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अब क्या बयान करूं हाल ए दिल ।

अब क्या बयान करूं, हाल ए दिल । बस यूँ समझ लो कि , धड़क रहा है दिल किसी तरह । ख़यालों में डूब जाता हूँ अक्सर मैं ,  अपने मुकद्दर का , ज़नाज़ा लेकर । ज़ख़्म इतने दिए है , तेरी फितरत ने । गिनते गिनते , वक्त भी संग रो दिया । शायद तेरा , आखरी हो यह सितम । हर सितम को यह दिल , यह सोच कर सह गया । टिमटिमा रहा है मेरा , उलफत ए चिराग अब भी इसी इंतज़ार में । कभी तो होगा असर , मेरी वफाओं का । कभी तो थक कर , टूट जाओगे तुम । कभी तो होगा एहसास तुम्हे अपनी , जफ़ाओं का । इन्हीं ख्वाब ओ ख्याल लिए मैं , बैठा हूँ तेरे इंतजार में । अब क्या बयान करूं, हाल ए दिल । बस यूँ समझ लो कि , धड़क रहा है दिल किसी तरह । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

कीमत तेरी नही बड़ी , जल जाने के बाद ।

कीमत तेरी नही बड़ी , जल जाने के बाद । सामिल वो कोयला भी था जो , खाक हुआ । तुझे जलाने के बाद । एहसान मान उसका , जिसने अपनी तपिस से तुझे जलाया है ।  तू बन सके काबिल , तेरा जिसने भाव बढ़ाया है । वरना पड़ा रहता , कहीं रहगुज़र में । या सुख कर बिखर जाता , कही दानों में । न अहंकार कर के तू जला है , तब तेरा भाव बड़ा है । जो जला हो खुद , तुझे जलाने को ।  उसका भी एहसान , तुझ पर बड़ा है ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

कहाँ मुमकीन है ये , मेरी हसरत में ।

कहाँ मुमकीन है ,ये मेरी हसरत में । के पाऊँ मैं उसे जिसकी चाहत है मुझे । न आसान ही से , न मुश्किल से ही ।  बस चाहत ही , बनकर रह गयी है "मोहब्बत"  उसकी भी और मेरी भी । मुमकिन ही नही , नमुमकिन है पाना ,  इक दूजे को हमारा । मझधार में है इश्क और तूफान है जहाँ का । नही है कोई मंज़िल इसकी , न  कोई किनारा । आहे ही है दर्द , अश्क बनकर बहते है ।  रुसवा न हो , मोहब्बत हमारी जहाँ में । पास हो या दूर अब हम , अजनबी ही बनकर रहते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ढूंढ लो हो दिल आपका , उनके दिल में कैद शायद ।

 ढूंढ लो हो दिल आपका , उनके दिल में कैद शायद ।  कराह रहा हो , या छटपटा रहा हो दर्द से । या खुशी से  , हो रहा हो पागल । पा कर उनके , दिल की कैद शायद । पता तो करो मिल आओ , या पहगाम ही भिजवा दो । मुस्कुरा जाएं वो तो ,  समझ लेना दिल पर आपके , उनका कब्ज़ा हो गया है शायद ।  😀😀😀😀 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कोई दिल अपना , हाथों में लिए खड़ा था ।

हाल ए दिल पेश करूँ क्या , उलफत में । जिधर भी देखा  उधर ही , कोहराम मचा था । हर कोई लिए था , फसाना अपने दिल का । कोई मसल रहा था , हाथों से  सीना अपना । कोई दिल अपना ,  हाथों में लिए खड़ा था । बड़ा कंज़र्फ है यह इश्क भी ,लूटा है , हुस्न ने हर किसी को । फिर भी इश्क लिए , हुस्न की राह पर । हर कोई , सख्स खड़ा था । संभल गया हूँ मैं  मगर , प्रतीत मेरे दिल का कोई नही । न जाने कब उठे लहार , ज्वार बनकर । हुस्न की गलियों में , बिखर जाने को । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मानो सदियों गुज़र गईं हो , मुलाकात हुए ।

मानो सदियों गुज़र गईं हो , मुलाकात हुए । अभी कुछ ही रोज़ की तो बात थी , उनसे मुलाकात हुए । ऐ मेरे दिल की बेचैनी , तुझे क्या नाम दूँ । दीवाना तो उसने, कह ही दिया है तुझे ।  इसके सिवा मैं , और क्या कहूँ तुझे । सब्र कहाँ गया है अब तेरा , क्यों बैचैन हुआ जाता है । सब्र रख , कुछ दिनों की बात है । वो आएंगे ज़रूर , वो वादा जो कर गए । इशारों में ही सही , तुझसे वो इहज़हर ए इश्क । वो , कर गए । हाल ए उलफत का, नही जुदा है । उनके दिल का , तुझसे अलग । जुदाई में उनके अश्क , यह बयाँ कर गए ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

करूँ किससे बात यहाँ , किसको फुर्सत यहाँ मेरे लिए ।

करूँ किससे बात यहाँ , किसको फुर्सत यहाँ मेरे लिए । हर कोई उलझा हुआ है यहाँ , अपनी उलझनों में । चलो... वैसे भी किसके पास है , वक्त यहाँ किसीके लिए । हर कोई मसरूफ है यहाँ , अपनी कुछ न कुछ कहने के लिए । चलो बेहतर है खामोशी , किसी से न कोई प्यार न मोहब्बत ही । मस्त हूँ मैं यहां , न रंजिस न सिकवा न मुखालफत ही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब ये बताओं के कौन कौन है , दीवानों की तरह इस की महफ़िल में ।

अब ये बताओं के कौन कौन है ,  दीवानों की तरह इसकी महफ़िल में । मैं ही हूँ या कोई , और भी है जलने को । परवानों की तरह , इस महफ़िल में । कितने है हुए घायल ,  सताए हुए हुस्न की जफ़ाओं से । हम तो हुए हतास , हुश्न की वफाओं से । मयकशी भी होकर देख लिया ,  हुस्न ए मयकदे में । कहाँ शरूर रहा अब ,  जाम ए शराब ए हुस्न में । अब वो मदहोशी कहाँ ,  साकी की उन अदाओं में । चढ़ जाये करती थी , जो इक बार तो ।  याद रहा करती थी वो खुमारियों में । अब तो आलम , यहाँ तलक ही है "मलंग"  बनकर अश्क बहे है । दफन हुए है अरमान दिल के , दिल की गलियों  में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

इंतज़ार ही में गुजर जाता है , मेरा वक्त ।

इंतज़ार ही में गुजर जाता है , मेरा वक्त । न ख्याल दिन का है मुझे  ,  कब ढला । न एहसास रात का है मुझे , के कब हुई । रहता हूँ यादों में तेरे ही , खोया खोया सा । न होश सुबह की के कब हुई , न ख़बर शाम की के कब ढली । आ जाओ  अब तो , आलम यह है के लोग कहते है । हम खुद से ही , गुफ्तगू करने लगे है ।  दिखने लगे हो तुम , मुझे हर तरफ अब । बे शुद सा हूँ और , ज़ुबाँ पर नाम तेरा ही । कैसे समझाऊं मैं इस दिल को ,  के लोग मुझे अब । दीवाना कहने लगे है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

ऐ शमा ! तू बतला दे मुझे , कब तबाह करेगी मुझे ।

ऐ शमा ! तू बतला दे मुझे , कब तबाह करेगी मुझे । न जाने अब तक कितने और है , होने को तबाह तेरे इश्क़ की राह में । अब बतला भी दे कब तक , रहूँ इंतज़ार में मैं । बहुत तड़प रहा हूँ , तेरे इश्क़ में जल जाने को मैं । हाय ! रे तमन्ना , कब होगी यह पूरी मेरी । ऐ मेरी जान ए बाहर ! कुछ तो , इशारा कर दो मुझे । हो जाऊं मैं भी कुर्बान , इश्क की राहों में । इस जन्म में न सही तो , अगले जन्म में पाऊँ मैं तुझे । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तुम से दूर होना नही , मंज़ूर मेरे दिल को

  तुम से दूर होना नही , मंज़ूर मेरे दिल को । बस यूँ ही पास रहना , सदा हमारा होकर । देखो ! आंखों में मेरे , कितनी रोई है यह तेरी बिरह में । अब न जाना कभी मुझे , तन्हां छोड़कर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

कहाँ समझ पाया मैं कभी , चाहत और इश्क को

कहाँ समझ पाया मैं कभी , चाहत और इश्क को । अब समझा हूँ तो , अब उम्र निकल गयी । यूँ तो दुनियादारी से , नही हूँ बेखबर । दुनिया ऐसी भी है , मोहब्बत की । ये , ना थी खबर । रहा वक्त जब इश्क और , चाहत का । हम ज़ाम ए शराब , के दीवाने थे  । किया बर्बाद , खुद को बेवजह । अब संभाले भी तो ,अब जवानी निकल गयी । सोचता हूँ कि रही होगी , ये हंसीं दुनिया तब भी शायद । हम ही नही  , पहचान सके । अब पहचान पाए तो , अब उमंग निकल गयी । है "मलंग" अब दिल का आशियाना , लुटा हुआ । शोर ओ शराबा , बहुत है इर्दगिर्द । मगर दिल तन्हां ही है , अंदर ही अंदर घुटा हुआ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

नही है आसाँ इश्क , जो हर कोई कर सके ।

नही है आसाँ इश्क , जो हर कोई कर सके । हर किसी का , कहाँ नशीब के , वो ।  किसी की मोहब्बत , हासिल कर सके । "है इश्क यही के" हो कोई तसब्बुर में  ऐसा , जो बन जाए धड़कनें दिल की । रहे मोहब्बत दिल में किसी की  , धड़कनों की रवानगी बनकर ।  एक अलग ही नशा है इश्क में , किसी की यादों में रहना ।  मैं मलंग मोहब्बत कहूँ , इस मदहोशी को । और लोग इस मोहब्बत को , दीवानगी कहते है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।  

मैं सिमट कर , सिकुड़ कर रह गई हूँ मैं ।

मैं सिमट कर , सिकुड़ कर रह गई हूँ मैं । मेरे विशाल स्वरूप को....तेरी कायरता ने.....तेरे लालच  और तेरी स्वयं की महत्वाकांक्षा , और आपस की शत्रुता ने । लुटवाया है तूने मुझे । मैं असहाय लुटती रही , खंडों में बंट कर रह गई हूँ मैं । सदियों से लहुँ लुहान हूँ मैं , शत्रुओं ने रौंदा है मुझे ।  तू सहिष्णु ही रहा बन कर , कल भी और आज भी । समझ भाषा शत्रु दल की , न उसकी हाँ में हाँ मिला । संगठित हो संघर्ष कर , रख दृष्टि गिद्ध सी । शत्रु दल की ,  हल चल पर । यह रण है तेरे अस्तित्व का , तेरे स्वाभिमान का । छल से छला है जिसने तुझे , ले प्रतिशोध उसे कुचल कर । दिखला दे तू अपना रणकौशल , जग को यह बतला दे तू  । मैं  तेरी माँ भारती हूँ , तू मेरा सनातन । वंदेमातरम ! ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दास्ताँ नही है अलग तेरी शायद , मेरी दास्ताँ से ।

 दास्ताँ नही है अलग तेरी शायद , मेरी दास्ताँ से ।  दर्द ओ गम से भरा है दिल मेरा । यह जो छलक रहा है दिल से , नज़्म ए अल्फ़ाज़ बनकर ।  कोशिशें तमाम की , दर्द भूल जाने की मगर । इन जख्मों का क्या करें ? ये जो रिसते है , नासूर बनकर । होती नही है अब मेरी , सकून की वो रातें  । न वो पहले सी रही उनसे , प्यार भरी बातें । अब तो मुलाकातें ही , रह गयी है उनसे । सिर्फ , बदस्तूर बनकर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी     

न जाने आज उनकी सुबह , क्यों नही हुई अब तलक।

 *न जाने आज उनकी सुबह , क्यों नही हुई अब तलक 🤔* *या शायद आज उन्हें , मेरा ख्याल नही आया ।🤔* *या लापरवाह हो गए हों, या भूल गए हों मुझे शायद ।🤔* *क्या पता क्यों ?* *सुबह का आज मेरे नाम ,*  *उनका कोई पहगाम नही आया ।☹️* ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न जाने क्यों.....क्यों ?

न जाने क्यों.....क्यों ? मेरे दिल को , क्यों नही आता है करार । बिन तुझसे बात किये ।। न जाने क्यों......क्यों ? मेरे दिल का , क्यों नही होता है ठहर । कहीं और , सिवा तेरे ।। न जाने क्यों.....क्यों ? मेरे दिल को , क्यों नही आता है यकीं । के तुम मेरा ख्वाब ओ ख्याल हो ।। न जाने क्यों....क्यों ? मेरे दिल को , क्यों तुम से है प्यार इतना । के कोई इसे भाता ही नही । न जाने क्यों ......क्यों ? मेरे दिल को , क्यों है तेरा ही एहसास हर दम । के तसब्बुर में , तेरे सिवा कोई जचता नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सभी नही कुछ-कुछ , कुछ तो ।

 सभी नही कुछ-कुछ , कुछ तो । अभी भी ऐसे साथ निभा रहे है , जल बिन मछली जैसा, इक दूजे का साथ निभा रहे है । सभी नही कुछ-कुछ , कुछ तो । प्यार के दीप में है जैसे , तेल और बाती । जलता रहता है दीप उनके , प्यार का । जब तक रहे दीप में तेल या बाती । सभी नही कुछ-कुछ , कुछ तो । संग-संग चले है , अंतिम सफर तलक । यहां तक तजे प्राण , वो संग संग । सभी नही कुछ-कुछ ,कुछ तो । रहे प्रेम में प्रथम से अंतिम तलक ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज मैं क्यों न गाऊं , मुस्कुराऊँ खिल खिलाऊं ।

 आज मैं क्यों न गाऊं , मुस्कुराऊँ खिल खिलाऊं ।  के सजन मोरे आएंगे , मुझे संग अपने ले जाने । आज झूमी नाची मैं , वर्षों बाद रे सखी ! दिल के संग मैं , अपने दिल की गलियों में । आज जमीं पे नही कदम मेरे , लगता है यूँ आसमां में उड़ी जा रही मैं ।  के सजन मोरे आएंगे , मुझे संग अपने ले जाने । होगी  रात आज मस्तानी संग मैं रहूंगी  , अपने साजन के । रहूंगी बाहों में उनके , वो निहारेंगे मुझे मैं शरमा जाऊंगी । ये सोच कर मैं क्यों न इतराऊं , मन बावरा है मेरा ।  मन को सखी ! मैं न रोक पाऊँ , झुमु नाचूँ क्यों न सखी मैं गीत प्यार के गाऊं । आज मैं क्यों न गाऊं , मुस्कुराऊँ खिल खिलाऊं ।  संग मैं अपने साजन के अब मैं जाऊं । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अरे इधर भी रहम ओ करम फरमाओ जी ।

 अरे इधर भी रहम ओ करम , फरमाओ जी । ज़रा इक नज़र तो , देखो इधर भी । कितने बेसब्र है हम तुमसे , इक मुलाकात के लिए । हुए काफी देर हमें ,आये हुए तेरी इस महफ़िल में । कुछ वक्त हमें भी दे दो अपना , हम भी बैठे है तुमसे , गुफ्तगू के लिये । फिर न जाने कब हो मेरा आना , तेरी इस महफ़िल में ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

इम्तिहान लेता है , इश्क भी शायद ।

इम्तिहान लेता है , इश्क भी शायद । दिल जो है पागल मेरा । ले गया मुझे उस राह गुजर की ओर , जिस राह से गुजर थी तेरी । सोचा मिलना तो नशीब न हुआ , चलो दिल की सही , मान लेता हूँ । के दिख जाए एक , झलक ही तेरी । ज्यादा नही तो दो , लफ्ज़ ही सही । हो जाती मुलाकात थोड़े ही ।  मगर अफसोस की , तुम तेज कदमी से चले ।  मुड़ कर भी न देखा , इक बार भी मेरी ओर । रोये बहुत हम मगर अश्कों को ,  पलको से न गिरने दिया । दिल को मनाया ब-मुश्किल से फिर मैंने । कहीं कोई पूछ न ले सबब मेरे गम का ,  मुस्कुराकर अश्क मैं पी गया । ये दिल ही है पागल मेरा ,जिस राह से गुजर थी तेरी । मुझे उस राह की ओर ले गया ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

ये मेरी बेबसी नही तो , और क्या है ?

ये  मेरी बेबसी नही तो , और क्या है ?  आये हज़ूर दिल के करीब मगर , हम उसे मिल न सके । दर्द और क्या हो इसके सिवा ? दिखे वो इक नज़र ही , मानो ख्वाब हो । फिर वो ख्वाबों में भी , नज़र न आये । प्यार ही दर्द हो शायद । जो अश्क बनकर , बहे बिदाई में । या अब मार ही डालेगा मुझे , गम उनका । मेरी इस तन्हाई में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

चले भी न दो कदम हम ,साथ मिलकर ।

 चले भी न दो कदम हम ,साथ मिलकर ।  न बैठे ही तन्हा , कुछ घड़ी हम दोनों ।  हवाओं के झोकों सा , हुआ एहसास ।  दिल पर , उनके छूने का ।  बस यही मुलाकात हुई ।   इंतज़ार में रहा मैं ,  आज नही तो कल ही सही । शायद मिल जाए , वो मुकद्दर से । किसी , मुकाम पर । खबर आयी के वो , वापस अपने शहर ।  बिना मिले ही ,जा रहे हैं । पहगाम बस , इतना ही मिला मुझे । के वक्त की , नज़ाकत को समझो । खुदा ने चाह तो , फिर मिलेंगे । किसी मुकाम पर कहीं । कितना खुश , हुआ था दिल मेरा । उनके आने पर , मेरे शहर । हाल ए दिल यह है अब , अश्क बह रहा है जी भर । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अपना घर था , आनंद से रहना नही आया ।

 अपना घर था , आनंद से रहना नही आया  ।  आपसी की फूट-लूट में , बाहरी लोगो ने मज़ा है पाया ।  ले के मदद गैरों की , अपनों को बर्बाद किया ।  खुद भी कहाँ बच पाया कुल द्रोही , अपना भी राजपाट गवां दिया ।  भारत की बात कह रहा हूँ मैं , सदियों से जो गुलाम रहा । हिन्दू रहा हिन्दू का दुश्मन , तभी तो मुगल-अंग्रेजों और यवनों ने यहाँ राज किया । आये कई लुटेरे यहाँ और लूटा , माँ भारती की अस्मत । रहे मौन-खामोश ही , वो लूटते रहे और हम लुटते गए । फिर भी न हम एक हुए  ,जातियों के भेदभाव में निरंतर बंटते ही गए । कुछ वीर सपूतों ने , अपना रणकौशल दिखलाया । कुछ माता-बहनों ने जौहर से , अपना स्वाभिमान बचाया । हुए कई बलिदान स्वाधीनता की बलि-वेदी पर , तब जाके अपना स्वाभिमान अधिकार वापस पाया । कुचक्र कुचाल की बिसात पर , स्वाधीनता के बाद कुछ लोगों ने ऐसी चलें चली । किये खंड भारत के , मज़हब के नाम पर । शासन के लोभी बने भोगी , भारत को लहुँ लुहान कर । धर्मनिर्पेक्षता का रचा , सडयंत्र लाठी वाले ने । फिर बिछा दिए अंगारे झुलसाने को , सनातनधर्म की राहों पर । अब लपटें उठ गई , कोहराम मचा है चारो ...

मत कर हतास अपने मन को , ऐ प्राणी ! पल भर का महमां है अंधेरा ।

मत कर हतास , अपने मन को ।  "ऐ प्राणी !" पल भर का है , महमां अंधेरा ।  किसके रोके , रुका है सवेरा ।  ग़म की ये  रात जरूर जाएगी ,  "हिम्मत न हार"  सुख की सुबह जरूर आएगी ।  मिलता नही हर किसी को ,  चाह अपने मन का । मत कर मन तू अपना , उदास प्राणी ! न बन दुश्मन तू , अपने जीवन का । न भटक तू बेमतलब के ,  ख्वाहिशों के इन अंधेरों में । निकाल आ बाहर तू ,  अपनी ख्वाइशों के घेरों से । पहचान अपने बजुद को ,  किसलिए तू यहाँ आया है ।  न निराश कर मन को ,  आशाओं के दीप जला ।  रहेगा प्रजवालित दीप तेरा सदा ,  सुख दुख के इन फेरों में । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

यह खुशनुमा दिल का जहाँ , आबाद है ।

यह खुशनुमा दिल का जहाँ , आबाद है । रहन बसेरा जो है , इसमें तेरी यादों का । नही कुछ , और जुस्तजू । न किसी और की , ठहर मंजूर मुझे । "जिंदगी की इस सराय में" तू ही मुसाफिर से , खुश हूँ मैं । रहेगा जब तलक भी ठहर तेरा , संग यूँ ही एहसासों में  बनकर । जी जाएंगे उतने ही लम्हें , हम अपने जीवन के । तू चाहत है मेरी , तू ही है प्राण मेरा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

तवायफ खुद तबाह हो गयी बचाते बचाते , लाखों बच्चीयों की आबरू ।

तवायफ खुद तबाह हो गयी बचाते बचाते ,  लाखों बच्चीयों की आबरू । "कमवक्त वहशियों से" फिर भी न बच सकी , कई गुड़िया तब भी ।  समस्या फिर भी बनी है ,  "लाज हर गुड़िया की"  बचाने की अभी । न कानून का खोफ है इन बैहशियों को ,  न डर जमाने का है इन्हें ।  न दिखता है इन्हें , किसी का दर्द  ।  अब तो जनता को ही लेना  होगा , कानून हाथ में ।  करके इनकी ठुकाई ,  "और काट दो लिंग इनका"  बन जाए जो यह नामर्द ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

क्यों उड़ाते हो , मखोल मर्दों का ।

 क्यों उड़ाते हो , मखोल मर्दों का । दर्द में कहाँ नही चले संग । खुशी कौन सी न दी , मर्दों ने औरतों को ? कब न किया सम्मान ? कुछ बेगैरत के कारण ,  आज न उड़वा हंसी सब मर्दों की । आसमान के बिना धरती , का बजूद कहाँ । माना सितारे गर्दिश में , हो आज शायद ! न चमके कभी , ऐसा तो नही । सूरज सा है मर्द , औरत सृष्टि , सूरज बिन सृष्टि का निखार कहाँ । दोनों है , इक दूजे के पूरक । एक न हो तो ,दूजे का अस्तित्व है कहाँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न मैं शायर हूँ , न कवि हूँ ।

 न मैं शायर हूँ , न कवि हूँ ।  मिल जाते है शब्द जो , "अनुभूति के"  बस उसे ही लिख लेता हूँ ।  न मैं रस की जनता हूँ ,  न श्रृंगार की , बस भा जाये मन को जो , उसी को श्रृंगार , समझ कर मैं , श्रृंगार कर लेता हूँ । हाँ दर्द ज़रा , करीब है मेरे । उसी को अक्सर , सहला लेता हूँ । मिल जाये दर्द में जो दर्द ए हर्फ़ , उसको लिख लेता हूँ ।  न मैं शायर हूँ , न कवि हूँ ।  मिल जाते है शब्द जो , "अनुभूति के"  बस उसे ही लिख लेता हूँ ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मत छेड़ मुझे अरे वो बेशर्म , मैं नही कन्या कुँवारी ।

मत छेड़ मुझे अरे वो बेशर्म ,  मैं नही कन्या कुँवारी । हट छोड़ दे रास्ता मेरा , क्या मति मर गयी है तुम्हारी ।   ठीक से जाणु हूं मैं , तुम जैसे नै । देखि अकेली लड़की , जिब कोई । तो आगै पाछे  खूब डोले सै । हट पाछे नै , तू मंनै अभी न जाणे सै । उतर जावेगा भूत इश्क का थारा , यह सुण कर के , पति म्हारा दरोगा सै ।   ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मंत्र मुग्ध हो गया हूँ मैं आज , देखा जो मैने आपको ।

मंत्र मुग्ध हो गया हूँ मैं आज , देखा जो मैने आपको । मन के शब्दकोश से , ढूंढ रहा हूँ अब शब्द । उपमा करूँ मैं , जिससे तेरी । तेरा सजीला रंग , तेरा यौवन नूतन , खिला रूप तेरा निराला । करूँ किस से तेरी तुलना , और कोई न भाए मन को मेरे । नही है वर्णित कदाचित , अभी तक । मेरे मन के शब्दकोश में , ऐसा कोई शब्द जो । तेरी प्रसंसा में उतर जाए खरे । हे मेरी मनमोहनी तेरे मोह में , मैं बंध गया हूँ ।  छटपटाहट मेरे मन की ऐसी, जैसे मीन , बिन जल की । यह दशा है कैसी ,स्वयं से अब मैं , दूर चला गया हूँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

आज हुआ एहसास के , नही था वो ख्याल ए उलफत मेरा ।

 आज हुआ एहसास के , नही था वो ख्याल ए उलफत मेरा ।  ख्वाब हर किसी के,  कहाँ हकीकत में हुआ करते है । जो भी हुआ साथ मेरे , किया बहुत खूब उसने ।  वरना कैसे मालूम होता , दिल से खेलने वाले कैसे हुआ करते है । इक झूठ जिसके कुछ मायने नही है ,उनके लिए कोई । गुजरेगी क्या इस दिल पर , काश यह एहसास उसको हुआ होता । डर था जो किसी बात का तो , हमसे कह दिया होता । न गुजते हम उस राह से , जहां उसका गुज़र  होता ।💔  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

न सवाल तुम करो , न सवाल हम करें ।

न सवाल तुम करो , न सवाल हम करें । प्यार की इन राहों पर । दो कदम तुम चलो , दो कदम हम चलें । न सवाल तुम करो न सवाल हम करें ..... न गीला तुम करो , न गीला हम करें । बनके खामोश ही , इज़हार ए प्यार करें । दो कदम तुम चलो , दो कदम हम चले । प्यार की इन राहों पर , नाम अपना करें । न सवाल तुम करो , न सवाल हम करें..... न तुम अब दूर जाओ , न हम अब दूर जाएं । बज़्म ए दिल में , नज़्म कोई प्यार की । कभी तुम  गाओं , कभी हम गायें । न सवाल तुम करो , न सवाल हम करें । प्यार की इन राहों पर । दो कदम तुम चलो , दो कदम हम चलें । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

आज रोने को , दिल बहुत चाह रहा है ।

 आज रोने को , दिल बहुत चाह रहा है ।  सब तो है मगर , न जाने फिर ।  किस को खुद में , खोजता फिरे जा रहा है । आज रोने को , दिल बहुत चाह रहा है । शकुन से , बे-शकुन क्यों कर हुआ दिल । न जाने शकुन ए तदवीर , क्या हो अब इसकी । चुप चुप ही है अब , और अश्क रोके जा रहा है । आज रोने को , दिल बहुत चाह रहा है । मज़बूर क्यों हुआ ये आज , क्या गम है ।  जो गम इसे रह रह कर , यूँ सता रहा है । दर्द बहुत छुपा है , शायद इसमें । छलक ही गए अश्क रोके न रुके अब । पढ़ सके शायद वो , इसके अश्कों में । जिसको यह अपनी बेबसी , बताना चाह रहा है । आज रोने को , दिल बहुत चाह रहा है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

किस पर करें एतबार के , कसम हर कोई खाता है ।

 किस पर करें एतबार के , कसम हर कोई खाता है । "तेरी कसम" से ही , हर कोई अपना बन जाता है ।  लगता है मानों यह मेरा ही है , अज़ीज़ है चाहने वाला ।  बस तेरी "कसम से" ही , मुझे हर बार मार जाता है । रह गया है प्रेम "तेरी कसम" बनकर ।  आज इस गली तो , कल उस गली । अभी भी कुछ रिश्तों में , भगवान स्वरूप प्रेम जिंदा है । ठिठुर कर कभी अलसाये हुए , कंपकपाते हुए होंठो से बुदबुदाते हुए । अपने होने का एहसास दिलाता है । मगर इस आधुनिकता में , कौन उसे पहचानता हैं । बस "तेरी कसम" का  नशा ही है , शैतान प्रेम वो । जो बे मौत अक्सर , हर किसी को मार जाता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

ऐ चाँद तू देना गवाही कैसे गुजर रही है मुझ पर ।

ऐ चाँद तू , देना गवाही । कैसी गुजर रही है मुझ पर ।  हाय रे ! ये तन्हाई और ये शब ए गम  । है करीब मेरा , चिराग ए उलफत । और महरूम हूँ , उसकी रोशनी से मैं । दूर ही बेहतर था , उम्मीद पास आने की में । जी तो शकुन से , रहे थे अब तलक । हाय रे मुकद्दर ! पास होकर भी । मिलने को मजबूर हुए हम । ऐ चाँद तू , देना गवाही । कैसी गुजर रही है मुझ पर ।  हाय रे ! ये तन्हाई और ये शब ए गम  । कैसे आएं वो ख्वाब बनकर भी , बैरन बन गयी निंदिया मोरी । इन अँखियन में नींद न आये ।  झर झर अँखियाँ नीर बहाये । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मैं ही रही अक्सर साथ तेरे ।

 मैं ही रही अक्सर साथ तेरे  ,  तेरा हमकदम बनकर । तू खुद में ही खोया रहा मैं,  साथ साथ चलती रही तेरे  । तू कहीं पर ठहर गया तो ,  रुकी मैं भी ।  तुझे छोड़ कर मैं कभी न गई ।  ये बात अलग है ,  रहा तू ही बेपरवाह मुझसे । मैं तेरी परवाह में ,  अकसर तेरे ही साथ रही । खुशी के पलों में ,  औरों की तरह ही ।  झुमती मैं भी , तेरे साथ रही । हुए जुदा सब गम ए दौर से ,  जब गुजरे तुम । मैं तुझे छोड़ कर , फिर भी न गई । जाऊं कैसे मैं बिन तेरे ? मैं तो तेरे साथ ही , इस जहां में हूँ आई । तेरे हर सुख दुख में , तेरा साथ देने को । क्या सोच रहे हो , यही के कौन हूँ मैं ? अरे मैं हूँ तेरी परछाई । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी   

रहा दिल का लगाना ही यूँ ही दूर दूर ।

रहा दिल का लगाना ही ,  यूँ ही दूर दूर । कभी पास न आये , वो न हम ।। रही दिल की कशिश ही ,  यूँ ही दूर दूर । मोहब्बत भी नही ,  तो दिल बेकरार सा क्यों है ?  ये कशमकश दिलों की क्यों है ? न वो समझ सके न हम ।। न देख पाए इक दूजे को ,  किसी रोज जो ये नज़र । दिल बेचैन हो जाता क्यों है ? अपना भी नही है वो तो ,  फिर हमें अपना वो लगे क्यों है ? क्यों हो जाते है दिल बेचैन ,  न वो समझ सके न हम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

कई बार जीता है , कई बार मरता है । कवि है साहब !

ख्यालों में कई बार जीता है , कई बार मरता है । कवि है साहब ! समुद्र की लहरों से ,  तूफानों से कभी पहाड़ों से । कभी रेगिस्तानों से तो , कभी चट्टानों से , टकराना जानता  हैं । कवि है साहब ! जो न टूट सके किसी से , वो कवि "प्यार में" । चाँद तारे खुशी-खुशी , तोड़ लाता है । कवि है साहब ! खुशी मिले या गम, चाहे हो वो किसी के । हर किसी के गम और खुशी में ,  खुद को ढालना जानता है । कई बार जीता है , कई बार मरता है । कवि है साहब ! हर किरदार को ,  ब-खूबी निभाना जानता है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी।

मन को बाँध लेती है , स्मित तेरी ।

मन को बाँध लेती है ,  स्मित तेरी । प्रेम तेरा सघन निश्छल । अद्भुत तेरा अपनापन ।। अभी नही है भान तुझको ,  संसार के छलकपट । नटखट चंचलता में लिप्त ,  निर्मल तेरा मन । बाल क्रीड़ा में मगन । । दिव्य ज्योति ,  श्री गणेश अंश ,  दीपिका तनय ।  मुखमंडल पर रहे ,  तेज तेरा व्यापक  ।  तू दौहित्र मेरा ,  मेरे हृदय का तू आलिंगन । "दिव्यांश"  तेरी रहे सदैव कीर्ति अनन्त ।। तू जीवन ज्योति हमारी ,  हर्षित तुझसे है हमारा मन । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।

यह विनती है , माँ तुझसे मेरी ।

यह विनती है , माँ तुझसे मेरी । नही चाहिये मुझे , धन दौलत बैभव । बस मुझे अज्ञानता के ,  भव सागर से , पार करा देना । रहना सदा साथ , तू मेरे जीवन भर । भटकूँ जो राह मैं जीवन की ,  तू सद्मार्ग दिखा देना । न उलझू मैं सुख-दुख के ,  जीवन राह तीरों पर । मन को तू  मेरे , धैर्यमान बना देना । काम क्रोध मोह लालच का , विष मुझमे न कभी पनपे । यह वरदान मुझे देना ।  ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कैसे पूछे ? हाल ए सफर जिंदगी का , कैसे गुजर रही है यहाँ ।

कैसे पूछे ? हाल ए सफर ,  जिंदगी का तेरी ।  कैसे गुजर रही है  , यहाँ । अनजान राहों में सब कुछ ,  अनजाना है यहाँ । कहाँ से आये हो तुम , और तुझे जाना है कहाँ ?  मंज़िल है तेरी कौन सी ,  और तेरा ठिकाना है कहाँ  ? तलब क्या है जिंदगी की तेरी ,  इरादों में तुमने ठाना है  क्या  यहाँ ? क्या है जुस्तुजू  तेरी ,  और तुझे  पाना है क्या यहाँ ? हमसफ़र है कोई ,  राह ए जिंदगी का ।  या तलास है , अभी पाने की । अपनी इन खमोश लबों ,  का सबब तो बता । क्या खामोश होकर यूँ हीअभी ,  संग संग हमें जाना है यहाँ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

अब जरूरत , नही है हमें ।

अब जरूरत , नही है हमें ।  किसी हुश्न की , इश्क के लिए ।  यह दिल भी अब हमारा ,  आत्मनिर्भर हो गया । हाँ आती थी आवाजें दिल की ,  दिल तक कभी । अब नही !  अब आराम से है ,  दिल मेरा । क्योंकि , दिल की दीवारों को, अब हमनें ।  साउंड प्रूफ , कर दिया । क्यों उलझे किसी से ,  दिल को सर ए आम , बदनाम कर । बे-रहम है ये हुस्न वाले ,  दिल से ही खेला करते थे  । इसलिए अब हमने , वापस ।  दिल को , आपने नाम कर दिया । यह दिल भी अब हमारा , आत्मनिर्भर हो गया । 😂😂😂😂 ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

मेरे एहसासों में सामिल है , यह किसी की "आदत का लगाना"

मेरे एहसासों में सामिल है , यह किसी की "आदत का लगाना"  कोशिश बहुत की मैने के , यह लत मेरी   छूट जाए  । न जाने कैसी है यह प्यास के , उनके बैगर बुझती ही नही । नशा भी अजीब सा है इश्क , दीवानगी की हद से भी गुजर गई है अब ये । जो न थी फितरत में , मेरी कभी ये । अब उनके हुस्न के दीदार बिन ,दिल से रहा जाता नही । खाली ही रखा है , हिफाज़त से मैंने । अपनी जिंदगी की , किताब का एक खास पन्ना । क्या पता मेरे जिंदगी के , उस पन्ने पर खुदा उन्हें लिख जाए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

कहाँ हमारा दिल इतना दूर है ,जो पहूंचा न जाए ।

कहाँ हमारा दिल इतना दूर है , जो पहूंचा न जाए । हमारा दिल तो इतना नजदीक है ,  कि हर कोई छूकर चला जाए । बस यही तो फितरत है ,  इस दिल की ।  जिस का छुआ भा जाए ,  बस उसी का हो जाए । मगर अभी तक , ऐसा हुआ नही ।  दिल को छुआ बहुतों ने मगर ।  यह दिल अभी  ,  किसी का हुआ नही । जुस्तुजू है इसे किसी तिलस्मी ,  दिल वाले की । जो छू जाए इसे और यह ,  उसका हो जाए । हमें भी करार आ जाए जो  ,  तमन्ना दिल की यह पूरी हो जाए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

दिल से याद हम सदा , तुझे करते है ।

दिल से याद हम सदा ,  तुझे करते है । तुम यकीं करो या न करो , यह तुझ पर हमने छोड़ा है । राह ए वफ़ा में हम ,  हद से गुजर जायेगे । आजमाना चाहो तो , आजमा लेना । जब चाहो , तुम । वो वक्त इम्तेहान का होगा ,  मेरी , मोहब्बत का । यकीं मानों हम , आएंगे जरूर । तुम्हें निराश न , करेंगे हम । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी  

रब रखे इस हसीन , चेहरे का नूर सलामत ।

रब रखे इस हसीन ,  चेहरे का नूर सलामत । कभी न , रंगत इसकी ,  फीकी होने पाए । दिल की है ये मेरी प्रिये , रहे यही मेरे ही दिल में ,  सदा मेरा प्यार बनाकर । हुआ है इनसे ही मेरे ,  प्यार का जहां आबाद । रहे साथ-साथ हम ,  उम्र भर यूँ ही । कभी साथ हमारा ,  छूट न पाए । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सन्नाटों में ही गुज़रे है , जिंदगी के लम्हें कुछ इस कदर ।

 सन्नाटों में ही गुज़रे है , जिंदगी के लम्हें  कुछ इस कदर । खुद की सदाओं से भी अब हमें , डर लगाने लगा है । बुझा दो ये उल्फत ए चिराग के हमें , अंधेरे रास आ गए है । इन चिरागों से भी अब हमें , डर लगने लगा है । तन्हा ही काट लिए हमने , सफर यह जिंदगी का । बस चंद फासला और ...... वो भी कट जाएंगे , तुम जाओ हमें तन्हां ही रहने दो ।  हमसफर से अब हमें , डर लगने लगा है । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

मकबूल न इश्क , न आशिकी ।

 मकबूल न इश्क , न आशिकी । खाक हुआ सब , हसरत ए गुलसिताँ तेरा । खुद को खो कर भी , क्या हासिल हुआ ? बता ऐ दिल ! शाम ए गम और  , तन्हाइयों के सिवा । रही न अब आरज़ू ए नज़र , खुद को देख पाने की । उम्मीदों का आईना भी अब , चकनाचूर हुआ । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।  

🙍आपको देख के लगता नहीं है कि आप शायरी भी करते होंगे ?

 🙍आपको देख के लगता नहीं है कि , आप शायरी भी करते होंगे ? 👦अब आपको , क्या बताऊं मैं । कभी जवानी के दिनों में ,  शायरी का शौक रखता था मैं । वही शौक मेरा ,आज काम आ गई । बड़ी मुद्दतों से आज यह , मस्तानी शाम आ गई ।।  खुशी की घड़ी और, जोड़ लो उन लम्हों की । जब तुम सिमट कर , रहोगी मेरी बाहों में । दुनिया क्या कहे या क्या न कहे हमें , इस बात की अब परवाह नही ।  अंजाम , किसी खौफ का अब हमें नही । बढ़ गए है अब  कदम हमारे , राह ए मोहब्बत में । मुड़ जाएं जो वापस करीब मंज़िल के , वो आशिक हम नही । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी