनसे , तेरी क्या हुई ।   तू तो यूँ ही उन्हें अपना हमसफ़र  , समझ बैठा ।   वो वक्त गुजारते रहे ,  तुम खुद को , उनके  लिए हारते रहे ।  तुम तो डूबे रहे , जज्बातों के गहरे समंदर में ।   तुम्हें मालूम ही न हुआ , कब मुकाम आया उनका ।  और ! कब वो सफर में तुम्हें , अकेले छोड़ गए ।  अब न करना यकीं दिल ,  किसी और पर आगे के सफर में ।   चलना साथ मगर , रहना एहसासों में अकेले । बड़े बे रहम है लोग यहां , दिल बहलाकर अपना । सफर में अकेला , छोड़ चले जाते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरी ख़ामोशी पर न जाना तुम ।

 मेरी ख़ामोशी पर न जाना तुम ।  हर ठोकरों का हिसाब ,  हमने दफन , अपनी जुबाँ पर रखा है । खुल जाए जो तो ,  सैलाब आ जाएगा , कयामत का । हमने हर कयामत को अभी तक ,  सीने में दबाए रखा है । उम्र ढल गयी तो क्या ? उम्र ढल गयी तो क्या , साखिये ! हुश्न का प्याला पी जाए अब भी ,  आशिकी मेरी ।  हुनर इश्क का हमने ,  अब भी अपना , सलामत रखा है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

हमने कब तुम्हें टोका है , तुम्हें दिल में आने से कब हमने रोका है ।

 हमने कब तुम्हें  टोका है , तुम्हें दिल में आने से कब हमने रोका है ।  जब जी चाहे चले आओ , रुको ठहरो ।  यह तो सराय है दिल मेरा , कई आये और ठहर कर चले गए । इश्क प्यार मोहब्बत , चंद दिनों की ही अदा है जी भर जाने तलक । फिर तो ब-दस्तूर ही मुलाकात का , सिलसिला ही रहता है जीते तलक । अनजान सा , दिखने लगता है फिर वो ।  जिसके लिए तरसती थी , देखने को ये निगाहें । तरस जाता है तब उस को आगोश में ,लेने को ये बाहें । अब तलक हर कोई आके , मेरे दिल से यूँ ही खेला है । एक तू और खेल जाए तो , फर्क क्या ? कुछ भी तो नही । मेरे इस दिल को अब तो , आदत सी हो गई है  खिलौना बन जाने की । तू एक और खेल जाए , दिल से मेरे तो फर्क क्या ?  कुछ भी तो नहीं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

आज कहाँ रह गए है सच्चे रिश्ते ।

आज कहाँ रह गए है , सच्चे रिश्ते ।  शायद किताबों में अक्षर , बनकर । सच्चा कौन है ?  शायद हो तो , फिर ऐसा क्यों है ? अपने रूबरू है ,  फिर बेगानों की , ख्वाईश क्यों है ? रह गए सच्चे रिश्ते अब,  बस कल्पनाओं में ही ।  कभी  पास है , तो कभी दूर है । खामोशी की ,अगर इक नज़र है  ।  तो सकुन है ।  वरना  , कलह-क्लेश उम्र भर है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

हर पकवान हर व्यंजन व्यर्थ जी नही है तू ऐ "सूरा"

हर पकवान हर व्यंजन व्यर्थ , जो नही है तू ऐ "सुरा" तुझ बिन मेहमानदारी अधूरी , हर उत्सव हर्ष का है अधूरा । बस इक तू हो जाए "सूरा", चाट ले नमक अकेला ।  भाई मज़ा आ गया है , आव भक्ति खूब हुई है । लोटों-घड़ों से हम सबने , भर भर कर "सूरा" खूब पी है । यादगार रहेगा दिन ये ,  फलाना की शादी का । मज़े में रत्ती भर  की , कोई कमी नही रही है । बस थोड़ा सा ज्यादा हो गयी है , वरना नाच में मेरा कोई जबाब नही है । 😂😂 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

नादान सा हूँ मगर , ना समझ नही ।

 नादान सा हूँ  मगर , ना समझ नही । तेरी हर बातों का, मतलब । मैं , बखूबी जनता हूँ । वो तो अदा थी मेरी , ना समझ । तुम्हें क्या लगा था कि , हम ।  इशारा तेरा , समझ न सके । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अजीव है ना , जो रिश्ते कभी बने ही नही । मन उसी को न जाने क्यों , याद करता है ।

अजीव है ना , जो रिश्ते कभी बने ही नही । मन उसी रिश्ते को , न जाने क्यों याद करता है ।  मालूम नही क्या है , दिल की ख्वाईश  दिल ही जाने ।  मगर इन आंखों की चाहत में , उसका दीदार और बाकी है । बाकी है अभी , लवों का मिलना । उनकी आगोश में मेरा मिलना , अभी और बाकी है । हाँ हुई थी चंद मुलाकात , धड़कनों के शोर में ।  हुई क्या बात , दिल ही  जाने ।  अभी तो उनकी मेरी , मुलाकात और बाकी है । अजीव है ना , जो रिश्ते कभी बने ही नही । मन उसी को न जाने क्यों , याद करता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

समझ में कुछु नहि आता रे , भगवन !

 समझ में कुछु नहि आता रे , भगवन !  ये का , तेरी लीला है ।  सुना तो नही था , पहले मुख से तेरे । न कभी तूने हमको , इस बात का भान कराया ।  के प्रलय का भी यह , कोई स्वरूप होगा । यह कैसा है प्रलय भयंकर , अब कब तू  । मच्छली वाली , नाव बनेगा । अब के  “सप्तर्षि“ को बचाने हेतु भगवन ! कौन मनु , अब पैदा होगा । काल बना विज्ञान आज , धूमिल हुई है ज्ञान की पाटी । बचने की कोई राह न सूझे , काल बना आज ।  मानव का , मानव की ही जाति । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मन पसंद का पहली बार ...

 मन पसंद का पहली बार ,  शायद तुझे ही हमने पाया है । वरना बहुत मिले थे यहां ,  दिल वाले मगर । ये दिल हमारा , तुम्हीं पर आया है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सब कुछ तो , लूट लिया था ।

 सब कुछ तो , लूट लिया था ।  इस बेदर्द जमाने ने , हमसे ।  इक दिल ही तो था , पास मेरे ।  वो भी तुम , ले गये हमसे । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कैसे है आप ? बस इतना बता दीजिएगा ।

 कैसे है आप ? बस इतना बता दीजिएगा । भले फिर न हमसे , बातें कीजियेगा । लग जाती है फिक्र , बेवजह न जाने क्यों ? शायद बेवजह की , भी कोई बजह हो । हम ऐसे ही है , पहले किसी से जुड़ते ही नही है । यदि जुड़ गए तो उन्हें , दिल मे बिठा लेते है । चाहे कोई फिर मुड़ कर , भले हाल पूछे न दोबारा । मगर हम हर हाल में , उनके ही फिक्र में खोए रहते है । यही फितरत है मेरी , जो हमसे बदली नही जाती । चल गए जो कोई , दिल से दो कदम साथ । उसकी याद दिल से , कभी नही जाती । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

खुद बिसरियाळी मीन , तेरी याक झलक , जु दिखी मीन । गढ़वाली

 खुद बिसरियाळी मीन , तेरी याक झलक , जु दिखी मीन । बरसू बटी समाळ्याँ थाँ जु आँसू ,  सी आज पलकुं म , टबळॉण लगीन । कभी खूटियों म पराज़ , कभी गौळा म बाडूली । त्यारा नौ ली ' क , थम सी जाँदी हे गैल्याणी । गैल्याणी रे ! तू किलै नी , ऑन्दी  रे मायली इं बयार म । छळकणुँ छ प्यार हाँ । २ ऐजा रे ! ,  ऐजा रे , हे भाग्यानी !  माया म , हमू द्वी रोळी जौंला । लुपटेक हम द्वी , प्यार अपणु अमर करि जौंला । ऐजा दौं रे , हे भाग्यनि ! माया  म , हमू द्वी रोळी जौला । प्यार हम अपणु , अमर करि जौला । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

समझ गया हूँ मैं ऐ दोस्त ! जख्म बहुत दिए है , तुझे भी जमाने ने ।

समझ गया हूँ मैं ऐ दोस्त ! जख्म बहुत दिए है , तुझे भी जमाने ने  । एक सा मुकद्दर है तेरा मेरा शायद , हॉ कुछ अलग सी बात है तेरे मेरे अफसाने में । अपनों ने सताया है तुझे भी , और मुझे भी ।  फर्क सिर्फ इरना है कि , इक सकून की खातिर । हमने समझौतों में कई बर्ष गुजार दिए , रोते सिसकते । और  तुमने रिश्ते छोड़ दिये जुल्म ओ सितम सहते सहते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अच्छा आ गईं है क्या पलकों पर , या दूर है कुछ अभी ।

अच्छा आ गईं है क्या पलकों पर निंदिया , या दूर है कुछ अभी ।  तो कहें कुछ जरा सा , ठहर जाओ तो । हूई नही है जी भर के , मुलाकात अभी । हो जाएगी दिल से दिल की बात , जो कर सको तो । ठहरो तो ! जो न आई हो , पलकों पे वो शबनमी सी बरसात । कुछ ढूंढ ले हम भी इन आँखों में , खुद की खातिर । बस इक तेरी इज़ाजत की है , बात जो दे सको तो । इश्क भी नही है हमें तुमसे ,  मगर जी भी तो , तेरे बिन नही लगता । एक अनबुझी सी प्यास है , इस दिल की । बुझ जाएगी ये प्यास , जो तुम चाहो तो ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ना जाने कब तलक ,ताकना होगा इन टूटे हुए झरोखों से ।

ये बेबसी मेरी उफ्फ , इक इंतज़ार की । ना जाने कब तलक ,  ताकना होगा इन टूटे हुए झरोखों से । मुझरायी काया धुंधली नज़र ,  कंपकंपाते हाथों ने मेरे । अरदास में अब , बस तुझ से यही मांगा है । आ मौत के अब नही होता , इंतज़ार और तेरा । बहुत जी लिया हूँ , घुट घुट कर अब मैं ।  ऐ खुदा तेरे , इस जहां में । अब भेज भी दे तू , कोई फरिश्ता मेरी मौत का । ताकि मैं सकूँन से , अब सो सकूँ । फिर कभी न जागूँ मैं , तेरे इस जहां में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वह कौन मिली है तुम्हें , मुझे भी बताओ ?

 👧वह कौन मिली है तुम्हें ,  मुझे भी बताओ ? जो बनी है राज़ ए खुश मिज़ाजी का ,  तेरे चेहरे की वो नूर । ये किसके होने से  दमका है ,  तेरा दिल का आंगन । ज़रा , हमें भी समझाओ । 👦वो तुम , उसे जानते हो 😘 👧मैं भला कैसे जानू ?  जरा हमें तो समझाओ । 👦वो तुम ही तो हो । 👧नहीं😱😱ये नहीं हो सकता । 👦हो चुका है अब , 😘 धीरे धीरे तुम , न जाने कब । मेरे दिल में , समा गयी हो । ना हमें मालूम हुआ , ना तुम्हें ही मालूम हुआ । कब जाके तुम मेरे  दिल ए हाकिम हो गए हो ।  कसम से तुम्हारे ही ,नाम से ।  मेरे बीमार ए दिल को , आराम आ जाता है । न करो यकीन मगर , यह हकीकत है । तुम ही दवा हो मेरी , बेचैन मन की । तुम ही तो ठंडी उबटन हो मेरे , जलते हूए बदन की । तुम ही तो अब सिफ़ा हो ,  मेरे हर ज़ख्म का । लौटा है तुमसे ही नूर , मेरे बुझते हुए चेहरे का । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ कुछ मुझे आज हो रहा है , यह एहसास के ।

कुछ कुछ मुझे  आज हो रहा है , यह एहसास के ।  कोई अनजान लगा रहा हो मरहम , मेरे जख्म ए दिल पर । एक मीठा मीठा सा सकुन , मिल रहा है आज पहली बार ।  होती है मोहब्बत , ऐसी सकुन भरी । यह जाना है आज , तुमसे मिलने के बाद । 😘😘😘 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब तो वो बहुत दूर जा , चुके होंगें ।

▪️अब तो वो बहुत दूर जा , चुके होंगें ।  आशाओं की जो थी , इक किरन ।  शायद नज़रों से भी , तेरी ओझल । ओंस से भी अब , बुझे प्यास कैसे । दिनकर भी अब , पूरब से झाँक रहा है । सुलगती देह तड़पता मन ,  विरह की अग्नि में झुलस रहा है । ▪️आते आते सावन मेरा ,  क्यों चला गया बिन बरसे । आ जा पिया लौट के  आ जा ,  बन बदरा मोहे पे बरस जा । मैं आलिंगन को तोसे पिया ,  मन मोरा तेरे प्रेम को तरसे ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी