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नव जीवन सृजनहार हुआ ।

नव जीवन सृजनहार हुआ ।  तुमसे हमें प्यार हुआ ।  मुस्कुराहट हो अब तुम , मेरे जीवन की । मेरे स्वप्नों का संसार , तुमसे ही साकार हुआ ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

हम भी आपके ही राह के मुसाफिर है ।

हम भी आपके ही राह के मुसाफिर है । कुछ तो असर मुझमे भी हुआ आपका ।। चल लेंगे कदम दो-चार और साथ आपके तो । वाह ! फिर तो अलग ही  कुछ और नज़ारे है ।। यह चुम्मा😘 उन्हें ही देते है हम , शब्बा ख़ैर का । जो हमें अपनी ज्यान से भी ज्यादा प्यारे है ।। 😘😘 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

हर वो राह अपनी ही भली लगती है ,

हर वो राह अपनी ही भली लगती है , बाल-काल बीता हो जहाँ । उबड़ खाबड़ , पथरीले टेढ़े मेढ़े ,  भले हो वो राह मरु-कंटीले । हर वो अपना पनघट सूंदर लगता है । बुझी हो प्यास जहां बचपन की नदी तालाब कुआँ पोखर , पहाड़ पर्वत के वो शीतल झरने । हर वो गलियां भली लगती है ,  नन्हे पग चले हो जहां । इठलाते , मचलाते , मस्ती में झूमते गाते , भले हो वो गलियों वो नुक्कड़ पत्थरीले । अपना ही गाँव या शहर भला लगता है । जिसकी की गोद में पले बड़े हुए , माँ बाबा दादा दादी , भाई बहनों के संग । याद बहुत आता है अपना वो ,  छोटा सा प्यारा सा घर आंगन।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ख़यालों में ही , गुजर कर ली हमने

 ख़यालों में ही , गुजर कर ली हमने  "तमाम उम्र"  कुछ ही बाकी है । अब आ भी जाओ रूबरू करदें , इक बार  दिल को । "रस्म ए दीदार"  अभी बाकी है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बवंडर बनकर उठ , काल महाकाल सा बन ।

 बवंडर बनकर उठ , काल महाकाल सा बन ।  न अलसा खुद को , अपनी पहचान के लिए उठ ।  बवंडर बनकर उठ , काल महाकाल सा बन । झांसी की रानी का अनुसरण , हर नारी कर ।  ललकार भर संहार कर , दुष्टों को ललकार कर । भवानी तू ही दुर्गा तू ही , खड्ग खप्पर वाली सी बन ।  बवंडर बनकर उठ , काल महाकाल सा बन । हुआ बहुत सहन अब , अपने जहन में यह बात भर ।  प्रतिकार कर , वरन मिटा देंगे वो अतित्व तेरा । बन तूफान कर प्रलय , दुष्टों का समूल विनाश कर । उनका अन्याय का प्रतिशोध कर , जगा तूफान दबा है  जो सीने में । ज्वार -भाटा सा उठ , स्थिर समुद्र न बन । 🚩जय श्री राम🚩 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सिमटी हुई ये घड़ियां । ना जाने क्या..........कर जाए ।

सिमटी हुई ये घड़ियां । ना जाने क्या..........कर जाए । वो हमें याद आएं और यादों में । न जाने क्या...........कर जाए । सिमटी हुई ये घड़ियां । ना जाने...........क्या कर जाए । वो आएं क्या ख्वाब बनकर , क्या हम । आंखे बंद........कर जाएं । सिमटी हुई ये घड़ियां । ना जाने.........क्या कर जाए । दिल में है क्या हमारे , ये उन्हें हम । अब......... कैसे बताएं । हुए थे जुदा हम , सकून ए दिल की खातिर । मिला दर्द और जियादा , दर्द वो अपना । हम उन्हें अब.........कैसे बताएं । सिमटी हुई ये घड़ियां । ना जाने.............क्या कर जाए । हाय ये रात का सूनापन , ये दिल की खामोशियाँ । उनका ख्याल , और ये । अश्कों की............बहती  धाराएं । कैसे हम , किसी से अब । अपना.............गम छिपाएं । सिमटी हुई ये घड़ियां । ना जाने.............क्या कर जाए । वो आएं क्या ख्वाब बनकर , क्या हम । आंखे बंद.......कर जाएं  । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।  

मेरे भाव का अर्थ समझने की कोशिश करना ।

 मेरे भाव का अर्थ , समझने की कोशिश करना ।  बेबाक़ होकर न कुछ कहना ।। कुँवारे थे जब हम ,  किसी अजनबी को देखकर । आकर्षण हुआ ।।   दिल में कुछ उमंग कुछ तरंग सी , इक लहर सी छाई थी । सच मानो , मोहब्बत से बेखबर थे हम ।  मालूम नही किसे कहते है "इश्क"  हाँ चाहत के दीवाने थे हम । बंद गए थे परिणय के ,  मधुर सूत्र बंधन में हम । मालूम हुआ है के अब , शायद वही रहा होगा "इश्क"  और मोहब्बत अब ।   अब भी उनका , रुख ए रौशन गज़ब ढाह रहा है । इक अज़ीब सी कशिश है , अब भी उन में । शादीशुदा उम्र दराज़ हैं हम तो , क्या हुआ । "प्यार" अब भी हमारा , गजब ढाह रहा है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

अरमान दफ़न कर दिए तुमने मेरे , मुक्तसर तो रुके गए होते .

अरमान दफ़न कर दिए तुमने मेरे , मुक्तसर तो रुक गए होते . हमें आने में वक्त लगा , इतनी जल्दी भी क्या थी जाने की  . हम आ तो गए थे , थोड़ा सा और रुक गए होते . मैं दीवानी सी वर्षों फिरती रही , तेरे महल ओ  चौबारों पर . इतनी बेरुखी भी क्या थी , कम से कम वसीयत तो मेरे नाम कर गए होते . 😛😛😛 #मतलबी_यार  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

तुम आ जाना मेरे शहर , मत घबराना ।

तुम आ  जाना मेरे शहर , मत घबराना ।  मैं तुझे मिलूंगा नही , रहूंगा मैं अनजाना । कब आओगे तुम बस , ये जरूर बता  जाना । मैं दिल को , अपने समझा लूँगा । तरस गयी है ये आंखे , तुम्हें देखने को । आ जाए करार वर्षों बाद , मेरी इन आंखों को । न करीब आऊंगा दूर से ही , तुझे देखकर चला जाऊंगा । मेरे दिल की फिक्र न कर , दिल को मैं समझा लूँगा । कब आओगे तुम बस , ये जरूर बता जाना । न खबर होगी किसी को भी , मेरे आने की । बेख़बर मैं तुम्हें भी , कर जाऊंगा । तुम आ  जाना मेरे शहर , मत घबराना ।  मैं तुझे मिलूंगा नही , रहूंगा मैं अनजाना । "तुम याद बहुत आती हो"  होगी गुज़र जिस राह पर तेरी ,  उस राह के मोड़ पर । अपने दिल के निशाँ छोड़ जाऊंगा । तुम आ  जाना मेरे शहर , मत घबराना ।  मैं तुझे मिलूंगा नही , रहूंगा मैं अनजाना । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

गम ए समंदर तैर कर , पार कर तो लूँ मगर ।

 गम ए समंदर तैर कर , पार कर तो लूँ मगर । अगर मिले साहिल , मुझे तेरे प्यार का । जब तक न सहराओगे तुम हमें ,  हम यूँ ही गम ए सफर करते जाएंगे । कभी तो मिलेगा हमें किनारा तेरी मोहब्बत का ।  नही उतरेंगे किसी और किनारे पर , तेरे सिवा । नही जचता साहिल कोई और हमें , मोहब्बत का । होगा पाना मुश्किल तुम्हें तो मझधार में ही ,  डूब कर मर जाएंगे है । गम ए समंदर तैर कर , पार कर तो लूँ मगर । अगर मिले साहिल , मुझे तेरे प्यार का ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

माना नहीं है अब । हमारे बीच मोहब्बत में.......ये सब ।

 माना नहीं है अब । हमारे बीच मोहब्बत में.......ये सब । एहसास  गम ओ खुशी का वो अपनापन ,  वो शिकायतें , रूठना माना , दिल की बेकरारी  । तो फिर क्यों मेरे ख़यालों में रहती है ....वो अब । कहीं दिल के किसी कोने में , कोई चिंगारी मोहब्बत की दबी तो नही । न न ऐसा तो नही , तो फिर क्यों ? इंतज़ार रहता है , के दिखे वो इक नज़र....कहीं । क्यों ख्वाबों में रहती है वो मेरे अब भी , बनकर मेरी मोहब्बत । हाँ यह दिल उन्हें अभी शायद ......भूला नहीं । कहाँ आसान होता है भूल जाना किसी को , जो रोम रोम में बसा हो । जुदा हो गयी है राहें , अब हमारी ।  उनकी वो जाने ।   मगर मैं उन्हें अभी तक.......भूला नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

नशीब में जिसके जो लिखा था ।

 नशीब में जिसके जो लिखा था । वो तकदीर में उसे मिल गया ।। चाहत में थे जो इस दिल के । वो नशीब में , किसी और के हो गया ।।    चाहत न हासिल हो सकी , दिल की कोई । यूँ ही मन का लगाना , रह गया ।। उनकी चाहत में था जो , वो उनको मिल गया । ये दिल मेरा उनका यूँ ही, दीवाना बनकर रह गया ।।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इक ख्वाब देखा था के , बने नाशिबों में मेरे आप ।

 इक ख्वाब देखा था के , बने नाशिबों में मेरे आप । लो बन गयी तकदीर के , मिल गए हो जो आप । एक ख्वाब देखा था के , मेरे गुलज़ार में महके गुल , कोई आप सा । मेरे दिल के चमन में , अब तलक । न कोई गुल महका , आपसा । खुश नसीबी , नही तो और क्या है  ? जो मेरे दिल ए गुल , बन गए हो आप ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मत पूछो कल रात , तमाशा कुछ ऐसा हो गया ।

मत पूछो कल रात , तमाशा कुछ ऐसा हो गया । मैं जल्दी रात , आठ बजे ही सो गया ।। मां-बाबू जी को कुछ , समझ ना आया । आनन फानन , पड़ोसियों को भी बुलाया ।। देखो देखो लल्ला को , यह क्या हो गया । लगता है बेटा हमारा , कोमा में हो गया ।। ये तो दो-तीन बजे , रात तक जागता था । आज लल्ला हमारा , जल्दी कैसे सो गया ।। अम्मा के  आंसू रोके न रुके ,  रो रो कर बुरा हाल हो गया । मैं न जाने कैसे इतनी , गहरी नींद में सो गया । बाबू जी ने जोर का मारा चांटा ,  "उठ बे कुंभकर्ण" मैं उठा घबराया हुआ ,देखा तो । गाल मेरा , लाल हो गया ।। फिर प्यार से तब , अम्मा बोली । लल्ला ये तुम्हें आज , क्या हो गया ।। ए री अम्मा करता क्या , सोता ही , मेरा जब डाटा पैक ही , खत्म हो गया । मत पूछो कल रात , तमाशा कुछ ऐसा हो गया ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आसमां छूने की , चाहत नही हमें ।

आसमां छूने की , चाहत नही हमें । मोहब्बत में , बस रहूँ तेरे दिल❤️ में । गम ओ खुशी में , यही काफी है  मेरे लिए । तुम संग हो तो ,मुझे क्या कमी है ।  गम क्या है ? अब कुछ भी तो नही है  । आसमां छूने की , चाहत नही हमें । मोहब्बत में , बस रहूँ तेरे दिल❤️ में । गम ओ खुशी में , यही काफी है  मेरे लिए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यूँ ही रहना बनकर मुस्कुराहट मेरी ।

यूँ ही रहना बनकर मुस्कुराहट मेरी ,  रहना तू सदा जीवन में मेरे । तेरी चाहत ने मुझे , मुस्कुराना सीखा दिया ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

बस इक हवा का झौंका सा , आना ये तेरा ।

बस इक हवा का झौंका सा , आना ये तेरा । झंझोड़ कर मेरे दिल की , बगिया को । जिसमें है , लाखों अरमान दफन । उनको जगा कर , जाना तेरा । न जाने कब होगा वो पल , फुर्सत का तेरा ।  जब मेरे साथ होगा , ठहर जाना तेरा ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अभी भरा भी नही , ज़ख्म ए दिल ।

अभी भरा भी नही ,  ज़ख्म ए दिल । मोहब्बत की हसरत , न जाने क्यों  ये दिल , फिर किये जा रहा है ? उम्मीद में है , अब भी के वो । सहरायेगी इसे इक दिन ।। इसी इंतज़ार में , दर्द पी कर अपना । अब भी जिये जा रहा है ।। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल से दिल मिले जब जहां , दोस्ती पक्की है वहाँ ।

 दिल से दिल मिले जब जहां ,  दोस्ती पक्की है वहाँ । विश्वास की डोर से , बंधे हो जो दामन । नही टूटते वो रिश्ते कभी वहाँ । *** जीने की राह ,  खोज ली है अब मैंने ।  राह में फूल तो नही , मगर कांटे बे-सुमार है । ****** हम अपने उसूल न छोड़ सके । तुम अपने ज़िद्द न छोड़ सके । रहे अपने ही गरूर में हम , इक दूजे से दूर होते चले गए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरी रोती हुई नज़्म ओ ग़ज़ल भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ।

मेरी रोती हुई नज़्म ओ ग़ज़ल भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ? दिल से निकलते ही नही कोई और  ज़ज़्बात , न  ख़यालात सिवा गम के । मेरे गमशुदा दिल के एहसास भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ? मेरी रोती हुई नज़्म ओ ग़ज़ल भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ?  लिखती है कलम दिल की ही , जो महसूस करती है जमाने में । कुछ आपबीती कुछ किसी के गम की , करती है बयाँ हाल ए गम , मेरी नज़्म वो ग़ज़ल ।  मेरी रोती हुई नज़्म ओ ग़ज़ल भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ? लुटे हो दिल के आशियानों से चैन जिनके ,जो दर्द की आगोश में खुद को समेटे हुए हो । अश्कों के निशां बयाँ करती हो , गम ए दास्ताँ जिनके रुख्सारों पर । लिखेगा कैसे दिल भला , नगमा कोई खुशी का । अपनी लुटती हुई , बहारों पर । मेरे गमशुदा दिल के एहसास भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ? मेरी रोती हुई नज़्म ओ ग़ज़ल भला , क्या तुम्हें पसंद आएगी ? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

ऐ जिंदगी ! बना हूँ, मैं तेरा दीवाना ।

ऐ जिंदगी ! बना हूँ, मैं तेरा दीवाना । देखती भी नही , तू इधर इक नज़र । बस चलती ही , जा रही है । कभी खामोश सी और , कभी मुस्कुरा रही है ।  जरा ठहर , आ पास बैठ । कुछ तू अपनी कह , कुछ हम अपनी सुनाए । आ चलो कही दूर , इक दूजे में खो जाएं ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दर्द का एहसास बिना चोट खाये , काश हो जाए ।

दर्द का एहसास बिना चोट खाये ,  काश हो जाए । तो मुमकिन है कि बिना इश्क किये ,  हर कोई शायर हो जाए । मोहब्बत का एहसास बिना चाहत के ,  काश हो जाए । तो मुमकिन है कि बिना इश्क किये ,  हर कोई शायर हो जाए । तसव्वुर के बिना ,  काश जो ख्याल आ जाए । तो मुमकिन है कि बिना इश्क किये ,  हर कोई शयार हो जाए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

जख्मों से सुलह कर ली अब , दर्द ए एहसास तो नही ।

जख्मों से सुलह कर ली अब ,  दर्द ए एहसास तो नही । हाँ कभी कभी कुरेद कर ,  देख लेता हूँ । ज़ख्म ए दिल ,  कही ये उन्हें भूला तो नही । रश्क क्यों हो अब मुझे , उनकी महफ़िल से । बड़ी मदहोश है अब ,  मेरी तन्हाई भी । दिल ए फिरदौस में अब ,  बहारें न सही । गुजर अभी भी है ,  उस तरफ ।  हवाओं का आना अभी , रुका तो नही ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

लुटी लुटी सी हूँ आज , ऐ इश्क ! काश तू न होता ।

लुटी लुटी सी हूँ आज , ऐ इश्क ! काश तू न होता । बड़ी मस्त उड़ान थी मेरे दिल की , ख्वाबों के "शहर" । थकी थकी सी हूँ आज , ऐ इश्क ! काश तू न होता । हसरत लिए रखे थे कदम , शहर ए मोहब्बत में । न मोहब्बत ही हासिल हुई , न दिल की आरज़ू ही । रुके रुके से है आज कदम , ऐ इश्क ! काश तू न होता । गम साहिल जो बना मेरा , एहसास ए दर्द ही अब । आती है जब यादों में , वो तेरी फरेबी नज़र । झुकी झुकी सी है आज नज़र , ऐ इश्क काश तू न होता । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

एक बेरोजगार मैं भी हूँ साहब !

एक बेरोजगार मैं भी  हूँ साहब ! सात महीने से खाली हूँ । कुछ काम हाथ का और , आता ही  नहीं साहब ! सीखा ही नहीं , मौका ही कुछ ऐसा मिला कि । सीखने की जुर्रत , महसूस ही नहीं की । जो काम आता था , वो मिलता ही नहीं । सीखा है किया है अनुभव है ,  मगर उतना , पढ़ा लिखा भी नहीं साहब ! उसमे भी अब स्नातक और ,  डिप्लोमा मांगते है साहब ! काम बहुत है करने को पर करें क्यों ? दो चार नौकरी मिली भी थी ,  किन्तु नौकरी अपनी , समझ की थी ही नही । कर तो सकता था मैं मगर करना क्यों ? सरकार को भी तो , कोसना है साहब ! बस यही तो सब कर रहे अधिक तर ,  मैं भी कर लूं तो हर्ज क्या है ? साहब ! ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आरक्षण औषधि रूप में कर गयी काम ,व्याधि अब स्वस्थ हो गए ।

आरक्षण औषधि रूप में कर गयी काम , व्याधि अब स्वस्थ हो गए । अब तो विषाक्त हुआ जा रहा है ये , सनातन समाज में विखंडन का । कारक बनता जा रहा है ये । अभी तक सरकार नही कर रही , खत्म आरक्षण । बस यही तो रोना है , हम कोशिश पर है की जातिवाद खत्म हो । मगर क्या करें व्यवस्था में ही खोट बड़ा है । कैसे बने सनातनी एक , अभी भी हर के दिलों में । हरिजन दलित पिछड़ा स्वर्ण का विखंडन तुला , खूंटा गाड़े खड़ा है ।  प्रभु ! तुम ही करो ,अब कोई जतन । करो कोई चमत्कार ,हो जाएं जो हर एक । सनातनी एक जुट ,करो हृदय परिवर्तन । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

👩हम सुधर गए तो उनका क्या होगा ? जिनको हमारी बदमाशियों से इश्क है ।

 👩हम सुधर गए तो उनका क्या होगा ? जिनको हमारी बदमाशियों से इश्क है । 👦फिक्र न करों ! तुम सुधर कर तो देखो ।  वो भी बदल , जाएंगे ।  वो इश्क ही क्या जो ,  जनून न बन जाए ।  खुद को भी बदल देंगे वो ,  " इश्क " ।  वो तेरी शराफत से भी ,  कर जाएंगे ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

परिवर्तन स्वाभाविक है ।

परिवर्तन स्वाभाविक है । जड़ चेतन कोई भी ,  इस प्रक्रिया से अछूता नही है । कोई रत्ती भर तो कोई पहाड़ सा , किन्तु बदला हर कोई है । तुम बदले हम बदले सब बदले । अचार विचार बदले । माया ममता बदली ,  करुणा दिल की बदली । समय बदला ,  देखने का नज़रिया बदला । आना जाना बदला ,  क्या क्या नही बदला । रिश्तों की मिठास बदली ,  दुश्मनी में ,कड़वाहट बदली । धरा ,अम्बर ,हवा पानी , सब तो बदले । क्या बचा है जो न बदला?  ✍ज्योति प्रसाद रतूड़ी

👧धड़कनों में ,बसते है वो ।

 👧धड़कनों में ,बसते है वो ।  नाम जुबाँ पर लाना , जरूरी नहीं होता । 👦होगा कोई वो ,  खुश नशीब । जो बन जाये वजह , तेरे दिल के धड़कने की । हो जाऊं मैं वो ,  ऐसी मेरी तकदीर कहां । 👧उन्हीं से ही इश्क ,  किया हमनें । दिल का सकून भी ,  पाया उन्हीं से ही । उनसे मोहब्बत है ,  यह बयाँ करती है । मेरी ये , आंखें । दिल में बसे हैं जो ,  पढ़ ले वो । मेरी आँखों में ,  झाँककर । नाम जुबाँ पर लाना , जरूरी नही होता। अरे पगले , उदास न हो । वो मेरे "वो" तुम्हीं हो । तुम्हीं मेरी चाहत  हो । 👦 चल झूठी , मुझे न बना । न खेल मेरे , जजबातों से । तू रहे कहीं और , किसी के ।  आलीशान ,  महलों में । वो खाली महल , उलफत का , मेरे दिल में  न बना । 👧  तुम्हीं से ही इश्क ,  किया हमनें । दिल का सकून भी ,  पाया तुम्हीं से ही । तुमसे मोहब्बत है ,  यह बयाँ करती है । मेरी ये आँखें । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इलाज़ ए इश्क मुमकिन नही ,

इलाज़ ए इश्क मुमकिन  नही ,  अब और कहीं । आदत सी हो गयी है अब ,  तेरे शिफ़ा की हमें । अब दावा दे , या जहर । तेरी मोहब्बत में ,  सब मंज़ूर है हमें । तुमसा हकीम दिल का ,  जमाने में अब और नहीं ।   ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

लो दे चुकी है दस्तक "क्रांति"

लो दे चुकी है दस्तक "क्रांति" सनातनी अब जाग उठे । मच गयी हलचल चारों "ओर"  सनातनी अब जाग उठे ।   हो रहा है वहिष्कार अब , हर "उसका"  जो करे अपमान , धर्म सनातन का । अभी अनुसरण है शांति पथ का  , अब धैर्य सीमित है , काल अस्पष्ट है । मत करना विवश ,  संभल जाओ अब "तथाकथित" ज्ञात नही कब उठ जाए ,  अस्त्र-शस्त्र महाकाल का । हर अत्याचार का , प्रतिशोध लेंगे अब । अब अपना खोया हुआ , स्वाभिमान वापस लाएंगे  । लेकर रहेंगे उनसे हर वो , सब कुछ अपना ।  जिस पर बल- छल से , किया उन्होंने अधिकार अपना । मिटा देंगे हर वो चिन्ह ही , जो प्रमाणित करे । सनातन पर हुए  , अत्याचार का । दम भरते हो जिन , धर्म-द्रोहियों के कारण । उनसे भी अब , बंदर नृत्य करवाएंगे । है गंगा भी हमारी  , जमुना भी हमारी है । सहस्र शताब्दियों से , फलित है , यहाँ सनातन "संस्कृति" हमारी है । बन्द करो अब स्वाग , झूठे  भाई चारे का । सच मे उन्होंने कब , भाई चारा  निभाया है । लिए मंशा कत्ल की हर दम , काफिर करके हमें सदा बुलाया है । अब उनके झाँसे में हम ,  कतई नही है "आने वाले" । समझ गए ह...

कैसे न फिक्र हो , आपकी ।

कैसे न फिक्र हो , आपकी । तुम ही तो खुशी बनकर , आये हो । इस उदास दिल की , मेरे । दिल की बहारों में ,  खिजां का आलम ही था मेरे । खिलाया है इसमें गुल कोई ,  मोहब्बत का आपने । कैसे भूल सकता है ये दिल ,  वो राहें गम की । भटक गया था  ,  जिसमें यह दिल कभी । संभाला है जो इसे तुमने , अपनी प्यार की छांव में । दिल ने चाह है तुम्हें ,   दिल पर हमारा जोर नही । रहे न फिक्र में ये  कभी आपकी ,  ऐसा जीते जी कभी होगा नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

जो गुजरा हो उस मुकाम से, "दर्द" क्या और खुशी क्या ।

जो गुजरा हो उस मुकाम से, "दर्द"   क्या और खुशी क्या ।   हर एहसास वो , दिल का जानते है ।  लिखे जा तू , फसाना अपने दिल का ।  पढ़ने वाले बहुत है,  जो दिल के अल्फ़ाज़ पहचानते है ।  तुम अकेले नही , हम भी राह ए गुजर है ।  उस राह के , जिस राह से है गुजर तेरी ।  होता क्या है एहसास ,  पाने से किसी की "मोहब्बत"   हाल ए दिल पर क्या गुजरती है ,"दर्द"  किसी के खो जाने से ।  यह हम बा-खूब  जानते है । लिखे जा तू , फसाना अपने दिल का ।  पढ़ने वाले बहुत है,  जो दिल के अल्फ़ाज़ पहचानते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कहाँ दूर है हम , इक दूजे से ।

कहाँ दूर है हम , इक दूजे से ।  दिल में तो हर रोज , लगा हुआ है । आना जाना  हमारा । कभी हिचकियां बनकर , मैं तेरी । कभी हिचकियां बनकर तू मेरी । इक दूजे को , पुकारा करते है । और क्या होती है मोहब्बत सिवा ,  दिल से दिल की चाहत के । एहसास  मोहब्बत का , ये कम तो नही । रहते है हम इक दूजे के , दिलों में समाये हुुुए । यह रूबरू होने से ,  कम तो नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दर्द ए दिल अपना , दिखाऊँ किसे ।

दर्द ए दिल अपना , दिखाऊँ किसे । कहाँ है वो , नज़र कहीं । जिसे मेरा , दर्द नज़र आये । भुला तो दिया था , हमनें उनको । जमानें , कई हुये । आज फिर वो हमें क्यों  , रह-रह याद आये । है कहाँ वो , नज़र कहीं । जिसे मेरा दर्द ,नज़र आये । उम्मीदों की शायद , कोई किरण जगी हो । के दिख जाए वो , कहीं इक नज़र । फिर वो किरण , अभी तक ।   मुझे क्यों , न नज़र आये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज कल करते करते , बीत गए हो मानों बर्षो जैसे ।

आज कल करते करते ,  बीत गए हो मानों बर्षो जैसे । सच कहो कब आओगे तुम , ओ साजन मोरे । प्यासे हैं मोरे प्राण पखेरू ,  तेरी प्रीत जल को तरसे है । तरस रही है आंखे , दरश को तोरे । झर झर , नीर बरसे है । दिवस न भाता ,  अब न रात सुहाती । विरह की अग्नि मोहे ,  हर रोज जलती । आजा साजन ,  बनकर तुम सावन । प्रीत नीर बरसाओ जी । बुझे ये अग्नि , विरह मोरे मन की । आकर , आलिंगन लगाओ जी । नही रहा जाता , अब तोरे बिन । झट अब  आ जाओ जी । ✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न जाने आज कल वो , ख्वाब क्यों नही आते ।

न जाने आज कल वो , ख्वाब क्यों नही आते । रहते थे जिनके सहारे , हम दिन रात । न जाने वो रात-दिन , अब क्यों नहीं आते । ऐसा नही के वो ,  नही आते मेरे । दिल-ए-बज़्म में । मगर रहते है , वो खामोश । न जाने क्यों ?  पहले की तरह , कोई सरगम । अब नही गुनगुनाते । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

वाह ! तेरी इन्हीं अदाओं पर तो , हम फिदा है ।

  वाह ! तेरी इन्हीं अदाओं पर तो ,  हम फिदा है । ज़ुर्रत क्या है तब जुबाँ खोलने की , जब हाल-ए-इश्क तेरी ये आँखे ,  बयाँ करती हो । ख़फ़ा तो नही हूँ , मगर हैराँ हूँ । यह बा-मुश्किल काम , "आंखें"  सहज कैसे कर लेती हैं । सिखाओ तो सही ये हुनर ,  हमें भी अपना ।   देखे तो सही , कैसे यह "आँखे" दिल की बात ,बयाँ कर लेती है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सब तो ठीक है पर अभी भी । कुछ लोग , वायसराय बने घूम रहे है ।

 सब तो ठीक है  पर अभी भी । कुछ लोग , वायसराय बने घूम रहे है । हाथ में कुछ नही फिर भी ,  साहब बने घूम रहे है । कर रहे है सडयंत्र देश डुबोने का । और जनता के बीच , ईमानदार बनकर  घूम रहे है । न जाने कब मिलेगा छुटकारा ,  इन गद्दारों से । यह तो भारत को , तोड़ने की फ़िराक़ में । चीन पाकिस्तान , घुम रहे है । कैसे निपटे , इन गद्दारों से । गोरी चमड़ी वाले माना गए । तो क्या ? अपनी पैदाइस वो । यहां छोड़ कर जो चले गए है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दर्द से रिश्ता बहुत पुराना है , दोस्त !

दर्द से रिश्ता बहुत पुराना है , दोस्त ! तू कहता है कि ,  समझौता कर । मुस्कुराते रह कर । किया तो था , समझौता हमने । अपनी , तन्हाईयों से । मुस्कुराये तो थे , हम कुछ घड़ी मगर । ज़ख्म और भी ,  कुछ ताजे मिल गए ।  वक़्त लगेगा इन्हें भी , शायद भर जाने में । हो जाएंगे यह भी सुमार , अब । मेरे गम के , खजाने में । मुस्कुराऊँ भी कैसे , फुरसत ही नही मुझे अब , अपने गम से । मसरूफ़ ही रहता हूँ ,  मैं आज कल । अपनी तन्हाईयों में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न जाने क्यों ? नम हो जाती है ।

 न जाने क्यों ?  नम हो जाती है  , मेरी ये आँखे । सुनकर ,  तेरी दर्द-ए-दास्ताँ । क्या ये मेरे दिल की,  कोई  कमजोरी है  । या मेरे दिल की ,  कोई मोहब्बत । जो भी हो तुम , ना जाने क्यों ? अपने से लगते हो । शायद कोई रिश्ता हो , दिल का दिल से । वरना इस दिल की ,  परवाह में । आज तक कोई , गैर आया नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्यों चुप चुप कर ही , खून अपना यूँ ही जलाते हो ।

क्यों चुप चुप कर ही , खून अपना यूँ ही जलाते हो । रावण है यह तो , कोई राम तो बनो । जला डालो इसकी लंका ,  साहस करो । कोई तो वीर हनुमान बनो ।   बज्र इंद्र का चक्र सुदर्शन,  त्रिशूल में महाकाल बनो ।   मिटा दो धूर्तों को जो, संकट आन बने सनातन का ।  हो जाओ इक जुट ,सब सनातनी ।  हिंदुत्व की ढाल बनो ।   ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कुछ तो फर्क होगा , अनुभवों में ।

कुछ तो फर्क होगा , अनुभवों में ।   उनके और हमारे में । आज़मा कर देख लो शायद , हमारा काम तुम्हे पसंद आएगा ।   हम लग्न से ,बहुत ध्यान से ,  हर चीज़ को ,बारीकी से बड़े  प्यार से , सहज कर , ईमानदारी से ,  हर काम किया करते है । काम चोरी उऊँ हूँ , हम कभी  नही किया करते है । एक बार सेवा का , मौका तो दीजियेगा । न आये काम पसंद तो , पगार न दीजियेगा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 🤪🤪🤪

चोर मचाये शोर , चोरों की जग में ।

 चोर मचाये शोर , चोरों की जग में ।  रीत यह बड़ी पुरानी है । चौकीदार शांत बड़ा है , अभी तो लट्ठ हल्का ही चला है ।  अभी तो , शूल-त्रिशूल बाकी है । अभी तो शांत होकर कर रहा , सामना यह चोरों का । अभी तो चौकीदार का रुद्र रूप , तांडव बाकी है  । इस चौकीदार का अंदाज़ , बड़ा निराला है । जड़ खोद कर निकालेगा यह , विष-वृक्ष वन-उपवन से ।  रखो भरोसा , इस माली पर । यह माली बड़ा हिम्मत वाला है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब कहाँ वो , सरूर ए मोहब्बत रही ।

अब कहाँ वो , सरूर ए मोहब्बत रही । न नशा ही , न खुमार ही दोस्ती का । न रही चाहत ही , गुफ़्तगू की । न खिलखिलाहट , न मुस्कुराहट ही । न एहसास ही रहा अब , दुःख-दर्द का । न गिला है अब , न शिकायत ही कोई । शायद बदल रहा हो अब , मौसम । उनकी , दोस्ती का । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

माता पिता से , बढ़कर कोई भी नही ।

 माता पिता से , बढ़कर कोई भी नही ।  मां धरती तो , पिता आसमान है ।  माँ ममता तो , पिता करुणा निधान है । पहला पाठ मां ने सिखया ,  बोलना चलना खाना सिखाया ।  पिता ने स्नहे से ,  कभी पीठ पर कभी गोदी में खिलाया । कभी फटकारा गलतियों पर , पिता ने ।    मां ने सदा मेरा  पक्ष लिया । बैठा जो मैं दूर उदास होकर ,माँ-बाबा ने फिर दुलार किया । नाज़ों से पाला पोषा है ,  और उम्मीदों से संसकार दिया । ✍ज्यो०प्र० रतूड़ी

शीसा होता तो यह दिल मेरा , चटक कर बिखर जाता ।

 शीसा होता तो यह दिल मेरा , चटक कर बिखर जाता । होती आवाज़ टूटकर , बिखर जाने की । सबको होती खबर , कुछ रोते कुछ हंसते जी भर कर । मगर यह दिल मेरा , शीसा ही तो न हुआ । टूट कर बिखरा तो सही , मगर । किसी को न हुई , कोई खबर , इसके टूट , जाने की । घुट घुट कर ही जीता रहा ,गम ए अश्क  अपने पीता ही रहा । कोई पहचान न ले दर्द इसका , खुद मर मर कर जीता ही रहा मगर । किरदार हँसने-हँसाने का ,यह अपना निभाता ही रहा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

होना भी हस्र यही था ।

 होना भी हस्र यही था ,  देख कर शराब-ए-हुस्न । पी लिए हम , घूंट भर-भर कर । कभी यहां गिरे कभी वहां गिरे । कसूर मेरा ही नही अकेले , इस बर्बादी का । कसूर में शामिल वो , साखी भी है यारों । जो मुस्कुराते हुए अपनी , आंखों से मुझे । जी भर पिलाता ही गया । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

फालतू की बाते मत कीजिये साहब !

 फालतू की बाते मत कीजिये साहब !  यहाँ तो लोग हिमायती बनकर , जख्मों पर नमक छिड़क जाते है ।  कुछ लोग हैं अहसान फरामोश , खाते भारत का और , दुश्मनों का गुणगान गाते है ।  बड़ी सहजता से कुछ लोग कमी , अपनी छुपा जाते है । देखते नही कोढ़ अपना और , दूसरे के फुंसियों से घृणा कर जाते है ।  छीन गयी कुर्सी उनकी तो , उनकी बैचैनी का आलम देखो ।  सूरत ए हाल देख कर अपना , आईना ही तोड़ जाते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

भारतीय जनता पार्टी , सदैव देश एवं जनता हित में तत्पर ।

पारस है सरस है , ख़ालिस है । राष्ट्रहित में , "बीजेपी"  अग्रिम पंक्ति में खड़ी है ।  निरन्तर ततपरता से ।। हौंसले बुलंद है , भय की कोई शिकन नही । गिद्ध दृष्टि थी जिनकी , देश को नौच खाने की ।  अंदर हो या बाहर  । "दुश्मन" भयभीत है अब वो सारे , फड़फड़ा रहे है वो पंख अपने , आफत में पड़ी है अब , उनकी जान । नही मिल रहा है अब ,  उनको हराम का कुछ खाने को । फीकी पड़ गयी है उनकी शान । अखंड भारत का स्वप्न सहेजे ,  कदम दर कदम प्रयासरत । शनैः शनैः बढ़ते पद "भारत" के अब , विकास पथ पर,  उच्च शिखर की ओर । भारतीय जनता पार्टी ,  सदैव देश एवं जनता हित में तत्पर । बंदेमातरम ! भारत माता की जय ! जय श्री राम ! ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी